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एक ही अक्षर से बना श्लोक

एक ही अक्षर से बना श्लोक पढ़ा है कभी..?? यदि नहीं, तो लीजिए..👇👇 *"कः कौ के केककेकाकः* *काककाकाककः ककः।* *काकः काकः ककः काकः*  *कुकाकः काककः कुकः॥"* अर्थात- परब्रह्म (कः) [श्री राम] पृथ्वी (कौ) और साकेतलोक (के) में [दोनों स्थानों पर] सुशोभित हो रहे हैं। उनसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में आनन्द निःसृत होता है। वह मयूर की केकी (केककेकाकः) एवं काक (काकभुशुण्डि) की काँव-काँव (काककाकाककः) में आनन्द और हर्ष की अनुभूति करते हैं। उनसे समस्त लोकों (ककः) के लिए सुख का प्रादुर्भाव होता है। उनके लिए [वनवास के] दुःख भी सुख (काकः) हैं। उनका काक (काकः) [काकभुशुण्डि] प्रशंसनीय है। उनसे ब्रह्मा (ककः) को भी परमानन्द की प्राप्ति होती है। वह [अपने भक्तों को] पुकारते (काकः) हैं। उनसे कूका अथवा सीता (कुकाकः) को भी आमोद प्राप्त होता है। वह अपने काक [काकभुशुण्डि] को पुकारते (काककः) हैं और उनसे सांसारिक फलों एवं मुक्ति का आनन्द (कुकः) प्रकट होता है।🙏😊

पयो ब्रत

पयोव्रत :- अतुलनीय संतान प्राप्ति हेतु   १. फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष में बारह दिन किया जाता है|प्रतिपदा से द्वादशी तक|  २. केवल दूध लेवे, एक समय ,  ३. अमावस्या के दिन ब्राह्म मुहूर्त में स्नादी से पवित्र होकर भगवान्  विष्णु का विधिपूर्वक पूजन करें, दूध दूध से स्नान कराते हुए |  ४. यदि सामर्थ्य हो तो नैवेद्य में दूध में पके घी और गुड मिले चावल हों और उसी से द्वादश अक्षर मन्त्र से हवं करें|  ५. द्वादश अक्षर मन्त्र की एक माला जप करें| ६. दंडवत प्रणाम करें,  ७. कम से कम दो ब्राह्मणों को श्रद्धा पूर्वक खीर का भोजन कराएं और उनसे आज्ञा लेकर स्वयं भी प्रसाद लेंवे और बांटे| ८.इस प्रकार बारह दिन तक पूजन करें, दुग्ध स्नान कराते हुए,  ९.   अमावश्या से पूर्णिमा तक ब्रह्मचर्य व्रत धारण करें,  १०. भूमि पर शयन करें| तीनों समय  स्नान करे| ११. केवल एक समय दूध लेवें,  १२. इस प्रकार प्रतिदिन पूजन, हवं, ब्राह्मण भोजन करावें,  १३ झूठ न बोले, पापियों से बात न करें, पाप की बात न करें|  १४. विषय भोगों से बिलकुल दूर रहे, किसी को कोई कष्ट...

आर्यसमाजियों के पाखण्ड का कालजयी खण्डन --

आर्यसमाजियों के पाखण्ड का कालजयी खण्डन -- सभी सनातन वैदिक धर्मावलम्बी  विप्रजन आर्यसमाजियों के  मत के खण्डन में यह कालजयी ग्रन्थ पढें  और अपने परिजनों को भी पढ़ायें  ----- ------ वेदार्थ पारिजात भाष्य वार्तिक ----- https://archive.org/details/VedarthaParijataBhashyaVartikam  रचयिता - परमपूज्य  जगद्गुरु पुरी शंकराचार्य स्वामी श्री निरञ्जन देवतीर्थ जी महाराज ।  🙏 कथित सामाजिकों  के लिये दो शब्द  -------  यदि   सनातनधर्म की पौराणिक परम्पराओं का  विरोध करने वाले कथित आर्यसमाजी   समाजसुधारकों द्वारा  तिब्बत की गुफाओं  में खोजबीन की जाये तो अवश्य ही  ब्राह्मणवादी सनातनी  इतिहास के विरुद्ध  आर्य नारी उत्थान की दिशा में उनका ये दिवास्वप्न भी पूरा होगा , जहॉ, -  नारी वेद, स्त्री वेद,   महिला वेद,  कैकेयी गृह्यसूत्र ,   मन्थरा संहिता ,  मैत्रेयी  शुल्वसूत्र , अपाला धर्मसूत्र,  गार्गी स्मृति , सीता श्रौतसूत्र  , मन्दोदरी विमानशास्त्र  , कैकेयी ...

