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समस्त पाप निवारण स्तोत्र

* समस्तपाप निवारण स्तोत्र * पुष्करोवाच विष्णवे विष्णवे नित्यं विष्णवे विष्णवे नमः । नमामि विष्णुं चित स्थमहंकारगतिं हरिम् ॥ चित्तस्थमीशमव्यक्तमनन्तमपराजितम् । विष्णुमीडयमशेषेण अनादिनिधनं विभुम् ।। विष्णुश्चित्तगतो यन्मे विष्णुर्बुद्धिगतश्च यत् । यच्चाहंकारगो विष्णुर्यव्दिष्णुमॅयि संस्थितः ॥ करोति कर्मभूतोऽसौ स्थावरस्य चरस्य च । तत् पापं नाशमायातु तस्मिन्नेव हि चिन्तिते ॥ ध्यातो हरति यत् पापं स्वप्ने दृष्टस्तु भावनात् । तमुपेन्द्रमहं विष्णुं प्राणतातिॅहरं हरिम् ॥ जगत्यस्मिन्निराधारे मज्जमाने तमस्यधः । हस्तावलम्बनं विष्णुं प्रणमामि परात्परम् ॥ सर्वेश्वरेश्वर विभो परमात्मन्नधोक्षज । हृषीकेश हृषीकेश हृषीकेश नमोऽस्तु ते ॥ नृसिंहानन्त गोविंद भूतभावन केशव । दुरुक्तं दुष्कृतं ध्यातं शमयाधं नमोऽस्तु ते ॥ यन्मया चिन्तितं दु...

अष्ट नाग

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✍🏻 *आस्तीकपर्वणि - सर्पनामकथने पञ्चत्रिंशोऽध्यायः* ✍🏻 👉🏻 *भाग-१.३६.२* _*(मुख्य-मुख्य नागोंके नाम)*_ *शेषः प्रथमतो जातो वासुकिस्तदनन्तरम् ।* *ऐरावतस्तक्षकश्च कर्कोटकधनंजयौ ॥* *कालियो मणिनागश्च नागश्चापूरणस्तथा ।* *नागस्तथा पिञ्जरक एलापत्रोऽथ वामनः ॥* *नीलानीलो तथा नागौ कल्माषशबलौ तथा।* *आर्यकश्चोग्रकश्चैव नागः कलशपोतकः ॥* *सुमनाख्यो दधिमुखस्तथा विमलपिण्डकः ।* *आप्तः कर्कोटकश्चैव शङ्खो वालिशिखस्तथा ॥* *निष्टानको हेमगुहो नहुषः पिङ्गलस्तथा।* *बाह्यकर्णो हस्तिपदस्तथा मुद्रपिण्डकः ॥* *कम्बलाश्वतरौ चापि नागः कालीयकस्तथा।* *वृत्तसंवर्तको नागौ द्वौ च पद्माविति श्रुतौ ॥* नागोंमें सबसे पहले शेषजी प्रकट हुए हैं। तदनन्तर वासुकि, ऐरावत, तक्षक,कर्कोटक, धनंजय,कालिय, मणिनाग,आपूरण, पिञ्जरक, एलापत्र, वामन, नील, अनील, कल्माष, शबल, आर्यक, उग्रक, कलशपोतक, सुमनाख्य, दधिमुख, विमलपिण्डक, आप्त, कर्कोटक (द्वितीय), शङ्ख, वालिशिख, निष्टानक, हेमगुह, नहुष, पिङ्गल, बाह्यकर्ण, हस्तिपद, मुद्गरपिण्डक, कम्बल, अश्वतर, कालीयक, वृत्त, संवर्तक, पद्म (प्रथम), पद्म (द्वितीय) ॥ ५-१० ॥

सरस्वती के 12 नाम सँस्कृत

।। श्री सरस्वती द्वादशनामावली ।। प्रथमं भारती नाम द्वितीयं च सरस्वती। तृतीयं शारदा देवी चतुर्थं हंस वाहिनी।। पञ्चम जगतीख्याता षष्ठं वागीश्वरी तथा। सप्तमं कुमुदी प्रोक्ता अष्टमें ब्रह्मचारिणी।। नवमं बुद्धिदात्री च दशमं वरदायिनी। एकादशं चन्द्रकान्ति द्वादशं भुवनेश्वरी।। द्वादशैतानि नामानी त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः। जिह्वाग्रे वसते नित्यं ब्रह्मरूपा सरस्वती ।। देवी सरस्वती की प्रसिद्ध ‘द्वादश नामावली’  का पाठ करने पर भगवती प्रसन्न होती हैं ।

