विवाह में गोत्र, गण तथा प्रवर का शास्त्रीय विचार------------------------------------------------------------
नमो धर्माय महते वेदाय च स्वयम्भुवे । ऋषिभ्यश्च ब्राह्मणेभ्यो वेदविद्भ्यो नमोनमः।। वैदिक-सनातन-वर्णाश्रमधर्म में शास्त्रानुसार-- समान-गोत्र में विवाह निषेध है। समान-गण में विवाह निषेध है। समान-प्रवर में विवाह निषेध है। समान प्रवर का विशेष नियम- पञ्चानां त्रिषु सामान्यादविवाहस्त्रिषु द्वयोः । भृग्वङ्गिरो-गणेष्वेवं शेषेष्वेकोऽपि वारयेत्।।-प्रावरिकासूत्रम्। भृगु तथा अङ्गिरोगण में अधिक प्रवर अर्थात् ५ में ३ तथा ३ में २ प्रवर समान होने पर समानप्रवर माना जाता है और विवाह नहीँ होता है। कम प्रवर अर्थात् ५ में २ तथा ३ में १ प्रवर समान होने पर विवाह हो सकता है । अवशिष्ट अन्य सभी गणों में अर्थात् वसिष्ठ, कश्यप, भरद्वाज, विश्वामित्र, अत्रि, अगस्त्य - इन गणों में तो ५ प्रवरों में से १ अथवा ३ प्रवरों में से १ प्रवर समान होने पर भी समानप्रवर माना जाता है और विवाह निषिद्ध होता है। इति वैदिकशास्त्रव्यवस्था।