मूर्ति पूजा वेदो मे
वेद में मूर्ति तत्त्व १. मूर्त-अमूर्त का समन्वय-परात्पर निर्विशेष ब्रह्म निराकार है। उसे देखना, जानना सम्भव नहीं है। उसके द्वारा सृष्ट जगत् साकार है। उसका वर्णन जिन शब्दों में किया जाता है वे भी साकार तथा विशेष या भिन्न भिन्न रूपों वाले हैं। ४ स्तर की ध्वनि में भी परा-वाक् निर्विशेष है, उसका विशेष रूपों में वर्गीकरण विशिष्ट है। मूर्त रूप वाक् के ३ पद मस्तिष्क के भीतर हैं-पश्यन्ती, मध्यमा, वैखरी। अपरिमिततरमिव हि मनः परिमिततरमेव हि वाक्। (शतपथ ब्राह्मण, १/४/४/७) चत्वारि वाक् परिमिता पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः। गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति॥ (ऋग्वेद, १/१६४/४५) परायामङ्कुरीभूय पश्यन्त्यां द्विदलीकृता॥१८॥ मध्यमायां मुकुलिता वैखर्या विकसीकृता॥ (योगकुण्डली उपनिषद्, ३/१८, १९) अक्षरं परमो नादः शब्दब्रह्मेति कथ्यते। मूलाधारगता शक्तिः स्वाधारा बिन्दुरूपिणी॥२॥ तस्यामुत्पद्यते नादः सूक्ष्मबीजादिवाङ्कुरः। तां पश्यन्तीं विदुर्विश्वं यया पश्यन्ति योगिनः॥३॥ हृदये व्यज्यते घोषो गर्जत्पर्जन्यसंनिभः। तत्र स्थिता सुरेशान मध्यमेत्यभिधीयते॥४॥ प्राणेन च स्वराख्येन प्रथिता...