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सर्प भय परिहार मंत्र

।सर्प भय परिहार मन्त्र::।। माभिभेर्न मरिष्यसि परित्वा पामी सरवत:। घनेन हन्मि वृस्चिक महि दंडेनागतम् ।। आदित्य रथवेगेन विष्णुबाहुबलेन   च। गरुड़ पक्षनिपातेन भुमि गच्छ  महायशा:।। गरुडस्य पातमात्रेण त्रयो लोका: प्रकंपिता:। प्रकंपिता मही सरवा सशैलवनकनना।। गगनं नष्ट चंद्रार्क ज्योतिषं  न प्रकाशते ।  देवता भय भीताश्च मारुतो  न प्लवायति।। मारुतो    न  प्लवायत्यों           नम:।। भयो सरप भद्र भद्रं ते दुरं गच्छ महाविष। जन्मेजयस्य यज्ञांते आस्तिकवचनं स्मर ।। आस्तिक वचनं श्रुत्वा य: सरपोन निवर्तते । शताधाभिधाते मुदिर्न शिंशवृक्ष फलं यथा।। नरमदायै नम:  प्रातर्नमदायै नमोनिशी। नमोस्तु नरमदे तुभ्यं त्राहिमां विष सरपत:।। यो जरत्कारुणो जातो जरत्कार्वा महायशा:। तस्य स्मरामि भद्रंते दुरं गच्छ महाविष।। असितिं चार्थसिध्दीं च सुनितिं चापि य: स्मरेत। दिवा वा यदिवारात्रो नास्ति सरपभयं भवेत् ।। अगस्तिर्माधवश्चैव मुचुकुंदो महामुनि:। कपिलो मुनिरास्तिक : पंचैत सुखशायिन:।। साधना सिध्दि विज्ञानवाट