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असितांग भैरव उपासना

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------  असितांग भैरव को भैरव का उग्र रूप माना गया है | ऐसा माना गया है कि इस रूप में भैरव की उपासना आपके भयंकर से भयंकर रोग को भी दूर कर सकती है |कलियुग के समय में भैरव उपासना विशेष रूप से फल प्रदान करने वाली मानी गयी है | मंत्र द्वारा असितांग भैरव की एक रात्रि की साधना आपके असाध्य रोग में लाभ प्रदान करने वाली है | जो लोग लम्बे समय से किसी रोग से पीड़ित है और लाख यत्न के बाद भी उनका रोग ठीक नहीं हो पा रहा है तो असितांग भैरव मंत्र द्वारा रात्रि में नीचे दिए गये मंत्र का जप करना चाहिए | असितांग भैरव मंत्र : ||  ॐ भं भं सः असितांगाये नमः || मंत्र जप विधि : सामान्य रूप से भैरव के मंत्रों का जप रात्रि में करने का प्रावधान है | असितांग भैरव के इस मंत्र का जप भी रात्रि 9 बजे के बाद ही किया जाना चाहिए | मंत्र जप के लिए मंगलवार, शनिवार और रविवार के दिनों में से किसी भी एक दिन का चुनाव किया जा सकता है | पूर्व दिशा की तरफ एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर उसपर सिद्ध भैरव यन्त्र व असितांग ...

लक्ष्मी होम बिल्ब की महत्ता

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------  व्यापार वृद्धि यंत्र एवम सामान्य विधि यदि लगातार मेहनत के बाद भी आपको व्यापार में हानि हो रही है और आपको सदैव अपनी दुकान में चोरी का डर सताता रहता है तो आपको व्यापार वृद्धि यंत्र  को अपने व्यापास्थल पर स्थापित करना चाहिेए। इससे न केवल आपके व्यापार में वृद्धि होगी बल्कि व्यापार, नौकरी और रोजगार में आ रही अड़चने भी समाप्त हो सकती हैं। धन संबंधी समस्याओं से निजात पाने के लिए भी आप इस कारगर और चमत्कारी यंत्र का इस्तेमाल कर सकते हैं। तंत्रशास्त्र के अनुसार इस यंत्र को धनदाता और सर्वसिद्धि दाता के नाम से जाना जाता है।  व्यापार वृद्धि यंत्र के लाभ इस यंत्र को प्रतिष्ठित करने से व्यापार में आ रही रुकावटों से निजात मिल जाती है और व्यापार में बढ़ोत्तरी भी होती है।  यदि आपको व्यापार में लगातार घाटे का सामना करना पड़ रहा है तो आपको अपने व्यापार स्थल पर इस यंत्र को स्थापित करना चाहिए।  कार्यस्थल पर इस यंत्र को रखने से आश्चर्यजनक धन का आगमन होता है। कोई नया व्य...

एकादशमुखी हनुमान

एकादशमुखी हनुमानजी के रहस्य एवं कवच 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ एकादशमुखी हनुमानजी महात्म्य 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ शंकर जी बोले हे उमा ! परम भक्ति पद एकादश मुखी हनुमान जी का चरित्र ,इन्द्रियों से फ़ांस छुड़ाने वाला, इस संसार सागर से मोक्ष दिलाने वाला, सब संकट, दु:ख,ताप, भय को हरने वाला है। सुनो  दोहा भए पुकारत सुरन्ह सब, त्राहि त्राहि परमेश।  सीय रमन करुन अयन, हरहु हमर कलेश।। शिवजी कहते है कि - कालकारमुख नामक एक भयानक बलवान राक्षस हुआ। ग्यारह मुख वाले उस विकराल राक्षस ने बहुत काल तक ब्रम्हा जी की कठोर ताप किया। उसके ताप से प्रसन्न हो कर ब्रम्हा जी ने कालकार मुख राक्षस से कहा की हे तात मुझसे वर मांगो। असुर बोला कि हे कर्तार-आप मुझे ऐसा वर दीजिये -"मुझे कोई भी जीत न पावे ,रण में सामने काल भी क्यों न हो! जो मेरे जनम की तिथि पर ग्यारह मुख धारण करे वही मुझे मारे "तथास्तु कहकर चतुरानन ब्रम्हा जी अन्तर्ध्यान हो गए। वरदान पाकर अभिमानी असुर जगत में मनमानी करने लगा। उसने देवताओ के सभी अधिकार छीन लिए तथा श्रुतियो के सभी आचार भ्रष्ट कर दिए। संसार अति त्रस्त हो गया एवं अपार हाहाकार मच गया।...