अष्टलक्ष्मी स्तोत्र'

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●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------     अष्टलक्ष्मी स्तोत्र' 1. आद्य लक्ष्मी सुमनस वन्दित सुन्दरि माधवि, चन्द्र सहोदरि हेममये, मुनिगण वन्दित मोक्षप्रदायिनि, मंजुल भाषिणी वेदनुते। पंकजवासिनी देव सुपूजित, सद्गुण वर्षिणी शान्तियुते, जय जय हे मधुसूदन कामिनी, आद्य लक्ष्मी परिपालय माम्।। 2. धान्यलक्ष्मी अयिकलि कल्मष नाशिनि कामिनी, वैदिक रूपिणि वेदमये, क्षीर समुद्भव मंगल रूपणि, मन्त्र निवासिनी मन्त्रयुते। मंगलदायिनि अम्बुजवासिनि, देवगणाश्रित पादयुते, जय जय हे मधुसूदन कामिनी, धान्यलक्ष्मी परिपालय माम्।। 3. धैर्यलक्ष्मी जयवरवर्षिणी वैष्णवी भार्गवि, मन्त्रस्वरूपिणि मन्त्रमये, सुरगण पूजित शीघ्र फलप्रद, ज्ञान विकासिनी शास्त्रनुते। भवभयहारिणी पापविमोचिनी, साधु जनाश्रित पादयुते, जय जय हे मधुसूदन कामिनी, धैर्यलक्ष्मी परिपालय माम्।। 4. गजलक्ष्मी जय जय दुर्गति नाशिनि कामिनि, सर्वफलप्रद शास्त्रमये, रथगज तुरगपदाति समावृत, परिजन मण्डित लोकनुते। हरिहर ब्रह्म सुपूजित सेवित, ताप निवारिणी पादयुते, जय जय ह...

दुर्गा 32 नाम प्रयोग

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------  माता भवानी के आगमन की बहुत बहुत शुभकामनाएं । आज एक महत्वपूर्ण विधान प्रेषित कर रहा हु आशा है कि अवश्य ही यह लाभान्वित करेगा। ।। हर इक्षा हर की ।। ऊँ  दुर्गा दुर्गतिशमनी दुर्गाद्विनिवारिणी दुर्गमच्छेदनी  दुर्गसाधिनी  दुर्गनाशिनी दुर्गतोद्धारिणी दुर्गनिहन्त्री दुर्गमापहा  दुर्गमज्ञानदा  दुर्गदैत्यलोकदवानला दुर्गमा दुर्गमालोका  दुर्गमात्मस्वरुपिणी  दुर्गमार्गप्रदा दुर्गम विद्या दुर्गमाश्रिता  दुर्गमज्ञान संस्थाना  दुर्गमध्यान भासिनी दुर्गमोहा दुर्गमगा  दुर्गमार्थस्वरुपिणी दुर्गमासुर  संहंत्रि दुर्गमायुध धारिणी दुर्गमांगी  दुर्गमता दुर्गम्या दुर्गमेश्वरी  दुर्गभीमा दुर्गभामा दुर्गमो दुर्गदारिणी  नामावलिमिमां यस्तु दुर्गाया मम  मानवः पठेत् सर्वभयान्मुक्तो भविष्यति न  संशयः। विधान :  पहले एक पाठ कीजिये, अब दूसरा पाठ दुसरे नाम से आरम्भ कीजिये और पहले नाम पर समाप्त कीजिये !  तीसरा पाठ त...

