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जीवन मे नियम की आवश्यकता

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------  एक व्यवस्थित जीवन जीने के लिए जीवन में नियमों का पालन अपरिहार्य है। नियमरहित जीवन एक अवस्था के बाद भार में परिवर्तित हो जाता है और हमें अपना ही शरीर भारवत प्रतीत होने लगता है। भारतीय ज्ञान-परंपरा में हम जब भी जीवन के संदर्भ में चर्चा करते हैं, तब योग की प्राथमिकता से हम अवगत होते हैं।अष्टांग योग का द्वितीय सोपान नियम है। नियम के बगैर इस संसार में कुछ भी चलायमान नहीं है। सूर्य नित्य बिना किसी आलस्य और व्यर्थ की प्रतिस्पर्धा के बगैर निरंतर हर दिन उगता है और चंद्रमा भी स्थितप्रज्ञ के समान अपने हिस्से की चांदनी बिना किसी रोक-टोक के बिखेरता है। प्रकृति का सब कुछ नियमबद्ध है और जब यह नियमबद्धता टूटती है, तब प्रकृति का सुंदर हरा-भरा कलेवर भी हमें रास नहीं आता।जब प्रकृति नियमों पर इतनी अडिग है तो भला वह मनुष्य को उच्छृंखल होने के लिए कैसे छोड़ सकती है? प्रकृति जब अपने नियम से हटती है तब विकराल घटनाएं घटती हैं और विध्वंस होता है। प्रकृति के समान ही जीवन में भी नियमबद्धता आवश्य...

जन्मान्तरीय पापोंसे रोगोंकी उत्पत्ति

* समस्त प्राणियोंमें मानव श्रेष्ठ है; क्योंकि इसने शारीरिक उन्नतिके साथ-साथ आध्यात्मिक उन्नतिके शास्त्र रचे तथा ईश्वरीय प्रेरणा एवं साधनासे गहन अध्ययन किया और शास्त्रोंके सारको ग्रहणकर सुखी रहनेके उपाय ढूँढ़े, आरोग्यकी महत्ता समझी और जहाँ ये उपाय रुक गये तथा रोग-मुक्तिके उपाय न दीखे तो रोग क्यों होता है, इसकी खोज की और जितना हो सका आयुर्वेदसे लाभ लिया, शेष धर्मशास्त्रोंसे भी लाभ लिया है। यहाँ आयुर्वेदकी अपेक्षा विभिन्न धर्मशास्त्रों (स्मृतियों) में रोग उत्पन्न होनेके जो लक्षण दिये गये हैं और जन्मान्तरीय किस निन्दित कर्मसे वर्तमानमें कौन-सा रोग हुआ है, इसका संक्षेपमें विचार किया गया है पूर्वजन्ममें किये पापोंसे रोग होते हैं और फिर रोगजनित चिह्न भी प्रकट होते हैं, पर जप आदि दैवव्यपाश्रयसे उनकी शान्ति भी हो जाती है अर्थात् रोग ठीक हो जाते हैं- पूर्वजन्मकृतं पापं नरकस्य परिक्षये। बाधते व्याधिरूपेण तस्य जप्यादिभिः शमः॥ (शाता० स्मृति १५) धर्मशास्त्रोंमें निर्दिष्ट कर्मविपाकका संक्षेपमें यहाँ वर्णन किया जा रहा है- *(१)क्षयरोग*- इसके सम्बन्धमें कहा गया है कि यह रोग तेल, घी तथा चिकनी वस्तु चुरा...