लिंग उपासना

*लिंगोपासना*  निर्गुण-निराकार रूप में शिवलिंगोपासना की विशेष महिमा पुराणों में बतायी गयी है। पूजन के पूर्व नव निर्मित शिवलिंग की प्रतिष्ठा करनी चाहिए। वाण लिंग एवं नर्मदेश्वर लिंग स्वप्रतिष्ठित माने जाते हैं। इसके अतिरिक्त मन्दिर आदि स्थानों में पूर्व प्रतिष्ठित लिंग, स्वयम्भू लिंग तथा ज्योतिर्लिंग आदि देवों की उपासना में विशेष रूप से पार्थिव-लिंग-पूजन में प्रतिष्ठा तथा आवाहन विसर्जन आवश्यक होता है। शास्त्रों में यहाँ तक विवेचित है कि शिवलिंग में सभी देवताओं का पूजन किया जा सकता है- *शिवचलिंगेऽपि सर्वेषां देवानां पूजनं भवेत् ।* *सर्वलोकमये अस्माच्छिवशक्तिर्विभुः प्रभुः ।।* द्रष्टव्य बृहद्धर्मपुराण, अ. 57 /16 पुराण ग्रन्थों का अनुशीलन करने से शिवोपासना के परिप्रेक्ष्य में लिंग के स्वरूप, निर्माण उपासना विधि तथा उसके महत्ता का विशद् विवेचन मिलता है। कूर्म पुराण में लिंग को परिभाषित करते हुए कहा गया है कि जिसमें सभी कुछ लय हो जायें, वही लिंग है वही ब्रह्म शरीर ही है। स्कन्द पुराण में 'लयनाल्लिंगमुच्यते' कहा है जिसका अर्थ लय या प्रलय होता है, इसीलिए उसे लिंग कहते हैं। प्रलय का लिंग...

बगला प्रत्यंगिरा स्तोत्र

|| बगला प्रत्यंगिरा स्तोत्र || विनियोग-ओं अस्य श्री बगला-प्रत्यंगिरा मन्त्रस्य नारद ऋषिः, त्रिष्टुप छन्दः, प्रत्यंगिरा देवता, हलीं बीजं, हूं शक्तिः, ह्रीं कीलकम् हलीं हलीं हलीं हलीं प्रत्यंगिरा मम शत्रु विनाशे विनियोगः।  (दाएं हाथ में जल लेकर जल पृथवी पर डालें।)  फिर पाठ प्रारम्भ करें। संकल्प 10 हजार का करें। वर्तमान में 4 गुना करने पर फलदायी होता है।   मंत्र- ओं प्रत्यंगिरायै नमः प्रत्यंगिरे सकलकामान् साधय मम रक्षां कुरू कुरू सर्वान् शत्रून् खादय खादय मारय मारय घातय घातय ओं हलीं फट् स्वाहा। ओं भ्रामरी स्तंभिनी देवी क्षोभिणी मोहिनी तथा। संहारिणी द्राविणी च जृम्भिणी रौद्ररूपिणी।। इत्यष्टौ शक्तयो देवि शत्रुपक्षे नियोजिताः। धारयेत् कण्ठदेशे च सर्वशत्रुविनाशिनी।। ओं हलीं भ्रामरी मम शत्रून् भ्रामय भ्रामय ओं हलीं स्वाहा। ओं हलीं स्तंभिनी मम शत्रून् स्तंभय स्तंभय ओं हलीं स्वाहा। ओं हलीं क्षोभिणी मम शत्रून् क्षोभय क्षोभय ओं हलीं स्वाहा। ओं हलीं मोहिनी मम शत्रून् मोहय मोहय ओं हलीं स्वाहा। ओं हलीं संहारिणी मम शत्रून् संहारय संहारय ओं हलीं स्वाहा। ओं हलीं द्राविणी मम शत्रून् द्रावय ...