अष्टमूर्ति स्तोत्रं

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------  ॥ अष्टमूर्तिस्तोत्रम् ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ ईशा वास्यमिदं सर्वं चक्षोः सूर्यो अजायत । इति श्रुतिरुवाचातो महादेवः परावरः ॥ १॥ अष्टमूर्तेरसौ सूर्यौ मूर्तित्वं परिकल्पितः । नेत्रत्रिलोचनस्यैकमसौ सूर्यस्तदाश्रितः ॥ २॥ यस्य भासा सर्वमिदं विभातीदि श्रुतेरिमे । तमेव भान्तमीशानमनुभान्ति खगादयः ॥ ३॥ ईशानः सर्वविद्यानां भूतानां चेति च श्रुतेः । वेदादीनामप्यधीशः स ब्रह्मा कैर्न पूज्यते ॥ ४॥ यस्य संहारकाले तु न किञ्चिदवशिष्यते । सृष्टिकाले पुनः सर्वं स एकः सृजति प्रभुः ॥ ५॥ सूर्याचद्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् । इति श्रुतेर्महादेवः श्रेष्ठोऽर्यः सकलाश्रितः ॥ ६॥ विश्वं भूतं भवद्भयं सर्वं रुद्रात्मकं श्रुतम् । मृत्युञ्जयस्तारकोऽतः स यज्ञस्य प्रसाधनः ॥ ७॥ विषमाक्षोऽपि समदृक् सशिवोऽपि शिवः स च । वृषसंस्थोऽध्यतिवृषो गुणात्माऽप्यगुगुणोऽमलः ॥ ८॥ यदाज्ञामुद्वहन्त्यत्र शिरसा सासुराः सुराः । अभ्रं वातो वर्षं इतीषवो यस्य स विश्वपाः ॥ ९॥ भिषक्रमं त्वा भिषजां शृणोमीति श्रुतेरवम् । स्वभक्तसंसारमह...

महालिंग स्तुति

॥ श्रीमहालिङ्गस्तुतिः ॥  अनादिमलसंसार रोगवैद्याय शम्भवे । नमश्शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिङ्गमूर्तये ॥ १॥ आदिमध्यान्तहीनाय स्वभावानलदीप्तये । नमश्शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिङ्गमूर्तये ॥ २॥ प्रलयार्णवसंस्थाय प्रलयोत्पत्तिहेतवे । नमश्शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिङ्गमूर्तये ॥ ३॥ ज्वालामालावृताङ्गाय ज्वलनस्तम्भरूपिणे । नमश्शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिङ्गमूर्तये ॥ ४॥ महादेवाय महते ज्योतिषेऽनन्ततेजसे । नमश्शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिङ्गमूर्तये ॥ ५॥ प्रधानपुरुषेशाय व्योमरूपाय वेधसे । नमश्शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिङ्गमूर्तये ॥ ६॥ निर्विकाराय नित्याय सत्यायामलतेजसे । नमश्शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिङ्गमूर्तये ॥ ७॥ वेदान्तसाररूपाय कालरूपाय धीमते । नमश्शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिङ्गमूर्तये ॥ ८॥ इति श्रीकूर्मपुराणान्तर्गतं श्रीमहालिङ्गस्तुतिः समाप्ता ।              

नारायण कवच

श्री नारायण कवच  〰️〰️🌼🌼〰️〰️ ।।राजोवाच।। 〰️〰️〰️〰️ यया गुप्तः सहस्त्राक्षः सवाहान् रिपुसैनिकान्। क्रीडन्निव विनिर्जित्य त्रिलोक्या बुभुजे श्रियम्।।1 भगवंस्तन्ममाख्याहि वर्म नारायणात्मकम्। यथाssततायिनः शत्रून् येन गुप्तोsजयन्मृधे।।2 राजा परिक्षित ने पूछाः भगवन् ! देवराज इंद्र ने जिससे सुरक्षित होकर शत्रुओं की चतुरङ्गिणी सेना को खेल-खेल में अनायास ही जीतकर त्रिलोकी की राज लक्ष्मी का उपभोग किया, आप उस नारायण कवच को सुनाइये और यह भी बतलाईये कि उन्होंने उससे सुरक्षित होकर रणभूमि में किस प्रकार आक्रमणकारी शत्रुओं पर विजय प्राप्त की ।।1-2 ।।श्रीशुक उवाच।। 〰️〰️〰️〰️〰️ वृतः पुरोहितोस्त्वाष्ट्रो महेन्द्रायानुपृच्छते। नारायणाख्यं वर्माह तदिहैकमनाः शृणु।।3 श्रीशुकदेवजी ने कहाः परीक्षित् ! जब देवताओं ने विश्वरूप को पुरोहित बना लिया, तब देवराज इन्द्र के प्रश्न करने पर विश्वरूप ने नारायण कवच का उपदेश दिया तुम एकाग्रचित्त से उसका श्रवण करो ।।3 विश्वरूप उवाचधौताङ्घ्रिपाणिराचम्य सपवित्र उदङ् मुखः। कृतस्वाङ्गकरन्यासो मन्त्राभ्यां वाग्यतः शुचिः।।4 नारायणमयं वर्म संनह्येद् भय आगते। पादयोर्जानुनोरूर्वोरू...