दीक्षा के प्रकार

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------  दीक्षा के 8 प्रकार मुख्य रूप से हैं-   1. समय दीक्षा- साधना पथ की ओर अग्रसर करना, विचार शुद्ध करना इसमें आता है।    2. ज्ञान दीक्षा- इसमें विचारों की शुद्धि की जाती है।    3. मार्ग दीक्षा- इसमें बीज मंत्र दिया जाता है।   4. शाम्भवी दीक्षा- गुरु, शिष्य की रक्षा का भार स्वयं ले लेते हैं जिससे साधना में अवरोध न हो।   5. चक्र जागरण दीक्षा- मूलाधार चक्र जागृत किया जाता है।    6. विद्या दीक्षा- इसमें शिष्य को विशेष ज्ञान तथा सिद्धियां प्रदान की जाती हैं।    7. शिष्याभिषेक दीक्षा- इसमें तत्व, भोग, शांति निवृत्ति की पूर्णता कराई जाती है।    8. पूर्णाभिषेक दीक्षा- इसमें गुरु अपनी सभी शक्तियां शिष्य को प्रदान करते हैं, जैसे स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने स्वामी विवेकानंद को दी थीं।                                       ...

चौसठ कलाये

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------  64कलाये इस प्रकार हैं व्यवहारिक ४४ कलाएँ- 1. ध्यान, प्राणायाम, आसन आदि की विधि 2. हाथी, घोड़ा, रथ आदि चलाना 3. मिट्टी और कांच के बर्तनों को साफ रखना 4. लकड़ी के सामान पर रंग-रोगन सफाईकरना 5. धातु के बर्तनों को साफ करना औरउन पर पालिश करना 6. चित्र बनाना 7. तालाब, बावड़ी, कमान आदि बनाना 8. घड़ी, बाजों और दूसरी मशीनों को सुधारना 9. वस्त्र रंगना 10. न्याय, काव्य, ज्योतिष, व्याकरण सीखना 11. नांव, रथ, आदि बनाना 12. प्रसव विज्ञान 13. कपड़ा बुनना, सूत कांतना, धुनना 14. रत्नों की परीक्षा करना 15. वाद-विवाद, शास्त्रार्थ करना 16. रत्न एवं धातुएं बनाना 17. आभूषणों पर पालिश करना 18. चमड़े की मृदंग, ढोल नगारे, वीणा वगैरेह तैयार करना 19. वाणिज्य 20. दूध दुहना 21. घी, मरूवन तपाना, 22. कपड़े सीना 23. तरना 24. घर को सुव्यवस्थित रखना 25. कपड़े धोना 26. केश-श्रृंगार 27. मृदु भाषण वाक्पटुता 28. बांस के टोकने, पंखे, चटाई आदि बनाना 29. कांच के बर्तन बनाना 30. बाग बगीचे लगाना, वृक्षारोपण, ज...

सनातन में संक्रमण से बचने हेतु नियम

*सनातन धर्म में हजारों सालों से संक्रमण से बचने के लिए कुछ सूत्र* जो अब पूरी दुनिया अपना रही है - - घ्राणास्ये वाससाच्छाद्य मलमूत्रं त्यजेत् बुध:।  (वाधूलस्मृति 9) - नियम्य प्रयतो वाचं संवीताङ्गोऽवगुण्ठित:।(मनुस्मृति 4/49)) - नाक, मुंह तथा सिर को ढ़ककर, मौन रहकर मल मूत्र का त्याग करना चाहिए। *तथा न अन्यधृतं धार्यम्* (महाभारत अनु.104/86) दुसरों के पहने कपड़े नहीं पहनने चाहिए। *स्नानाचारविहीनस्य सर्वा:स्यु: निष्फला: क्रिया:*(वाधूलस्मृति 69) स्नान और शुद्ध आचार के बिना सभी कार्य निष्फल हो जाते हैं, अतः: सभी कार्य स्नान करके शुद्ध होकर करने चाहिए। *लवणं व्यञ्जनं चैव घृतं तैलं तथैव च। लेह्यं पेयं च विविधं हस्तदत्तं न भक्षयेत्।*(धर्मसिंधु 3 पू.आह्निक) नमक, घी, तैल, कोई भी व्यंजन, चाटने योग्य एवं पेय पदार्थ यदि हाथ से परोसे गए हों तो न खायें, चम्मच आदि से परोसने पर ही ग्राह्य हैं। *न अप्रक्षालितं पूर्वधृतं वसनं बिभृयात्।*(विष्णुस्मृति 64) पहने हुए वस्त्र को बिना धोए पुनः न पहनें। पहना हुआ वस्त्र धोकर ही पुनः पहनें। *न चैव आर्द्राणि वासांसि नित्यं सेवेत मानव:।*(महाभारत अनु.104/52) *न आर्द्...