शिव और गंग का आध्यामिक चिंतन

जिज्ञासा  शिव और गंगा का आध्यात्मिक चिंतन शिव संस्कृत भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है, कल्याणकारी या शुभकारी। यजुर्वेद में शिव को शांतिदाता बताया गया है। 'शि' का अर्थ है, पापों का नाश करने वाला, जबकि 'व' का अर्थ देने वाला यानी दाता। गंगा में गं शब्द का अर्थ है जाना, गा शब्द का अर्थ है राग। गंगा का शाब्दिक अर्थ है संगीत के ध्वनि के साथ बहती जाना। तो शिव के गुण कल्याण करना है और कल्याण जहाँ पाप यानी अशुद्धता का विनाश हो जाता जी गंगा का स्वभाव है । और जो  शुद्ध हो जाये उसे शिव मिल जाते है इसलिए शिव गंगा एक साथ है  कहते हैं कि ब्रह्मचारिणी गंगा के द्वारा किए स्पर्श से ही महादेव ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया। पत्नी पुरुष की सेवा करती है अतः उसका वास पति के हृदय में अथवा चरणों मे होता है किंतु भगवती गंगा शिव के मस्तक पर विराजति है। भगवान विष्णु के अंगूठे से गंगा प्रकट हुई अतः उसे विष्णुपदी कहां जाता है। भगवान विष्णु के प्रसाद रूप में शिव ने देवी गंगा का पत्नी के रूप में स्वीकार किया और अपने जटाओं में वाश दिए क्योंकि गंगा विष्णुपदी है और विष्णु शिव के आराध्य तो आ...

जन्म और अवतार में अंतर

सामान्य जीव अवतार नही लेते और नही प्रकट हो सकते है  बल्कि जीव जन्म लेते है जो मां के गर्भ से हो कर सम्भव है  जैसा कि आप।जानते है कि अवतार का अर्थ अवतरण से है  जन्म और अवतार में इस तरह आप अंतर समझिए कि जन्म लेना अर्थात वैसा जीव पहले से उसी क्रिया के माध्यम से जन्म लिया परन्तु अवतार एक ही होता है अर्थत जो नही है वह जब उतरता है तो अवतरण यानी अवतार होता है। सामान्तया जब जीव उत्पन्न हो कर पाप से भरे कृत्यों की अधिकता से सभी साधु संतों का सन्तप्त करता है तब भगवान का अवतरण होता है जीव की मुक्ति हेतु एवम पाप से मुक्त करने हेतु  जीव में पाप करने की शक्ति है जबकि अवतार में पाप हरने की शक्ति है नही दिया जा सकता  सामान्य जीव अवतार नही लेते और नही प्रकट हो सकते है  बल्कि जीव जन्म लेते है जो मां के गर्भ से हो कर सम्भव है  अर्थात जिसने मां के गर्भ से जन्म लिया है उनको अवतरण या प्रकट दिवस बधाई नही दी सकती है  जैसा कि आप।जानते है कि अवतार का अर्थ अवतरण से है  जन्म और अवतार में इस तरह आप अंतर समझिए कि जन्म लेना अर्थात वैसा जीव पहले से उसी क्रिया के माध्यम से ज...