कनक धारा स्तोत्र हिंदी पाठ

कनकधारा स्तोत्रम् (हिन्दी पाठ) * जैसे भ्रमरी अधखिले कुसुमों से अलंकृत तमाल-तरु का आश्रय लेती है, उसी प्रकार जो प्रकाश श्रीहरि के रोमांच से सुशोभित श्रीअंगों पर निरंतर पड़ता रहता है तथा जिसमें संपूर्ण ऐश्वर्य का निवास है, संपूर्ण मंगलों की अधिष्ठात्री देवी भगवती महालक्ष्मी का वह कटाक्ष मेरे लिए मंगलदायी हो।।1।।  * जैसे भ्रमरी महान कमल दल पर मंडराती रहती है, उसी प्रकार जो श्रीहरि के मुखारविंद की ओर बराबर प्रेमपूर्वक जाती है और लज्जा के कारण लौट आती है। समुद्र कन्या लक्ष्मी की वह मनोहर मुग्ध दृष्टिमाला मुझे धन संपत्ति प्रदान करें ।।2।।  * जो संपूर्ण देवताओं के अधिपति इंद्र के पद का वैभव-विलास देने में समर्थ है, मधुहन्ता श्रीहरि को भी अधिकाधिक आनंद प्रदान करने वाली है तथा जो नीलकमल के भीतरी भाग के समान मनोहर जान पड़ती है, उन लक्ष्मीजी के अधखुले नेत्रों की दृष्टि क्षण भर के लिए मुझ पर थोड़ी सी अवश्य पड़े।।3।।  * शेषशायी भगवान विष्णु की धर्मपत्नी श्री लक्ष्मीजी के नेत्र हमें ऐश्वर्य प्रदान करने वाले हों, जिनकी पु‍तली तथा बरौनियां अनंग के वशीभूत हो अधखुले, किंतु साथ ही निर्निमेष...

श्रीशिवस्तुतिः वन्दे शिवं

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------  श्रीशिवस्तुतिः वन्दे शिवं  वन्दे देवमुमापतिं सुरगुरुं वन्दे जगत्कारणं वन्दे पन्नगभूषणं मृगधरं वन्दे पशूनां पतिम् । वन्दे सूर्यशशाङ्कवह्निनयनं वन्दे मुकुन्दप्रियं वन्दे भक्तजनाश्रयं च वरदं वन्दे शिवं शङ्करम् ॥ १॥ पार्वतीपति भगवान शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ, देवताओंके गुरु तथा सृष्टिके कारणरूप परमेश्वर भगवान शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ, नागोंको आभूषणके रूपमें तथा हाथमें मृगमुद्रा धारण करनेवाले एवं समस्त जीवोंके गुरुस्वामी भगवान शंकरको मैं नमस्कार करता हूँ, नमस्कार करता हूँ  । सूर्य, चन्द्र और अग्निदेवको नेत्ररूपमें धारण करनेवाले भगवान नारायणके परम प्रिय भगवान् शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ । भक्त-जनोंको आश्रय देनेवाले वरदानी कल्याणस्वरूप भगवान शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ १॥ वन्दे सर्वजगद्विहारमतुलं वन्देऽन्धकध्वंसिनं वन्दे देवशिखामणिं शशिनिभं वन्दे हरेर्वल्लभम् । वन्दे नागभुजङ्गभूषणधरं वन्दे शिवं चिन्मयं वन्दे भक्तजनाश्रयं च वरदं वन्दे शिवं शङ्करम् ॥ २॥ जिनके वि...

श्रीशिवसुन्दरध्यानाष्टकम्

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------  श्रीशिवसुन्दरध्यानाष्टकम्  वन्दे फेननिभं तुषारधवलं वन्दे सुधास्तोमभं वन्दे दुग्धसमद्युतिं भपतिभं वन्दे मृणालप्रभम् । वन्दे कुन्दनगत्विषं रजतभं वन्दे शतादित्यभं वन्दे श्वेतचयोज्ज्वलं प्रभुमणिं वन्दे शिवं सुन्दरम् ॥ १॥ वन्दे व्यालगलं त्रिशूललसितं वन्दे कलेशालयं वन्दे कालहरं हलाहलगलं वन्दे कपालप्रियम् । वन्दे भालसुलोचनं त्रिनयनं वन्दे महाजूटकं वन्दे भस्मकलेवरं कलिहरं वन्दे शिवं सुन्दरम् ॥ २॥ वन्दे पर्वतवासिनं शशिधरं वन्दे गणेशप्रियं वन्दे हैमवतीपतिं सुरपतिं वन्दे कुमारात्मजम् । वन्दे कृत्तिकटिं मनोज्ञडमरुं वन्दे च गङ्गाधरं वन्दे योगविनोदिनं प्रमथिनं वन्दे शिवं सुन्दरम् ॥ ३॥ वन्दे पञ्चमुखं महानटवरं वन्दे दयासागरं वन्दे विष्णुनतं विरञ्चिविनुतं वन्दे सुराराधितम् । वन्दे रावणवन्दितं मुनिगुरुं वन्दे प्रशान्ताननं वन्देर्द्धप्रमदाङ्गिनं वृषभगं वन्दे शिवं सुन्दरम् ॥ ४॥ वन्दे शक्तिविभूषितं रिपुहरं वन्दे पिनाकान्वितं वन्दे दैत्यहरं पुरत्रयहरं वन्देन्धकध्वम्सकम् । वन्दे हस्ति...