चौराशी लाख योनियों का प्रमाण

कौन कौन सी है यह 84 लाख योनियां  : पदम् पुराण में हमें एक श्लोक मिलता है जो इस धरती पर जलचर, नभचर , स्थलचर एककोशिकीय, बहुकोशिकीय, और अन्य कोटि के जीव जंतु की संख्या बतायी गयी है। श्लोक इस तरह है जलज नव लक्षाणी, स्थावर लक्ष विम्शति, कृमयो रूद्र संख्यकः अर्थ : पानी के जीव जंतु 9 लाख , स्थिर प्राणी यानि पेड़ 20 लाख ,11 लाख सर्प समान जहरीले पक्षिणाम दश लक्षणं, त्रिन्शल लक्षानी पशवः, चतुर लक्षाणी मानवः  अर्थ : पक्षी 10 लाख, पशु स्थल वाले 30 लाख और 4 लाख मनुष्य समान प्राणी , जलीय जीव – 9 लाख स्थिर पेड़ पोधे – 20 लाख सरीसृप/कृमी/कीड़े-मकोड़े – 11 लाख नभचर– 10 लाख स्थलीय/थलचर – 30 लाख मानवीय नस्ल के बन्दर वनमानुष आदि – 4 लाख कुल प्रजातिया = 84 लाख योनियां  । आधुनिक विज्ञान का मत : हमारे वैज्ञानिक अभी तक 13 लाख जीवो की खोज कर चुके है और अभी भी उनका शोध चालू है | हर साल उनकी शोध में नए नए जीव सामने आ रहे है | हमारे पुराणों ने कई युगों पहले ही जो बात बता दी थी , उस बात के करीब धीरे धीरे वैज्ञानिक और खोजकर्ता पहुँच रहे है |

अनुष्ठान के सामान्य नियम

सफल मन्त्रानुष्ठान के लिए साधक को नियम संयम विधि विधान के साथ साथ गुरु परामर्श, समय बाध्यता, स्वर, दिशा एवं ऐसे की कई अन्य नियमो का पालन आवश्यक होता है ही, कुछ अन्य नियम भी हैं, जिनका पालन करना आवश्यक होता है। प्राचीन कालीन ऋषि मुनियों ने इनका परीक्षण कर इनको अनुभूत किया तत्पश्चात इनकी व्यावहारिक उपयोगिता एवं प्रभाव को स्वीकार किया।   अनुभव के आधार मन्त्र विधान के अन्तर्गत साधक को जो निर्देश दिये गये है वे इस प्रकार से हैं - ♦   स्थान की भांति समय भी निश्चित रहे। साधना नियमित होनी चाहिए। ♦   स्नान करके शुद्ध व स्वच्छ वस्त्र पहनकर साधना स्थल में जाना चाहिए। ♦   दिनभर के पहने हुए वस्त्र अनुष्ठान के समय नहीं पहनने चाहिए। ♦   वस्त्र कम से कम हों। सिला हुआ वस्त्र पहनना वर्जित है। ♦   साधना स्थल पूर्णतया शान्त, सुरक्षित और एकान्त में हो। ♦   साधना काल में भोजन शुद्ध, सात्विक और सूक्ष्म होना चाहिए। ♦   साधना काल की अपनी अनुभूतियों का वर्णन नहीं करना चाहिए। ♦   आसन पर एक बार बैठ जाने पर बार-बार उठना उचित नहीं ह...