स्नान निर्णय

स्नान से न केवल तन की शुद्धि होती है, बल्कि यह मन में पवित्र भाव पैदा करता है। तन व मन की ऐसी पवित्रता और ताजगी से कार्य व संकल्प बिना बाधा के पूरे ही नहीं होते,  अपितु ऊर्जा युक्त होने पर परिणाम भी उत्तम देते हैं। मनुष्य को स्नान करने से दस गुणों की प्राप्ति होती है :-   १- रूप, २- बल, ३- तेज, ४- शुद्धता, ५- आयु, ६- आरोग्य, ७- आलोलुप्तता (स्पष्टता और स्फूर्ति) ८- कुस्वप्ननाश (बुरे सपने का नाश) ९- तप, १०- मेधा (बुद्धि) जो स्नान आलस्यवश नहीं करता उसको अनगिनत रोग और विकार घेर लेते हैं. स्नान के प्रकार – शास्त्रों में तरह-तरह के स्नान बताए गए हैं। जिनमें तीर्थस्नान मन, वचन और कर्म के दोष व पापों को दूर करने वाला माना गया है।वेद स्मृति में स्नान भी सात प्रकार के बताए गए हैं। १. मंत्र स्नान- मंत्र से २. भौम स्नान – मिट्टी से ३.अग्नि स्नान – भस्म से, यज्ञ में हवन के पश्चात हविष्य की बची बुझी हुई भस्म सर्वकार्य सिद्धि का साधन मानी गई है। इसको पूरे शरीर में लगाकर नहाने से स्वास्थ्य मिलता है तथा त्वचा के रोगों से मुक्ति होती है। ऐसा भी कहा गया है कि यह असाध्य रोगादि दुर्घटनाओं से पीडतज...

कुछ ग्रहों के उपाय

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------  1- शनि मुद्रिका (शनिवार के दिन) शनि मंत्र का जाप करते हुये धारण करें। काले घोडे की नाल या नव की किल से बनी होनी चाहिए यह शनि मुद्रिका/अंगूठी…   —– काले घोडे की नाल प्राप्त कर घर के मुख्य दरवाजे के ऊपर लगायें। 2 -बीसा यंत्र मे नीलम जडकर धारण करें। शनि यंत्र को शनिवार के दिन, शनि की होरा में अष्टगंध में भोजपत्र पर बनाकर उडद के आटे से दीपक बनाकर उसमें तेल डालकर दीप प्रज्जवलित करें। फिर शनि मंत्र का जाप करते हुये यंत्र पर खेजडी के फुल पत्र अर्पित करें। तत्पश्चात इसे धारण करने से राहत मिलती हैं। 3- उडद के आटे की रोटी बनाकर उस पर तेल लगायें। फिर कुछ उडद के दाने उस पर रखें। अब रोगी के उपर से सात बार उसारकर शमशान में उसे रख आयें। घर से निकालते समय व वापिस घर आते समय पीछे कदापि नही देखें एवं न ही इस अवधि में किसी से बात करें। ऐसा प्रयोग 21 दिन करने से राहत मिलती है। पूरी   राहत/आराम  न मिलने की स्थिति में इसे बढाकर 43 या 73 दिन तक बिना नागा करें। केवल पुरू...

सन्यासी के लक्षण क्या है

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------  भिक्षुकोपनिषद् के संबंधित दो श्लोक अर्थ समेत नीचे उद्धरित हैं ॐ अथ भिक्षुणां मोक्षार्थिनां कुटीचकबहूदकहंसपरमहंसाश्चेति चत्वारः ॥ अर्थ: मोक्षार्थी भिक्षुओं की चार श्रेणियाँ होती हैं-कुटीचक, बहूदक, हंस और परमहंस ॥ [यहाँ मोक्षार्थी भिक्षुओं के बारे में अनुशासन में बताये जा रहे हैं। भोगार्थी-स्वार्थी भिक्षु थे, जो अपनी असमर्थता के कारण भिक्षा माँगते हैं । मोक्षार्थी समर्थ होते हुए भी लौकिक बन्धनों से ऊपर उठने के क्रम में भिक्षाजीवी बनते हैं।] कुटीचकानाम गौतमभरद्वाजयाज्ञवल्क्यवसिष्ठप्रभृतयोऽष्टौ ग्रासांश्चरन्तो योगमार्गे मोक्षमेव प्रार्थयन्ते ॥ अर्थ: कुटीचक-भिक्षु गौतम, भरद्वाज, याज्ञवल्क्य और वसिष्ठ आदि के समान अष्टग्रास भोजन लेकर योगमार्ग में (योग के माध्यम से) मोक्ष के लिए प्रयत्न करते हैं ॥                                        सम्पूर्ण---🖌        ...

