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प्रेम श्रद्धा करुणा

प्रेम , श्रद्धा , करुणा -- यह तीनों के बिना मनुष्य परेशान रहता है । किन्तु हर किसी को पता नहीं होता कि वह इन तीन के अभाव से व्यथित हैं ।  जीवन में अथाह व्यथा ही क्यों न हो !  प्रातः काल उठकर गौ माता के पास शान्त-चित्त होकर केवल बैठ जाना चाहिए । आप कुछ खिलाओ या नहीं , उनपर प्रेम से हाथ फेरों या नहीं , यह कोई मायने नहीं रखता । क्योंकि यह तो आपके श्रद्धा से अधिक मानवता पर निर्भर करता है ।  बस आप उन्हें देखो । उनका दर्शन करो । उन्हें देखने से ही आपके हृदय के किसी कोने में सोया हुआ जो सुषुप्त प्रेम है , वह अपने आप जाग उठेगा जैसे प्रातः कालीन सूर्य-रश्मियों का दर्शन करते ही सरोवरों के कमल खिल जाते हैं । जिस प्रकार कमलों के खिलते ही उनके पराग से वातावरण सुगन्धित हो जाता है , ठीक उसी प्रकार हृदय का प्रेम जागृत होते ही वहां श्रद्धा की धारा स्वतः बहने लगती है ।  प्रेम और श्रद्धा भी अधूरे और अनाथ हैं , यदि उनके ऊपर किसी की करुणा न हो । तब आप गौ माता के नेत्रों में देखना । सारे विश्व की ममता , सारे ब्रह्माण्ड की करुणा उनके नेत्रों में उतर आया होगा । गौमाता के नेत्रों में करुणा क...

जीवन मे नियम की आवश्यकता

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------  एक व्यवस्थित जीवन जीने के लिए जीवन में नियमों का पालन अपरिहार्य है। नियमरहित जीवन एक अवस्था के बाद भार में परिवर्तित हो जाता है और हमें अपना ही शरीर भारवत प्रतीत होने लगता है। भारतीय ज्ञान-परंपरा में हम जब भी जीवन के संदर्भ में चर्चा करते हैं, तब योग की प्राथमिकता से हम अवगत होते हैं।अष्टांग योग का द्वितीय सोपान नियम है। नियम के बगैर इस संसार में कुछ भी चलायमान नहीं है। सूर्य नित्य बिना किसी आलस्य और व्यर्थ की प्रतिस्पर्धा के बगैर निरंतर हर दिन उगता है और चंद्रमा भी स्थितप्रज्ञ के समान अपने हिस्से की चांदनी बिना किसी रोक-टोक के बिखेरता है। प्रकृति का सब कुछ नियमबद्ध है और जब यह नियमबद्धता टूटती है, तब प्रकृति का सुंदर हरा-भरा कलेवर भी हमें रास नहीं आता।जब प्रकृति नियमों पर इतनी अडिग है तो भला वह मनुष्य को उच्छृंखल होने के लिए कैसे छोड़ सकती है? प्रकृति जब अपने नियम से हटती है तब विकराल घटनाएं घटती हैं और विध्वंस होता है। प्रकृति के समान ही जीवन में भी नियमबद्धता आवश्य...