अनुलोम विलोम काब्य

*अति दुर्लभ एक ग्रंथ ऐसा भी है हमारे सनातन धर्म मे* इसे तो सात आश्चर्यों में से पहला आश्चर्य माना जाना चाहिए --- *यह है दक्षिण भारत का एक ग्रन्थ* क्या ऐसा संभव है कि जब आप किताब को सीधा पढ़े तो राम कथा के रूप में पढ़ी जाती है और जब उसी किताब में लिखे शब्दों को उल्टा करके पढ़े तो कृष्ण कथा के रूप में होती है । जी हां, कांचीपुरम के 17वीं शदी के कवि वेंकटाध्वरि रचित ग्रन्थ "राघवयादवीयम्" ऐसा ही एक अद्भुत ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ को ‘अनुलोम-विलोम काव्य’ भी कहा जाता है। पूरे ग्रन्थ में केवल 30 श्लोक हैं। इन श्लोकों को सीधे-सीधे पढ़ते जाएँ, तो रामकथा बनती है और विपरीत (उल्टा) क्रम में पढ़ने पर कृष्णकथा। इस प्रकार हैं तो केवल 30 श्लोक, लेकिन कृष्णकथा (उल्टे यानी विलोम)के भी 30 श्लोक जोड़ लिए जाएँ तो बनते हैं 60 श्लोक। पुस्तक के नाम से भी यह प्रदर्शित होता है, राघव (राम) + यादव (कृष्ण) के चरित को बताने वाली गाथा है ~ "राघवयादवीयम।" उदाहरण के तौर पर पुस्तक का पहला श्लोक हैः वंदेऽहं देवं तं श्रीतं रन्तारं कालं भासा यः । रामो रामाधीराप्यागो लीलामारायोध्ये वासे ॥ १॥ अर्थातः मैं उन ...

वैष्णव पवित्र चिन्ह

तप्त-शंख-चक्र से मनुष्य मोक्ष का अधिकारी ----------------------------------------------------   'अश्नुते शृतास' -----------------   पवित्रं ते विततं ब्रह्मणस्पते प्रभुर्गात्राणि पर्येषि विश्वत: । अतप्ततनूर्न तदामो अश्नुते शृतास इद्वहन्तस्तत्समाशत ।।       –ऋग्वेद, मण्डल 9, सूक्त 83,1  सायणभाष्यम् ----------------- 'पवित्रं ते ' इति पञ्चर्चं षोडशं सूक्तमाङ्गिरसस्य पवित्रस्यार्षं जागतं पवमानसोमदेवताकम् । तथा चानु शंख-क्रान्तं- 'पवित्रं ते पवित्रः' इति । अभिष्टव आद्ये ऋचौ वक्तव्ये । सूत्रितं च पवित्रं ते विततं ब्रह्मणस्पत इति द्वे वि यत्पवित्रं धिषणा अतन्वत ' ( आश्व. श्रौ. 4,6) इति ॥ प॒वित्रं॑ ते॒ वित॑तं ब्रह्मणस्पते प्र॒भुर्गात्रा॑णि॒ पर्ये॑षि वि॒श्वतः॑ । अत॑प्ततनू॒र्न तदा॒मो अ॑श्नुते शृ॒तास॒ इद्वहं॑त॒स्तत्समा॑शत ॥१ पदार्थान्वयः -------------- प॒वित्र॑म् । ते॒ । विऽत॑तम् । ब्र॒ह्म॒णः॒ । प॒ते॒ । प्र॒ऽभुः । गात्रा॑णि । परि॑ । ए॒षि॒ । वि॒श्वतः॑ । अत॑प्तऽतनूः । न । तत् । आ॒मः । अ॒श्नु॒ते॒ । शृ॒तासः॑ । इत् । वह॑न्तः । तत् । सम् । आ॒श॒त॒ ॥१ पवित्रम् । ते । विऽततम् ...

