जप के आवश्यक नियम

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        ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗
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👉🏻 प्रिय पाठकों------- 
जप के लिए आवश्यक विधान
            उपरोक्त बातों को ध्यान में रखने के अतिरिक्त प्रतिदिन की साधना के लिए कुछ बातें नीचे दी जा रही हैं :
1.         समय
2.         स्थान
3.         दिशा
4.         आसन
5.         माला
6.         नामोच्चारण
7.         प्राणायाम
8.         जप
9.         ध्यान
 
1.    समय:
सबसे उत्तम समय प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त और तीनों समय (सुबह सूर्योदय के समय, दोपहर 12 बजे के आसपास व सांय सूर्यास्त के समय) का संध्याकाल है | प्रतिदिन निश्चित समय पर जप करने से बहुत लाभ होता है |
 
2.    स्थान:
प्रतिदिन एक ही स्थान पर बैठना बहुत लाभदायक है | अतः अपना साधना-कक्ष अलग रखो | यदि स्थानाभाव के कारण अलग कक्ष न रख सकें तो घर का एक कोना ही साधना के लिए रखना चाहिए | उस स्थान पर संसार का कोई भी कार्य या वार्तालाप न करो | उस कक्ष या कोने को धूप-अगरबत्ती से सुगंधित रखो | इष्ट अथवा गुरुदेव की छवि पर सुगंधित पुष्प चढ़ाओ और दीपक करो | एक ही छवि पर ध्यान केन्द्रित करो | जब आप ऐसे करोगे तो उससे जो शक्तिशाली स्पन्दन उठेंगे, वे उस वातावरण में ओतप्रोत हो जायेंगे |
 
3.    दिशा
जप पर दिशा का भी प्रभाव पड़ता है | जप करते समय आपक मुख उत्तर अथवा पूर्व की ओर हो तो इससे जपयोग में आशातीत सहायता मिलती है |
 
4.    आसन
आसन के लिए मृगचर्म, कुशासन अथवा कम्बल के आसन का प्रयोग करना चाहिए | इससे शरीर की विद्युत-शक्ति सुरक्षित रहती है |
 
            साधक स्वयं पद्मासन, सुखासन अथवा स्वस्तिकासन पर बैठकर जप करे | वही आसन अपने लिए चुनो जिसमें काफी देर तक कष्टरहित होकर बैठ सको | स्थिरं सुखासनम् | शरीर को किसी भी सरल अवस्था में सुखपूर्वक स्थिर रखने को आसन कहते हैं |
 
            एक ही आसन में स्थिर बैठे रहने की समयाविधि को अभ्यासपूर्वक बढ़ाते जाओ | इस बात का ध्यान रखो कि आपका सिर, ग्रीवा तथा कमर एक सीध में रहें | झुककर नहीं बैठो | एक ही आसन में देर तक स्थिर होकर बैठने से बहुत लाभ होता है |
 
5.    माला
मंत्रजाप में माला अत्यंत महत्वपूर्ण है | इसलिए समझदार साधक माला को प्राण जैसी प्रिय समझते हैं और गुप्त धन की भाँति उसकी सुरक्षा करते हैं |
 
            माला को केवल गिनने की एक तरकीब समझकर अशुद्ध अवस्था में भी अपने पास रखना, बायें हाथ से माला घुमाना, लोगों को दिखाते फिरना, पैर तक लटकाये रखना, जहाँ-तहाँ रख देना, जिस किसी चीज से बना लेना तथा जिस प्राकार से गूँथ लेना सर्वथा वर्जित है |
 
जपमाला प्रायः तीन प्रकार की होती हैं: करमाला, वर्णमाला और मणिमाला |
 
a.                  करमाला
अँगुलियों पर गिनकर जो जप किया जाता है, वह करमाला जाप है | यह दो प्रकार से होता है: एक तो अँगुलियों से ही गिनना और दूसरा अँगुलियों के पर्वों पर गिनना | शास्त्रतः दूसरा प्रकार ही स्वीकृत है |
 
            इसका नियम यह है कि चित्र में दर्शाये गये क्रमानुसार अनामिका के मध्य भाग से नीचे की ओर चलो | फिर कनिष्ठिका के मूल से अग्रभाग तक और फिर अनामिका और मध्यमा के अग्रभाग पर होकर तर्जनी के मूल तक जायें | इस क्रम से अनामिका के दो, कनिष्ठिका के तीन, पुनः अनामिका का एक, मध्यमा का एक और तर्जनी के तीन पर्व… कुल दस संख्या होती है | मध्यमा के दो पर्व सुमेरु के रूप में छूट जाते हैं |
 
