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उपनिषदों की संख्या कितनी है?

*ईशादि १०८ उपनिषदों की सूची* - १.ईश = शुक्ल यजुर्वेद, मुख्य उपनिषद् २.केन उपनिषद् = साम वेद, मुख्य उपनिषद् ३.कठ उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, मुख्य उपनिषद् ४.प्रश्‍न उपनिषद् = अथर्व वेद, मुख्य उपनिषद् ५.मुण्डक उपनिषद् = अथर्व वेद, मुख्य उपनिषद् ६.माण्डुक्य उपनिषद् = अथर्व वेद, मुख्य उपनिषद् ७.तैत्तिरीय उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, मुख्य उपनिषद् ८.ऐतरेय उपनिषद् = ऋग् वेद, मुख्य उपनिषद् ९.छान्दोग्य उपनिषद् = साम वेद, मुख्य उपनिषद् १०.बृहदारण्यक उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, मुख्य उपनिषद् ११.ब्रह्म उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद् १२.कैवल्य उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, शैव उपनिषद् १३.जाबाल उपनिषद् (यजुर्वेद) = शुक्ल यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद् १४.श्वेताश्वतर उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद् १५.हंस उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, योग उपनिषद् १६.आरुणेय उपनिषद् = साम वेद, संन्यास उपनिषद् १७.गर्भ उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद् १८.नारायण उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, वैष्णव उपनिषद् १९.परमहंस उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद् २०.अमृत-बिन्दु उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, योग उपनिषद् २१.अम...

यज्ञीय पदार्थ तथा पात्र परिचय

यज्ञीय पदार्थ तथा पात्र परिचय 〰️〰️🔸〰️〰️〰️🔸〰️〰️   श्रौत-स्मार्त्त यज्ञों में विविध प्रयोजनों के लिये पात्रों की आवश्यकता होती है । जिस प्रकार कुण्ड बनाया जाता है, उसी प्रकार इन यज्ञ-पात्रों को निश्चित वृक्षों के काष्ठ से, निर्धारित माप एवं आकार का बनाया जाता है । विधि पूर्वक बने यज्ञ-पात्रों का होना यज्ञ की सफलता के लिये आवश्यक है । नीचे कुछ यज्ञ-पात्रों का परिचय आवश्यक है । नीचे कुछ यज्ञ-पात्रों का परिचय दिया जा रहा है । इनका उपयोग विभिन्न यज्ञों में, विभन्न शाखाओं एवं सूत्र-ग्रंथों के आधार पर दिया जाता है। वेदों में इनका उल्लेख इस प्रकार मिलता है। (1)अग्निहोत्रहवणी 〰️〰️🔸🔸〰️〰️ अग्निहोत्रहवणी एक प्रकार की सूची का ही नाम है। यह बाहुमात्रलम्बी, आग्र हंसमुखी और चार अंगुल गर्त वाली होती है। इसमें स्रुवा से आज्य लेकर अग्निहोत्र किया जाता है, जिससे यह अग्निहोत्र-हवणी कही जाती है। स्फ्यशच कपालानि चाऽगिहोत्रहवर्णी च शूर्पं च कृष्णजिनं च शय्या चोलूखलं च मुसलं च दृषच्चोपला चैतानि वै दश यज्ञायुधानि...(तै.सं.1.6.8) (2)अतिग्राह्यपात्र 〰️〰️🔸〰️〰️ सोमाभिषव काल में दक्षिण शकट के पास तीन पा...

वेद पुरुष मूर्त रूप

·  वेद रूप पुरुष के मुख्य छह अंगो में --- व्याकरण शास्त्र ....वेद का मुख , ज्योतिष शास्त्र ....दोनों नेत्र , निरुक्त ....दोनों कान , कल्प शास्त्र ....दोनों हाथ , शिक्षा शास्त्र ....वेद की नासिका और छंद शास्त्र ....वेद पुरुष के दोनों पैर कहे गए है । वेदांग / Vedang • वेद पुरुष के 6 अंग माने गये हैं- कल्प, शिक्षा, छन्द, व्याकरण, निरुक्त तथा ज्योतिष। मुण्डकोपनिषद में आता है- 'तस्मै स हो वाच। द्वै विद्ये वेदितब्ये इति ह स्म यद्ब्रह्म विद्यौ वदंति परा चैवोपरा च॥ तत्रापरा ॠग्वेदो यजुर्वेद: सामवेदोऽर्थ वेद: शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दोज्योतिषमिति। अथ परा यथा तदक्षरमधिगम्यते॥'* 'अर्थात मनुष्य को जानने योग्य दो विद्याएं हैं-परा और अपरा। उनमें चारों वेदों के शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद, ज्योतिष- ये सब 'अपरा' विद्या हैं तथा जिससे वह अविनाशी परब्रह्म तत्व से जाना जाता है, वही 'परा' विद्या है।' इन छ: को इस प्रकार बताया गया है- ज्योतिष वेद के दो नेत्र हैं, निरुक्त 'कान' है, शिक्षा 'नाक', व्याकरण 'मुख' तथा कल्प 'दोनों हाथ...