शिव और शंकर के स्वरूप भेद

शिव और शंकर के स्वरूप भेद       निराकार ब्रह्म का स्वरूप है शिव , शाश्वत ओर अनंत है । एक से अनेक बनू की इच्छामात्र से उनकी महामाया ( महाकालि ) प्रकट हुई और पंचतत्व जल , वायु , अग्नि , भूमि और आकाशतत्व का सर्जन हुवा । जलतत्व से शक्ति ( देवी ) , वायुतत्व से नारायण ( विष्णु ), अग्नितत्वसे सूर्य ( आदित्य ), भूमितत्व से महागणपति ( ब्रह्मा ) और आकाशतत्व से रुद्र ( शंकर ) प्रकट हुवे । चौदह ब्रह्मांड जल , स्थल , वायु वनस्पति के साथ अनेक जीव सृष्टि की रचना हुई । देव , दानव , यक्ष , किन्नर , गांधर्व , चारण , सर्प , वानर , मानव और जलचर , खेचर , भूचर जीव सृष्टि की रचना हुई । सृजन ज्ञान ( ब्रह्मा ) सृष्टि का संचालन ( विष्णु ) सृष्टिलय (शंकर ) प्रकृति पोषण ( सूर्य ) और आसुरी दमन ( देवी ) का कार्यभार है ।     सनातन धर्म की विविध पूजा उपासना ओर विविध संप्रदायों के अपने इष्ट की प्रसंशा ग्रंथोंसे मूल सत्य को अलिप्त कर दिया । आजके आधुनिक युगमे समय अभाव और साम्प्रदायिक प्रचारों से नई पीढ़ी भ्रमित है । राम और कृष्ण भी शिव की उपासना करते थे वो तो रामायण और कृष्णलीला के ग्रंथोके आ...

दस पवित्र पक्षी

दस पवित्र पक्षी और उनका रहस्य 🔸🔸🔹🔸🔹🔸🔹🔸🔸 आइये जाने उन दस दिव्य और पवित्र पक्षीयों के बारे मैं जिनका हिंदू धर्म में बहुत ही महत्व माना गया है... हंस👉 जब कोई व्यक्ति सिद्ध हो जाता है तो उसे कहते हैं कि इसने हंस पद प्राप्त कर लिया और जब कोई समाधिस्थ हो जाता है, तो कहते हैं कि वह परमहंस हो गया। परमहंस सबसे बड़ा पद माना गया है। हंस पक्षी प्यार और पवित्रता का प्रतीक है। यह बहुत ही विवेकी पक्षी माना गया है। आध्यात्मिक दृष्टि मनुष्य के नि:श्वास में 'हं' और श्वास में 'स' ध्वनि सुनाई पड़ती है। मनुष्य का जीवन क्रम ही 'हंस' है क्योंकि उसमें ज्ञान का अर्जन संभव है। अत: हंस 'ज्ञान' विवेक, कला की देवी सरस्वती का वाहन है। यह पक्षी अपना ज्यादातर समय मानसरोवर में रहकर ही बिताते हैं या फिर किसी एकांत झील और समुद्र के किनारे। हंस दांप‍त्य जीवन के लिए आदर्श है। यह जीवन भर एक ही साथी के साथ रहते हैं। यदि दोनों में से किसी भी एक साथी की मौत हो जाए तो दूसरा अपना पूरा जीवन अकेले ही गुजार या गुजार देती है। जंगल के कानून की तरह इनमें मादा पक्षियों के लिए लड़ाई नहीं होती। ...