 
 
 
      साधारणतः करमाला का यही क्रम है, परन्तु अनुष्ठानभेद से इसमें अन्तर भी पड़ता है | जैसे शक्ति के अनुष्ठान में अनामिका के दो पर्व, कनिष्ठिका के तीन, पुनः अनामिका का एक, मध्यमा के तीन पर्व और तर्जनी का एक मूल पर्व- इस प्रकार दस संख्या पूरी होती है |
 
            श्रीविद्या में इससे भिन्न नियम है | मध्यमा का मूल एक, अनामिका का मूल एक, कनिष्ठिका के तीन, अनामिका और मध्यमा के अग्रभाग एक-एक और तर्जनी के तीन - इस प्रकार दस संख्या पूरी होती है |
 
            करमाला से जप करते समय अँगुलियाँ अलग-अलग नहीं होनी चाहिए | थोड़ी-सी हथेली मुड़ी रहनी चाहिए | सुमेरु का उल्लंघन और पर्वों की सन्धि (गाँठ) का स्पर्श निषिद्ध है | यह निश्चित है कि जो इतनी सावधानी रखकर जप रखकर जप करेगा, उसका मन अधिकांशतः अन्यत्र नहीं जायेगा |
 
            हाथ को हृदय के सामने लाकर, अँगुलियों को कुछ टेढ़ी करके वस्त्र से उसे ढककर दाहिने हाथ से ही जप करना चाहिए |
 
            जप अधिक संख्या में करना हो तो इन दशकों को स्मरण नहीं रखा जा सकता | इसलिए उनको स्मरण करके के लिए एक प्रकार की गोली बनानी चाहिए | लाक्षा, रक्तचन्दन, सिन्दूर और गौ के सूखे कंडे को चूर्ण करके सबके मिश्रण से गोली तैयार करनी चाहिए | अक्षत, अँगुली, अन्न, पुष्प, चन्दन अथवा मिट्टी से उन दशकों का स्मरण रखना निषिद्ध है | माला की गिनती भी इनके द्वारा नहीं करनी चाहिए |
 
a.         वर्णमाला
वर्णमाला का अर्थ है अक्षरों के द्वारा जप की संख्या गिनना | यह प्रायः अन्तर्जप में काम आती है, परन्तु बहिर्जप में भी इसका निषेध नहीं है |
 
            वर्णमाला के द्वारा जप करने का विधान यह है कि पहले वर्णमाला का एक अक्षर बिन्दु लगाकर उच्चारण करो और फिर मंत्र का- अवर्ग के सोलह, कवर्ग से पवर्ग तक पच्चीस और यवर्ग से हकार तक आठ और पुनः एक लकार- इस क्रम से पचास तक की गिनती करते जाओ | फिर लकार से लौटकर अकार तक आ जाओ, सौ की संख्या पूरी हो जायेगी | ‘क्ष’ को सुमेरू मानते हैं | उसका उल्लंघन नहीं होना चाहिए |
 
            संस्कृत में ‘त्र’ और ‘ज्ञ’ स्वतंत्र अक्षर नहीं, संयुक्ताक्षर माने जाते हैं | इसलिए उनकी गणना नही होती | वर्ग भी सात नहीं, आठ माने जाते हैं | आठवाँ सकार से प्रारम्भ होता है | इनके द्वारा ‘अं’, कं, चं, टं, तं, पं, यं, शं’ यह गणना करके आठ बार और जपना चाहिए- ऐसा करने से जप की संखया 108 हो जाती है |
 
            ये अक्षर तो माला के मणि हैं | इनका सूत्र है कुण्डलिनी शक्ति | वह मूलाधार से आज्ञाचक्रपर्यन्त सूत्ररूप से विद्यमान है | उसीमें ये सब स्वर-वर्ण मणिरूप से गुँथे हुए हैं | इन्हींके द्वारा आरोह और अवरोह क्रम से अर्थात नीचे से ऊपर और ऊपर से नीचे जप करना चाहिए | इस प्रकार जो जप होता है, वह सद्यः सिद्धप्रद होता है |
 
b.         मणिमाला
मणिमाला अर्थात मनके पिरोकर बनायी गयी माला द्वारा जप करना मणिमाला जाप कहा जाता है |
 