वेद की पत्नी

*🙏वेदों की पत्नियां यह है🙏* *प्रमाण* - *ईतिर्धृतिः_शिवा_शक्तिश्चतस्रोवेदयोषितः।* *भवन्ति_यज्ञकालेऽस्मिन्नीशानादि_व्यवस्थिताः।।*                    आह्निकसूत्रावल्याम् -10 अर्थ ईति,  धृति,  शिवा और शक्ति ये चार वेदोंकी पत्नियां हैं, यज्ञादिके समय पर इनकी पूजा ईशानादि क्रमसे की जाती है। वेद |वेदपत्नी |दिशा -------------------------------------            |                | ऋग्  -  |   ईतिः       | ईशान            |                | यजुः  -  |  धृति        | आग्नेय             |                | साम -   |   शिवा      | नैर्ऋत्य            |           ...

वरुण सूक्त

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------  !!!---: वरुण-सूक्त :---!!! ==================== वरुण-सूक्त (ऋग्वेदः---१.२५) ऋग्वेद में प्रथम मण्डल का २५ वाँ सूक्त हैः--वरुण सूक्त, वरुण-सूक्त में कुल कितने मन्त्र हैः---११ वरुण-सूक्त का ऋषि है---शुनः शेप । वरुण-सूक्त का देवता हैः--वरुण देव । वरुण शब्द की उत्पत्तिः---वृञ् वरणे धातु से वरणीयः । वृञ् धातु का अर्थ है-ः--आच्छादित करना या आवृत्त करना । वरुण का निर्वचन हैः--वरुणो वृणोतीति सतः । वरुण-सूक्त का छन्द हैः---गायत्री (२४ अक्षर) । वरुण देवता का स्थान हैः---द्युलोक । भौतिक नियमों का नियन्ता कौन हैः--वरुण । वरुण का एक अन्य नाम हैः---धृतव्रत । सूर्य, अग्नि और जल की रचना किसने की हैः---वरुण ने । "उत्तम-शासक" किसे कहा गया हैः---वरुण को ।। वरुण का नेत्र हैः--सूर्य । सूर्य की तरह ही किसका रथ देदीप्यमान हैः---वरुण का । वरुण का प्रमुख अस्त्र क्या हैः---"वज्र" और "पाश" ।। वरुण का प्रधान कार्य क्या हैः---जल बरसाना ।। ब्रह्माण्ड का नैतिक अध्यक्ष कौन हैः--वरुण ।। वरुण जि...

वैदिक सूक्त

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------  एक वैदिक सूक्त ॠ. 7. 60   १ यदद्य सूर्य व्रवोऽनागा उद्यन्मित्राय वरुणाय सत्यम् । वयं देवत्रादिते स्याम तब प्रियासो अर्यमन्गृणन्त: ।।   (सूर्य) हे सूर्य, हे प्रकाश ! (यत् अद्य) क्योंकि आज (उद्यन्) अपने उदयमें (अनागा:) निर्दोष होते हुए तूने (मित्राय) प्रेमके अधिपति और (वरुणाय) पवित्रताके अधिपतिके प्रति (सत्यं ब्रव:) सत्यकी घोषणा की है, इसलिए (अदिते) हे असीम माता ! (वयं) हम (तव प्रियास:) तेरे प्रिय होकर, (अर्यमन्) हे बलके अधिपति ! (तव प्रियास:) तेरे प्रिय होकर (गृणन्त:) अपने समस्त संभाषणमें (देवत्रा स्याम) देवत्वमें निवास करें । २ एष स्य मित्रावरुणा नुचक्षा उभे उदेति सूर्यो अभि ज्यन् । विश्वस्य स्थातुर्जगतश्च गोपा ऋजु मर्तेषु वृजिना च पश्यन् ।।   (मित्रावरुणा) हे मित्र ! हे वरुण ! (एष: स्व: नृचक्षा:) यह ही है वह देव जो आत्माके लिए देखता है, (सूर्य:) वह सूर्य जो (उभे अभि) द्यौ और पृथिवी दोनोंके ऊपर (ज्मन्) व्यापक विस्तारमें (उदेति) उदित होता है । (विश्वस्य...

सीमन्तोन्नयन संस्कार

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●     ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों------- सीमन्तोन्नयन संस्कार गर्भ में शिशु की शिक्षा एवं चेतना का प...