देव्यष्टकम

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------  देव्यष्टकम्  श्रीगणेशाय नमः । महादेवीं महाशक्तिं भवानीं भववल्लभाम् । भवार्तिभञ्जनकरीं वन्दे त्वां लोकमातरम् ॥ १॥ भक्तप्रियां भक्तिगम्यां भक्तानां कीर्तिवर्धिकाम् । भवप्रियां सतीं देवीं वन्दे त्वां भक्तवत्सलाम् ॥ २॥ अन्नपूर्णां सदापूर्णां पार्वतीं पर्वपूजिताम् । महेश्वरीं वृषारूढां वन्दे त्वां परमेश्वरीम् ॥ ३॥ कालरात्रिं महारात्रिं मोहरात्रिं जनेश्वरीम् । शिवकान्तां शम्भुशक्तिं वन्दे त्वां जननीमुमाम् ॥ ४॥ जगत्कर्त्रीं जगद्धात्रीं जगत्संहारकारिणीम् । मुनिभिः संस्तुतां भद्रां वन्दे त्वां मोक्षदायिनीम् ॥ ५॥ देवदुःखहरामम्बां सदा देवसहायकाम् । मुनिदेवैः सदासेव्यां वन्दे त्वां देवपूजिताम् ॥ ६॥ त्रिनेत्रां शङ्करीं गौरीं भोगमोक्षप्रदां शिवाम् । महामायां जगद्बीजां वन्दे त्वां जगदीश्वरीम् ॥ ७॥ शरणागतजीवानां सर्वदुःखविनाशिनीम् । सुखसम्पत्करां नित्यां वन्दे त्वां प्रकृतिं पराम् ॥ ८॥ शरणागतजीवानां सर्वदुःखविनाशिनीम् । सुखसम्पत्करां नित्यां वन्दे त्वां प्रकृतिं पराम् ॥ ९॥ देव्...

आदित्य हृदय स्तोत्र हिन्दी अनुवाद सहित

आदित्य हृदय स्तोत्र हिन्दी अनुवाद सहित 〰️〰️🌸〰️〰️🌸🌸〰️〰️🌸〰️〰️ वाल्मीकि रामायण के अनुसार “आदित्य हृदय स्तोत्र” अगस्त्य ऋषि द्वारा भगवान् श्री राम को युद्ध में रावण पर विजय प्राप्ति हेतु दिया गया था. आदित्य हृदय स्तोत्र का नित्य पाठ जीवन के अनेक कष्टों का एकमात्र निवारण है. इसके नियमित पाठ से मानसिक कष्ट, हृदय रोग, तनाव, शत्रु कष्ट और असफलताओं पर विजय प्राप्त की जा सकती है. इस स्तोत्र में सूर्य देव की निष्ठापूर्वक उपासना करते हुए उनसे विजयी मार्ग पर ले जाने का अनुरोध है. आदित्य हृदय स्तोत्र सभी प्रकार के पापों , कष्टों और शत्रुओं से मुक्ति कराने वाला, सर्व कल्याणकारी, आयु, उर्जा और प्रतिष्ठा बढाने वाला अति मंगलकारी विजय स्तोत्र है. विनियोग 〰️〰️〰️ ॐ अस्य आदित्यह्रदय स्तोत्रस्य अगस्त्यऋषि: अनुष्टुप्छन्दः आदित्यह्रदयभूतो भगवान् ब्रह्मा देवता निरस्ताशेषविघ्नतया ब्रह्माविद्यासिद्धौ सर्वत्र जयसिद्धौ च विनियोगः पूर्व पिठिता 〰️〰️〰️ ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम् । रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम् ॥1॥ दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम् । उपगम्याब्रवीद् राममगस्त्यो भगवांस...