ग्रह, आर्थिक, विवाह-बाधा-निवारण प्रयोग—-

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------  ग्रह, आर्थिक, विवाह-बाधा-निवारण प्रयोग—- १॰ सिन्दूर लगे हनुमान जी की मूर्ति का सिन्दूर लेकर सीता जी के चरणों में लगाएँ। फिर माता सीता से एक श्वास में अपनी कामना निवेदित कर भक्ति-पूर्वक प्रणाम कर वापस आ जाएँ। इस प्रकार कुछ दिन करने पर सभी प्रकार की बाधाओं का निवारण होता है एवं कामना-पुर्ति होती है। २॰ किसी शनिवार को, यदि उस दिन ‘सर्वार्थ-सिद्धि योग’ हो, तो और भी उत्तम, सांय-काल अपनी लम्बाई के बराबर लाल रेशमी सूत नाप ले। फिर एक पत्ता बरगद का तोड़े। उसे स्वच्छ जल से धो-कर पोंछ ले। तब पत्ते को बहते हुए जल में प्रवाहित कर दें। इस प्रयोग से सभी प्रकार की बाधाएँ दूर होती है और कामनाओं की पुर्ति होती है। ३॰ रविवार के दिन पुष्य नक्षत्र में, एक काला कौआ या काला कुत्ता पकड़े। उसके दाएँ पैर का नाखून काटें। इस नाखून को ताबीज में भर कर, धूप-दीपादि से पूजनकर, धारण करें। इससे आर्थिक बाधा दूर होती है। नौकरी, साक्षात्कार आदि में सफलता की प्राप्ति होती है। कौए या काले कुत्ते में से किस...

ऋतु निर्णय

*ऋतुचर्या - ऋतु अनुसार आहार- विहार*                                                    ऋतुचर्या  मुख्य रूप से तीन ऋतुएँ हैं : शीत ऋतु , ग्रीष्म ऋतु , वर्षा ऋतु ! आयुर्वेद के मत अनुसार छ : ऋतुएँ मानी गयी हैं : वसन्त , ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत और शिशिर ! महर्षि सुश्रुत ने वर्ष के १२ मास इन ऋतुओं में  विभक्त कर दिए हैं ! *वर्ष के दो भाग होते हैं जिसमें पहले भाग आदान काल में सूर्य उत्तर की ओर गति करता है तथा दूसरे भाग विसर्ग काल में सूर्य दक्षिण की ओर  गति करता है !*  *आदान काल में शिशिर, वसंत एवं ग्रीष्म ऋतुएं और विसर्ग काल में वर्षा एवं हेमंत ऋतुएं होती हैं  आदान के समय सूर्य बलवान और चंद्र क्षीणबल रहता है ! शिशिर ऋतु  उत्तम बलवाली, वसंत माध्यम बलवाली और ग्रीष्म ऋतु दौर्बल्यवाली होती है ! विसर्ग काल में चंद्र बलवान और सूर्य  क्षीणबल रहता है ! चंद्र पोषण करनेवाला होता है ! वर्षा ऋतू दौर्बल्य वाली , शरद ऋतू मध्यम बल व् हेमंत ऋ...

यग्योपवित निर्णय

क्यों पहनते हैं जनेऊ और क्या है इसके लाभ, जानिए????? 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ भए कुमार जबहिं सब भ्राता।  दीन्ह जनेऊ गुरु पितु माता॥ गुरगृहँ गए पढ़न रघुराई।  अलप काल बिद्या सब आई॥ भावार्थ:-ज्यों ही सब भाई कुमारावस्था के हुए, त्यों ही गुरु, पिता और माता ने उनका यज्ञोपवीत संस्कार कर दिया। श्री रघुनाथजी (भाइयों सहित) गुरु के घर में विद्या पढ़ने गए और थोड़े ही समय में उनको सब विद्याएँ आ गईं॥ जनेऊ को उपवीत, यज्ञसूत्र, व्रतबन्ध, बलबन्ध, मोनीबन्ध और ब्रह्मसूत्र भी कहते हैं। इसे उपनयन संस्कार भी कहते हैं। 'उपनयन' का अर्थ है, 'पास या सन्निकट ले जाना।' किसके पास? ब्रह्म (ईश्वर) और ज्ञान के पास ले जाना। जनेऊ धारण करने के बाद ही द्विज बालक को यज्ञ तथा स्वाध्याय करने का अधिकार प्राप्त होता है। द्विज का अर्थ होता है दूसरा जन्म।    क्यों पहनते हैं जनेऊ👉 हिन्दू धर्म के सोलह संस्कारों में से एक 'उपनयन संस्कार' के अंतर्गत ही जनेऊ पहनी जाती है जिसे 'यज्ञोपवीत संस्कार' भी कहा जाता है। मुंडन और पवित्र जल में स्नान भी इस संस्कार के अंग होते हैं। प्राचीनकाल में पहले शिष्य, सं...

