सत्यम शिवम सुंदरम
शास्त्रो का महावाक्य है सत्यं शिवम् सुन्दरम, मानव जीवन के यही तीन मूल्य हैं, जो सत्य है वही शिव है और जो शिव है वहीं सुंदर है, पश्चिम का सौंदर्यशास्त्री यह मानकर चलता है कि सुंदरता द्रष्टा की दृष्टि में है, यानी सौंदर्य बोध नितांत व्यक्तिनिष्ठ है, परन्तु अध्यात्म सुन्दरता की इस परिभाषा को खारिज कर देती है, वह सत्य, शिव और सुन्दर को सर्वथा वस्तुनिष्ठ मानती है, मूल्य सापेक्ष न होकर निरपेक्ष हैं। मनुष्य इसलिये मनुष्य है, क्योंकि वह मूल्यों के अधीन है, मूल्य उसकी विशिष्ट संपत्ति है, सुन्दर क्या है? जो शिव है वही सुंदर है, अर्थात जिसमें शिवत्व नहीं है, उसमें सौंदर्य भी नहीं है, "यस्मिन् शिवत्वंनास्तितस्मिन सुन्दरम् अपिनास्तिएव" हमारे मन को सुख देने वाली चीज सुंदर है, यह सुंदरता की बचकानी परिभाषा है, सुख और दु:ख संस्कारगत होने के नाते व्यक्तिनिष्ठ हैं, अनुकूल वेदना का नाम सुख है और प्रतिकूल वेदना का नाम दु:ख है। एक ही चीज किसी को सुख देती है और किसी को दु:ख, परंतु सुंदरता तो वस्तुनिष्ठ ही है, हमारे शास्त्र कहते है कि जो कल्याणकारी है वही सुंदर है, यह जरूरी नहीं है कि सुखद चीज सुंदर...