उमामहेश्वर स्तोत्रम

*।।श्री उमा महेश्वर स्तोत्रं।।* ······••●◆❁✿❁◆●••······  नमः शिवाभ्यां नवयौवनाभ्यां परस्पराश्लिष्टवपुर्धराभ्याम् । नगॆन्द्रकन्यावृषकॆतनाभ्यां नमॊ नमः शङ्करपार्वतीभ्याम् ॥०१॥ नमः शिवाभ्यां सरसॊत्सवाभ्यां नमस्कृताभीष्टवरप्रदाभ्याम् । नारायणॆनार्चितपादुकाभ्यां नमॊ नमः शङ्करपार्वतीभ्याम् ॥०२॥ नमः शिवाभ्यां वृषवाहनाभ्यां विरिञ्चिविष्ण्विन्द्रसुपूजिताभ्याम् । विभूतिपाटीरविलॆपनाभ्यां नमॊ नमः शङ्करपार्वतीभ्याम् ॥०३॥ नमः शिवाभ्यां जगदीश्वराभ्यां जगत्पतिभ्यां जयविग्रहाभ्याम् । जम्भारिमुख्यैरभिवन्दिताभ्यां नमॊ नमः शङ्करपार्वतीभ्याम् ॥०४॥ नमः शिवाभ्यां परमौषधाभ्यां पञ्चाक्षरीपञ्जररञ्जिताभ्याम् । प्रपञ्चसृष्टिस्थितिसंहृताभ्यां नमॊ नमः शङ्करपार्वतीभ्याम् ॥०५॥ नमः शिवाभ्यामतिसुन्दराभ्यां अत्यन्तमासक्तहृदम्बुजाभ्याम् । अशॆषलॊकैकहितङ्कराभ्यां नमॊ नमः शङ्करपार्वतीभ्याम् ॥०६॥ नमः शिवाभ्यां कलिनाशनाभ्यां कङ्कालकल्याणवपुर्धराभ्याम् । कैलासशैलस्थितदॆवताभ्यां नमॊ नमः शङ्करपार्वतीभ्याम् ॥०७॥ नमः शिवाभ्यामशुभापहाभ्यां अशॆषलॊकैकविशॆषिताभ्याम् । अकुण्ठिताभ्यां स्मृतिसम्भृताभ्यां नमॊ नमः शङ्करपार्वतीभ्याम् ॥०...

श्री मंगल चंडिका

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------  ।। श्री मंगलचंडिकास्तोत्रम् ।। ध्यान “ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं सर्वपूज्ये देवी मङ्गलचण्डिके I  ऐं क्रूं फट् स्वाहेत्येवं चाप्येकविन्शाक्षरो मनुः II  पूज्यः कल्पतरुश्चैव भक्तानां सर्वकामदः I दशलक्षजपेनैव मन्त्रसिद्धिर्भवेन्नृणाम् II मन्त्रसिद्धिर्भवेद् यस्य स विष्णुः सर्वकामदः I ध्यानं च श्रूयतां ब्रह्मन् वेदोक्तं सर्व सम्मतम् II  देवीं षोडशवर्षीयां शश्वत्सुस्थिरयौवनाम् I  सर्वरूपगुणाढ्यां च कोमलाङ्गीं मनोहराम् II  श्वेतचम्पकवर्णाभां चन्द्रकोटिसमप्रभाम् I वन्हिशुद्धांशुकाधानां रत्नभूषणभूषिताम् II  बिभ्रतीं कबरीभारं मल्लिकामाल्यभूषितम् I बिम्बोष्टिं सुदतीं शुद्धां शरत्पद्मनिभाननाम् II  ईषद्धास्यप्रसन्नास्यां सुनीलोल्पललोचनाम् I  जगद्धात्रीं च दात्रीं च सर्वेभ्यः सर्वसंपदाम् II  संसारसागरे घोरे पोतरुपां वरां भजे II  देव्याश्च ध्यानमित्येवं स्तवनं श्रूयतां मुने I प्रयतः संकटग्रस्तो येन तुष्टाव शंकरः II || शंकर उवाच || रक्ष रक्...