आईना देना वर्जित

सुबह उठते ही चेहरा आईने में ना देखें, नकारात्मक ऊर्जा का पूरे दिन रहेगा प्रभाव 〰〰🌸〰〰🌸〰〰🌸〰〰🌸〰〰🌸〰〰 अक्सर सुबह उठते ही अपना चेहरा आईने में देखने की लोगों की आदत होती है. वास्तु के अनुसार हमें ऐसा कभी नहीं करना चाहिए. इसके पीछे कारण यह है कि ऐसा करने से दिनभर आप पर नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव रह सकता है. किसी और का भी चेहरा ना देखें कहा तो यह भी जाता है कि आंख खुलते ही किसी और का भी चेहरा देखने से खुद को बचाना चाहिए. जान लें कि दिन की शुरुआत के साथ सबसे पहले अपने ईष्ट देवता का ध्यान करना ना भूलें और उठते ही सबसे पहले उनके दर्शन करें. अपनी हथेली को देखें कोशिश करें कि सुबह नींद से उठने के साथ ही सबसे पहले अपनी दोनों हथेलियों को मिला लें और फिर उन्हें देखें, साथ ही भगवान का ध्यान भी करें. ऐसा करने से आपके आत्मविश्वास में वृद्धि होगी और आप पूरे दिन हमेशा खुश रहेंगे. शंख या मंदिर की घंटी सुनाई देना अगर आपके सुबह की शुरुआत शंख या मंदिर की घंटियों की आवाज से होती है, तो यह आपके भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है. इससे आपका पूरा दिन बहुत अच्छा व्यतित होता है. हंस या फूल का दिखना ऐसा बहुत कम...

वेद की पत्नी

*🙏वेदों की पत्नियां यह है🙏* *प्रमाण* - *ईतिर्धृतिः_शिवा_शक्तिश्चतस्रोवेदयोषितः।* *भवन्ति_यज्ञकालेऽस्मिन्नीशानादि_व्यवस्थिताः।।*                    आह्निकसूत्रावल्याम् -10 अर्थ ईति,  धृति,  शिवा और शक्ति ये चार वेदोंकी पत्नियां हैं, यज्ञादिके समय पर इनकी पूजा ईशानादि क्रमसे की जाती है। वेद |वेदपत्नी |दिशा -------------------------------------            |                | ऋग्  -  |   ईतिः       | ईशान            |                | यजुः  -  |  धृति        | आग्नेय             |                | साम -   |   शिवा      | नैर्ऋत्य            |           ...

सरल योग निद्रा विधि

*स्त्रोत और मंत्र में क्या अंतर होता है:-* स्त्रोत और मंत्र देवताओं को प्रसन्न करने के शक्तिशाली माध्यम हैं। आज हम जानेंगे की मन्त्र और स्त्रोत में क्या अंतर होता है।  किसी भी देवता की पूजा करने से पहले उससे सबंधित मन्त्रों को गुरु की सहायता से सिद्ध किया जाना चाहिए।  *स्त्रोत :-  किसी भी देवी या देवता का गुणगान और महिमा का वर्णन किया जाता है। स्त्रोत का जाप करने से अलौकिक ऊर्जा का संचार होता है और दिव्य शब्दों के चयन से हम उस देवता को प्राप्त कर लेते हैं और इसे किसी भी राग में गाया जा सकता है।  स्त्रोत के शब्दों का चयन ही महत्वपूर्ण होता है और ये गीतात्मक होता है।  *मन्त्र:-* मन्त्र को केवल शब्दों का समूह समझना उनके प्रभाव को कम करके आंकना है। मन्त्र तो शक्तिशाली लयबद्ध शब्दों की तरंगे हैं जो बहुत ही चमत्कारिक रूप से कार्य करती हैं। ये तरंगे भटकते हुए मन को केंद्र बिंदु में रखती हैं।  शब्दों का संयोजन भी साधारण नहीं होता है, इन्हे ऋषि मुनियों के द्वारा वर्षों की साधना के बाद लिखा गया है।  मन्त्रों के जाप से आस पास का वातावरण शांत और भक्तिमय हो जाता है...