वेद पुरुष मूर्त रूप

·  वेद रूप पुरुष के मुख्य छह अंगो में --- व्याकरण शास्त्र ....वेद का मुख , ज्योतिष शास्त्र ....दोनों नेत्र , निरुक्त ....दोनों कान , कल्प शास्त्र ....दोनों हाथ , शिक्षा शास्त्र ....वेद की नासिका और छंद शास्त्र ....वेद पुरुष के दोनों पैर कहे गए है । वेदांग / Vedang • वेद पुरुष के 6 अंग माने गये हैं- कल्प, शिक्षा, छन्द, व्याकरण, निरुक्त तथा ज्योतिष। मुण्डकोपनिषद में आता है- 'तस्मै स हो वाच। द्वै विद्ये वेदितब्ये इति ह स्म यद्ब्रह्म विद्यौ वदंति परा चैवोपरा च॥ तत्रापरा ॠग्वेदो यजुर्वेद: सामवेदोऽर्थ वेद: शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दोज्योतिषमिति। अथ परा यथा तदक्षरमधिगम्यते॥'* 'अर्थात मनुष्य को जानने योग्य दो विद्याएं हैं-परा और अपरा। उनमें चारों वेदों के शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद, ज्योतिष- ये सब 'अपरा' विद्या हैं तथा जिससे वह अविनाशी परब्रह्म तत्व से जाना जाता है, वही 'परा' विद्या है।' इन छ: को इस प्रकार बताया गया है- ज्योतिष वेद के दो नेत्र हैं, निरुक्त 'कान' है, शिक्षा 'नाक', व्याकरण 'मुख' तथा कल्प 'दोनों हाथ...

शिव के पैतीस रहस्य

भगवान शिव के पेंतीस रहस्य !     भगवान शिव अर्थात पार्वती के पति शंकर जिन्हें महादेव, भोलेनाथ, आदिनाथ आदि कहा जाता है, उनके बारे में यहां प्रस्तुत हैं 35 रहस्य।   1. आदिनाथ शिव : - सर्वप्रथम शिव ने ही धरती पर जीवन के प्रचार-प्रसार का प्रयास किया इसलिए उन्हें 'आदिदेव' भी कहा जाता है। 'आदि' का अर्थ प्रारंभ। आदिनाथ होने के कारण उनका एक नाम 'आदिश' भी है।   2. शिव के अस्त्र-शस्त्र : - शिव का धनुष पिनाक, चक्र भवरेंदु और सुदर्शन, अस्त्र पाशुपतास्त्र और शस्त्र त्रिशूल है। उक्त सभी का उन्होंने ही निर्माण किया था।   3. शिव का नाग : - शिव के गले में जो नाग लिपटा रहता है उसका नाम वासुकि है। वासुकि के बड़े भाई का नाम शेषनाग है।   4. शिव की अर्द्धांगिनी : - शिव की पहली पत्नी सती ने ही अगले जन्म में पार्वती के रूप में जन्म लिया और वही उमा, उर्मि, काली कही गई हैं।   5. शिव के पुत्र : - शिव के प्रमुख 6 पुत्र हैं- गणेश, कार्तिकेय, सुकेश, जलंधर, अयप्पा और भूमा। सभी के जन्म की कथा रोचक है।   6. शिव के शिष्य : - शिव के 7 शिष्य हैं जिन्हें प्रारंभिक सप्तऋषि माना गया है।...

ग्रह और रोग

आचार्य डॉ0 विजय शंकर मिश्र (प्रशासनिक सेवा)  -------------------------------------------------------------- चिकित्सा ज्योतिष में ग्रहों के कारक तत्व |  जैसे भचक्र की भिन्न-भिन्न राशियों तथा नक्षत्रों का अधिकार क्षेत्र शरीर के विभिन्न अंगों पर है, ठीक उसी प्रकार भिन्न-भिन्न ग्रह भी शरीर के विभिन अंगों से संबंधित है. इसके अतिरिक्त कुछ रोग, ग्रह अथवा नक्षत्र की स्वाभाविक प्रकृति के अनुसार जातक को कष्ट देते हैं. अत: भावों, राशियों, नक्षत्रों तथा ग्रहों एवं विशिष्ट समय पर चल रही दशाओं के व्यापक विचार के बाद शरीर पर रोग का स्थान एवं प्रकृति, निदान तथा रोग का संभावित समय एवं परिणाम ज्ञात करना भी संभव है. चिकित्सा ज्योतिष में विभिन्न ग्रहों के कारक तत्व यहाँ पर संक्षिप्त रूप में दिये जा रहे है. सूर्य | The Sun यह पित्त प्रकृति का कारक ग्रह है. इसका बलाबल किसी व्यक्ति के सामान्य स्वास्थ्य को प्रतिबिंबित करता है. इनका अधिकार क्षेत्र ह्रदय, पेट, अस्थि तथा दाहिनी आँख है. चिकित्सीय क्षेत्र में सूर्य के अधिकार क्षेत्र में सिरदर्द, गंजापन,चि़डचिडापन, ज्वर, दर्द, जलना, पित की सूजन से होने वाल...