संकट मोचन हनुमान स्तोत्र

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●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------  संकट मोचन हनुमान स्तोत्र काहे विलम्ब करो अंजनी-सुत । संकट बेगि में होहु सहाई ।। नहिं जप जोग न ध्यान करो । तुम्हरे पद पंकज में सिर नाई ।। खेलत खात अचेत फिरौं । ममता-मद-लोभ रहे तन छाई ।। हेरत पन्थ रहो निसि वासर । कारण कौन विलम्बु लगाई ।। काहे विलम्ब करो अंजनी सुत । संकट बेगि में होहु सहाई ।। जो अब आरत होई पुकारत । राखि लेहु यम फांस बचाई ।। रावण गर्वहने दश मस्तक । घेरि लंगूर की कोट बनाई ।। निशिचर मारि विध्वंस कियो । घृत लाइ लंगूर ने लंक जराई ।। जाइ पाताल हने अहिरावण । देविहिं टारि पाताल पठाई ।। वै भुज काह भये हनुमन्त । लियो जिहि ते सब संत बचाई ।। औगुन मोर क्षमा करु साहेब । जानिपरी भुज की प्रभुताई ।। भवन आधार बिना घृत दीपक । टूटी पर यम त्रास दिखाई ।। काहि पुकार करो यही औसर । भूलि गई जिय की चतुराई ।। गाढ़ परे सुख देत तु हीं प्रभु । रोषित देखि के जात डेराई ।। छाड़े हैं माता पिता परिवार । पराई गही शरणागत आई ।। जन्म अकारथ जात चले । अनुमान बिना नहीं कोउ सहाई ।। मझ...

नर्मदाष्टकम

श्री नर्मदाष्टकम सबिंदु सिन्धु सुस्खल तरंग भंग रंजितम द्विषत्सु पाप जात जात कारि वारि संयुतम कृतान्त दूत काल भुत भीति हारि वर्मदे त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे 1 त्वदम्बु लीन दीन मीन दिव्य सम्प्रदायकम कलौ मलौघ भारहारि सर्वतीर्थ नायकं सुमस्त्य कच्छ नक्र चक्र चक्रवाक् शर्मदे त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे 2 महागभीर नीर पुर पापधुत भूतलं ध्वनत समस्त पातकारि दरितापदाचलम जगल्ल्ये महाभये मृकुंडूसूनु हर्म्यदे त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे 3 गतं तदैव में भयं त्वदम्बु वीक्षितम यदा मृकुंडूसूनु शौनका सुरारी सेवी सर्वदा पुनर्भवाब्धि जन्मजं भवाब्धि दुःख वर्मदे त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे 4 अलक्षलक्ष किन्न रामरासुरादी पूजितं सुलक्ष नीर तीर धीर पक्षीलक्ष कुजितम वशिष्ठशिष्ट पिप्पलाद कर्दमादि शर्मदे त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे 5 सनत्कुमार नाचिकेत कश्यपात्रि षटपदै धृतम स्वकीय मानषेशु नारदादि षटपदै: रविन्दु रन्ति देवदेव राजकर्म शर्मदे त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे 6 अलक्षलक्ष लक्षपाप लक्ष सार सायुधं ततस्तु जीवजंतु तंतु भुक्तिमुक्ति दायकं विरन्ची विष्णु शंकरं स्वकीयधाम वर्म...

अनुलोम-विलोम काव्य

अति दुर्लभ एक ग्रंथ ऐसा भी है हमारे सनातन धर्म मे। इसे तो सात आश्चर्यों में से पहला आश्चर्य माना जाना चाहिए --- यह है दक्षिण भारत का एक ग्रन्थ क्या ऐसा संभव है कि जब आप किताब को सीधा पढ़े तो राम कथा के रूप में पढ़ी जाती है और जब उसी किताब में लिखे शब्दों को उल्टा करके पढ़े तो कृष्ण कथा के रूप में होती है । जी हां, कांचीपुरम के 17वीं शदी के कवि वेंकटाध्वरि रचित ग्रन्थ "राघवयादवीयम्" ऐसा ही एक अद्भुत ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ को ‘अनुलोम-विलोम काव्य’ भी कहा जाता है। पूरे ग्रन्थ में केवल 30 श्लोक हैं। इन श्लोकों को सीधे-सीधे पढ़ते जाएँ, तो रामकथा बनती है और विपरीत (उल्टा) क्रम में पढ़ने पर कृष्णकथा। इस प्रकार हैं तो केवल 30 श्लोक, लेकिन कृष्णकथा (उल्टे यानी विलोम)के भी 30 श्लोक जोड़ लिए जाएँ तो बनते हैं 60 श्लोक। पुस्तक के नाम से भी यह प्रदर्शित होता है, राघव (राम) + यादव (कृष्ण) के चरित को बताने वाली गाथा है ~ "राघवयादवीयम।" उदाहरण के तौर पर पुस्तक का पहला श्लोक हैः वंदेऽहं देवं तं श्रीतं रन्तारं कालं भासा यः । रामो रामाधीराप्यागो लीलामारायोध्ये वासे ॥ १॥ अर्थातः मैं उन भगव...