दुर्गा सप्तशती पाठ विधि

श्री दुर्गा सप्तशती श्री दुर्गा सप्तशती के पाठ करने का अलग विधान है। कुछ अध्यायों में उच्च स्वर, कुछ में मंद और कुछ में शांत मुद्रा में बैठकर पाठ करना श्रेष्ठ माना गया है। जैसे कीलक मंत्र को शांत मुद्रा में बैठकर मानसिक पाठ करना श्रेष्ठ है। देवी कवच उच्च स्वर में और श्रीअर्गला स्तोत्र का प्रारम्भ उच्च स्वर और समापन शांत मुद्रा से करना चाहिए। देवी भगवती के कुछ मंत्र यंत्र, मंत्र और तंत्र क्रिया के हैं। संपूर्ण दुर्गा सप्तशती स्वर विज्ञान का एक हिस्सा है। वाकार विधि:  प्रथम दिन एक पाठ प्रथम अध्याय, दूसरे दिन दो पाठ द्वितीय, तृतीय अध्याय, तीसरे दिन एक पाठ चतुर्थ अध्याय, चौथे दिन चार पाठ पंचम, षष्ठ, सप्तम व अष्टम अध्याय, पांचवें दिन दो अध्यायों का पाठ नवम, दशम अध्याय, छठे दिन ग्यारहवां अध्याय, सातवें दिन दो पाठ द्वादश एवं त्रयोदश अध्याय करके एक आवृति सप्तशती की होती है।  संपुट पाठ विधि:  किसी विशेष प्रयोजन हेतु विशेष मंत्र से एक बार ऊपर तथा एक नीचे बांधना उदाहरण हेतु संपुट मंत्र मूलमंत्र-1, संपुट मंत्र फिर मूलमंत्र अंत में पुनः संपुट मंत्र आदि इस विधि में समय अधिक लगता है। ले...

माला सँस्कार

जप माला का संस्कार कैसे करे ? 〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰 कोई भी जप , साधना या अनुष्ठान में माला की जरुरत होती है ! प्रायः जनसाधारण बाजार से माला खरीदकर उसी से जप आरम्भ कर देते है ! ऐसी माला स...

देव्यष्टकम

महादेवीं महाशक्तिं भवानीं भववल्लभाम्। भवार्तिभञ्जनकरीं वन्दे त्वां लोकमातरम् ॥१॥ भक्तिप्रियां भक्तिगम्यां भक्तानां कीर्तिवधिकाम् । भवप्रियां सतीं देवीं वन्दे ...

आदिशक्ति को क्यों कहते हैं दुर्गा जी ।

*💥आदिशक्ति को क्यों कहते हैं दुर्गा जी ।💥* पुरातन काल में दुर्गम नामक दैत्य हुआ। उसने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न कर सभी वेदों को अपने वश में कर लिया जिससे देवताओं का बल क्षीण ...

नन्दीश्वर वन्दना

नन्दीश्वर वन्दना ! ॐ आयं गौ: पृश्रीरक्रमीदसदन् मातरं पुर:। पितरं च प्रयन्त्स्व:।। ॐ प्रैतु वाजी कनिरक्रदन्नानदद्रासभ: पत्वा। भरन्नग्निं पुरीष्यं मा पाद्यायुष: पुरा।। ...

पूजा पाठ में दीपक का महत्व

*💥पूजा पाठ में दीपक का महत्व💥* शास्त्रों में लिखा गया है ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’, अर्थात अंधकार से प्रकाश की ओर चलने से ही जीवन में यथार्थ तत्वों की प्राप्ति सम्भव है। अंधका...