            जिन्हें अधिक संख्या में जप करना हो, उन्हें तो मणिमामा रखना अनिवार्य है | यह माला अनेक वस्तुओं की होती है जैसे कि रुद्राक्ष, तुलसी, शंख, पद्मबीज, मोती, स्फटिक, मणि, रत्न, सुवर्ण, चाँदी, चन्दन, कुशमूल आदि | इनमें वैष्णवों के लिए तुलसि और स्मार्त, शाक्त, शैव आदि के लिए रुद्राक्ष सर्वोत्तम माना गया है | ब्राह्मण कन्याओं के द्वारा निर्मित सूत से बनायी गयी माला अति उत्तम मानी जाती है |
           
माला बनाने में इतना ध्यान अवश्य रखना चाहिए कि एक चीज की बनायी हुई माला में दूसरी चीज न आये | माला के दाने छोटे-बड़े व खंडित न हों |
 
सब प्रकार के जप में 108 दानों की माला काम आती है | शान्तिकर्म में श्वेत, वशीकरण में रक्त, अभिचार प्रयोग में काली और मोक्ष तथा ऐश्वर्य के लिए रेशमी सूत की माला विशेष उपयुक्त है |
 
माला घुमाते वक्त तर्जनी (अंगूठे के पासवाली ऊँगली) से माला के मनकों को कभी स्पर्श नहीं करना चाहिए | माला द्वारा जप करते समय अंगूठे तथा मध्यमा ऊँगली द्वारा माला के मनकों को घुमाना चाहिए | माला घुमाते समय सुमेरु का उल्लंघन नहीं करना चाहिए | माला घुमाते-घुमाते जब सुमेरु आये तब माला को उलटकर दूसरी ओर घुमाना प्रारंभ करना चाहिए |
 
यदि प्रमादवश माला हाथ गिर जाये तो मंत्र को दो सौ बार जपना चाहिए, ऐसा अग्निपुराण में आता है:
 
प्रामादात्पतिते सूत्रे जप्तव्यं तु शतद्वयम् |
अग्निपुराण: ३.२८.५
 
यदि माला टूट जाय तो पुनः गूँथकर उसी माला से जप करो | यदि दाना टूट जाय या खो जाय तो दूसरी ऐसी ही माला का दाना निकाल कर अपनी माला में डाल लो | किन्तु जप सदैव करो अपनी ही माला से क्योंकि हम जिस माला पर जप करते हैं वह माला अत्यंत प्रभावशाली होती है |
 
माला को सदैव स्वच्छ कपड़े से ढ़ाँककर घुमाना चाहिए | गौमुखी में माला रखकर घुमाना सर्वोत्तम व सुविधाजनक है |
 
ध्यान रहे कि माला शरीर के अशुद्ध माने जाने अंगों का स्पर्श न करे | नाभि के नीचे का पूरा शरीर अशुद्ध माना जाता है | अतः माला घुमाते वक्त माला नाभि से नीचे नहीं लटकनी चहिए तथा उसे भूमि का स्पर्श भी नहीं होना चहिए |
 
गुरुमंत्र मिलने के बाद एक बार माला का पूजन अवशय करो | कभी गलती से अशुद्धावस्था में या स्त्रियों द्वारा अनजाने में रजस्वलावस्था में माला का स्पर्श हो गया हो तब भी माला का फिर से पूजन कर लो |
 
माला पूजन की विधि: पीपल के नौ पत्ते लाकर एक को बीच में और आठ को अगल-बगल में इस ढ़ंग से रखो कि वह अष्टदल कमल सा मालूम हो | बीचवाले पत्र पर माला रखो और जल से उसे धो डालो | फिर पंचगव्य ( दूध, दही, घी, गोबर व गोमूत्र) से स्नान कराके पुनः शुद्ध जा से माला को धो लो | फिर चंदन पुष्प आदि से माला का पूजन करो | तदनंतर उसमें अपने इष्टदेवता की प्राण-प्रतिष्ठा करो और माला से प्रार्थना करो कि :
 
माले माले महामाले सर्वतत्त्वस्वरुपिणी |
चतुर्वर्गस्त्वयि न्यस्तस्तस्मान्मे सिद्धिदा भव ||
ॐ त्वं माले सर्वदेवानां सर्वसिद्धिप्रदा मता |
तेन सत्येन मे सिद्धिं देहि मातर्नमोऽस्तु ते |
त्वं मले सर्वदेवानां प्रीतिदा शुभदा भव |
शिवं कुरुष्व मे भद्रे यशो वीर्यं च सर्वदा ||
 
इस प्रकारा माला का पूजन करने से उसमें परमात्म-चेतना का अभिर्भाव हो जाता है | फिर माला गौमुखी में रखकर जप कर सकते हैं |
     
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