स्त्रियों को प्रवचन अधिकार क्यों नही है

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------  पुनः प्रशारण।  जब शासकों के शासक पूज्य श्री शंकराचार्यों जी ने बार बार कहा है कि व्यासपीठ पर स्त्री का अधिकार नही है और वेदों और पुराणों में भी कहा गया है कि केवल विरक्त ब्राह्मण जो कि वैष्णव हो वही व्यासपीठ पर बैठ सकता है ,तब ये 2 रुपए की ख्याति प्राप्त करने के लिए ये स्त्रियां क्यूं शास्त्र की अवमानना कर रही है । अपने कर्तव्य का पालन और दूसरे के अधिकार की रक्षा करने से ही परमार्थ में सिद्धि मिलती है । किन्तु जब अपने कर्तव्य का ज्ञान ही नही रहता और दूसरे के अधिकार पाने की कामना मन मे जगने लगती है( दूसरे की थाली में लड्डू बड़ा लगने लगता है ) तब पारमार्थिक सिद्धि तो दूर की बात लौकिक उत्कर्ष को भी मनुष्य प्राप्त नही होता है । व्यासपीठ केवल शेरो शायरी करने के लिए नही है । व्यासपीठ की एक गरिमा है जिसे बनाये रखना बहुत आवश्यक है । वर्तमान में जहां राजपीठ का शोधन आवश्यक वही व्यासपीठ का भी शोधन परम् आवश्यक है । क्यूं स्त्रियों को व्यसपीठ का अधिकार नही है !! ये कारण देखे?...

जप के आवश्यक नियम

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------  जप के लिए आवश्यक विधान             उपरोक्त बातों को ध्यान में रखने के अतिरिक्त प्रतिदिन की साधना के लिए कुछ बातें नीचे दी जा रही हैं : 1.         समय 2.         स्थान 3.         दिशा 4.         आसन 5.         माला 6.         नामोच्चारण 7.         प्राणायाम 8.         जप 9.         ध्यान   1.    समय: सबसे उत्तम समय प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त और तीनों समय (सुबह सूर्योदय के समय, दोपहर 12 बजे के आसपास व सांय सूर्यास्त के समय) का संध्याकाल है | प्रतिदिन निश्चित समय पर जप करने से बहुत लाभ होता है |   2.    स्थान: प्रतिदिन एक ही स्थान पर बैठना बहुत लाभदायक है | अतः अपना साधना-कक्ष अलग रखो | यदि स...

हनुमान के भाई

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●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------  हनुमान के कितने भाई? ‘रामायण’ से लेकर ‘उत्तर रामायण’ तक सब देख-सुन जाने के बाद भी ऐसा तो कहीं नहीं मिला. न तो महर्षि वाल्मीकि ने अपनी ‘रामायण’ में ये बताया, न ही गोस्वामी तुलसीदास ने अपने महाकाव्य ‘रामचरितमानस’ में इसका वर्णन किया. फिर हनुमान के सगे भाइयों की कहानी कहां लिखी है? ‘ब्रह्मांड पुराण’ में विस्तार से लिखा है दरअसल, हनुमान के पिता केसरी के विवाह और उनके पुत्रों के बारे में विस्तार से बताया गया है पुराणों में. ‘ब्रह्मांड पुराण’ और ‘वायु पुराण’ में वानरों की वंशावली के साथ-साथ कई अनूठी कहानियां मिलती हैं. ‘ब्रह्मांड पुराण’ में लिखा है कि केसरी ने कुंजर की पुत्री अंजना को पत्नी के रूप में स्वीकार्य किया. अंजना के गर्भ से और वायु के अंश से हनुमान का जन्म हुआ. अंजना के गर्भाधान संस्कार और पुंसवन संस्कार की भी जानकारी दी गई है. पुराण में अंजना को रूपवती भी बताया गया है. इसी पुराण में हनुमान के पांच भाइयों के बारे में क्रम से बताया गया है. उनमें सबसे ब...