महामृत्युंजय कवच रुदयमल

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------  संसोधित 💐💐💐 महामृत्युंजय कवच  भैरव उवाच श्रृणुष्व परमेशानि कवचं मन्मुखोदितम्‌ । महामृत्युंजयाख्यस्य न देयं परमाद्भुतम्‌ ॥ यं धृत्वा यं पठित्वा च श्रुत्वा च कवचोत्तमम्‌ । त्रैलोक्याधिपतिर्भूत्वा सुखितोऽस्मि महेश्वरि ॥ तदेववर्णयिष्यामि तव प्रीत्यावरानने । तथापि परमं तत्वं न दातव्यं दुरात्मने ॥ विनियोगः अस्य श्री महामृत्युंजयकवचस्य भैरव ऋषिः । गायत्रीछन्दः मृत्युंजयरुद्रो महादेवो देवता ॥ ॐ बीजं जूं शक्तिः। सः कीलकम्‌। हौमितितत्वं व चतुर्वर्गसाधने विनियोगः ॥ चंद्रमंडलमध्यस्थे रुद्रभाले विचिन्त्यते । तत्रस्थं चिन्तयेत्‌ साध्यं मृत्युमाप्नोपि जीवित ॥ ॐ जूं सः ह्रौं शिरं पातु देवो मृत्युंजयो मम । ॐ श्रीं शिवो ललाटं च ॐ ह्रौं भ्रु वो सदाशिव: ॥ नीलकंठो वतान्नेत्रे कपर्दी मे वतच्छुती । त्रिलोचनो वताद् गण्डौ नासा मे त्रिपुरान्तकः ॥ मुखं पीयूषघटमृदौष्ठौ मे कृत्तिकाम्बरः । हनुं मे हाटकेशनो मुखं बटुक-भैरव :॥ कन्धरां कालमथनो गलं गण प्रियोऽवतु। स्कन्दौ स्कन्दपिता पातु हस्तौ ...

अथ श्री श्रीविष्णु सहस्त्रनामावलिः

।। अथ श्री श्रीविष्णु सहस्त्रनामावलिः ।। 〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰 १. ॐ विश्वस्मै नमः ।। २.ॐ विष्णवे नमः । ३. ॐ वषट्‍काराय नमः । ४. ॐ भूतभव्यभवत्प्रभवे नमः । ५. ॐ भूतकृते नमः । ६. ॐ भूतभृते नमः । ७. ॐ भावाय नमः । ८. ॐ भूतात्मने नमः । ९. ॐ भूतभावनाय नमः । १०. ॐ पूतात्मने नमः । ११. ॐ परमात्मने नमः । १२. ॐ मुक्तानां परमायै गतये नमः । १३. ॐ अव्ययाय नमः । १४. ॐ पुरुषाय नमः । १५. ॐ साक्षिणे नमः । १६. ॐ क्षेत्रज्ञाय नमः । १७. ॐ अक्षराय नमः । १८. ॐ योगाय नमः । १९. ॐ योगिविदां नेत्रे नमः । २०. ॐ प्रधानपुरुषेश्वराय नमः । २१. ॐ नारसिंहवपुषे नमः । २२. ॐ श्रीमते नमः । २३. ॐ केशवाय नमः । २४. ॐ पुरुषोत्तमाय नमः । २५. ॐ सर्वस्मै नमः । २६. ॐ शर्वाय नमः । २७. ॐ शिवाय नमः । २८. ॐ स्थाणवे नमः । २९. ॐ भूतादये नमः । ३०. ॐ निधयेऽव्ययाय नमः । ३१. ॐ समभवाय नमः । ३२. ॐ भावनाय नमः । ३३. ॐ भर्त्रे नमः । ३४. ॐ प्रभवाय नमः । ३५. ॐ प्रभवे नमः । ३६. ॐ ईश्वराय नमः । ३७. ॐ स्वयम्भुवे नमः । ३८. ॐ शम्भवे नमः । ३९. ॐ आदित्याय नमः । ४०. ॐ पुष्कराक्षाय नमः । ४१. ॐ महास्वनाय नमः । ४२. ॐ अनादिनिधनाय नमः । ४३. ॐ धात्रे नमः । ४४. ॐ विधात्...