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लिंग उपासना

*लिंगोपासना*  निर्गुण-निराकार रूप में शिवलिंगोपासना की विशेष महिमा पुराणों में बतायी गयी है। पूजन के पूर्व नव निर्मित शिवलिंग की प्रतिष्ठा करनी चाहिए। वाण लिंग एवं नर्मदेश्वर लिंग स्वप्रतिष्ठित माने जाते हैं। इसके अतिरिक्त मन्दिर आदि स्थानों में पूर्व प्रतिष्ठित लिंग, स्वयम्भू लिंग तथा ज्योतिर्लिंग आदि देवों की उपासना में विशेष रूप से पार्थिव-लिंग-पूजन में प्रतिष्ठा तथा आवाहन विसर्जन आवश्यक होता है। शास्त्रों में यहाँ तक विवेचित है कि शिवलिंग में सभी देवताओं का पूजन किया जा सकता है- *शिवचलिंगेऽपि सर्वेषां देवानां पूजनं भवेत् ।* *सर्वलोकमये अस्माच्छिवशक्तिर्विभुः प्रभुः ।।* द्रष्टव्य बृहद्धर्मपुराण, अ. 57 /16 पुराण ग्रन्थों का अनुशीलन करने से शिवोपासना के परिप्रेक्ष्य में लिंग के स्वरूप, निर्माण उपासना विधि तथा उसके महत्ता का विशद् विवेचन मिलता है। कूर्म पुराण में लिंग को परिभाषित करते हुए कहा गया है कि जिसमें सभी कुछ लय हो जायें, वही लिंग है वही ब्रह्म शरीर ही है। स्कन्द पुराण में 'लयनाल्लिंगमुच्यते' कहा है जिसका अर्थ लय या प्रलय होता है, इसीलिए उसे लिंग कहते हैं। प्रलय का लिंग...