ओम निरंजन

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नीलकंठ साधना

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------  कौई भी साधना गुरु सानिध्य मैं करै. नीलकंठ अघोर मंत्र स्तोत्र संकल्प:(विनियोग ): ओम अस्य श्री नीलकंठ स्तोत्र-मन्त्रस्य ब्रह्म ऋषि अनुष्टुप छंद :नीलकंठो सदाशिवो देवता ब्रह्म्बीजम पार्वती शक्ति:शिव इति कीलकं मम काय जीव स्वरक्षनार्थे सर्वारिस्ट विनाशार्थेचतुर्विद्या पुरुषार्थ सिद्धिअर्थे भक्ति-मुक्ति सिद्धिअर्थे श्री परमेश्वर प्रीत्यर्थे च जपे पाठे विनियोग: मंत्र प्रयोग ओम नमो नीलकंठाय श्वेत शरीराय नमःसर्पलिंकृत भुषनाय नमः भुजंग परिकराय नाग यग्नोपविताय नमः,अनेक काल मृत्यु विनाशनाय नमः,युगयुगान्त काल प्रलय प्रचंडाय नमः ज्वलंमुखाय नमः दंष्ट्रा कराल घोर रुपाय नमः हुं हुं फट स्वाहा,ज्वालामुख मंत्र करालाय नमः,प्रचंडार्क सह्स्त्रान्शु प्रचंडाय नमः कर्पुरामोद परिमलांग सुगंधीताय नमः इन्द्रनील महानील वज्र वैदूर्यमणि माणिक्य मुकुट भूषणाय नमः श्री अघोरास्त्र मूल मन्त्रस्य नमः ओम ह्रां स्फुर स्फुर ओम ह्रीं स्फुर स्फुर ओम ह्रूं स्फुर स्फुर अघोर घोरतरस्य नमः रथ रथ तत्र तत्र चट चट कह क...

श्रीगुरु स्त्रोतम

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------     श्री गुरु स्तोत्रम् ~ श्री महादेव्युवाच || गुरुर्मन्त्रस्य देवस्य धर्मस्य तस्य एव वा | विशेषस्तु महादेव ! तद् वदस्व दयानिधे || श्री गुरु स्तोत्रम् श्री महादेवी (पार्वती) ने कहा : हे दयानिधि शंभु ! गुरुमंत्र के देवता अर्थात् श्री गुरुदेव एवं उनका आचारादि धर्म क्या है – इस बारे में वर्णन करें | श्री महादेव उवाच || जीवात्मनं परमात्मनं दानं ध्यानं योगो ज्ञानम् | उत्कल काशीगंगामरणं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ||१|| श्री महादेव बोले : जीवात्मा-परमात्मा का ज्ञान, दान, ध्यान, योग पुरी, काशी या गंगा तट पर मृत्यु – इन सबमें से कुछ भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ||१|| प्राणं देहं गेहं राज्यं स्वर्गं भोगं योगं मुक्तिम् | भार्यामिष्टं पुत्रं मित्रं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ||२|| प्राण, शरीर, गृह, राज्य, स्वर्ग, भोग, योग, मुक्ति, पत्नी, इष्ट, पुत्र, मित्र – इन सबमें से कुछ भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ||२|| वा...