राधा उपासना विधि
श्रीराधा की उपासना के नियम श्रीराधा की उपासना करने वाले साधक को अपने को श्रीराधा की सेविकाओं में से एक तुच्छ सेविका मानकर उपासना करनी चाहिए और सदैव यही भावना करनी चाहिए कि मैं श्रीराधा की दासियों की दासी बनी रहूँ। श्रीराधा की सेविकाओं की सेवा में सफल होने पर ही श्रीराधा की सेवा का अधिकार मिलता है। श्रीराधामाधव की युगल उपासना गोपीभाव से की जाती है; गोपीभाव का अर्थ है–हर क्रिया द्वारा श्रीराधामाधव को सुख पहुंचाना; अपने सुख को भुलाकर केवल श्रीकृष्णसुख की ही चिन्ता करना। गोपीभाव की प्राप्ति के लिए साधक को काम, क्रोध, लोभ, द्रोह का त्याग करना आवश्यक है। नारदपांचरात्र में बताया गया है कि चिरकाल तक श्रीकृष्ण की आराधना करके मनुष्यों की जो-जो कामना पूर्ति होती है, वह श्रीराधा की उपासना से स्वल्पकाल (थोड़े से समय) में ही सिद्ध हो जाती है। प्रसन्न होकर वे साधक को सभी अभीष्ट सिद्धियां प्रदान करती हैं। शास्त्र में श्रीराधा ‘राधा’ शब्द से ही सभी अभीष्ट कामनाओं को देने वाली कहलाती हैं–‘राध्नोति सकलान् कामान् ददाति इति राधा।’ वे ही जगन्माता और श्रीकृष्ण जगत्पिता हैं। पिता से माता सौगुनी श्रेष्ठ मानी ग...