श्री विद्या गोपनीय तत्व
षोडशी (श्री) विद्या और उसका गोपनीयत्व श्री देव्युवाच- परब्रह्मतया साक्षाच्छ्रीविद्या षोडशाक्षरी। कथयं त्वं महादेव यद्यहं तव वल्लभा।। श्री देवी कहती हैं- हे महादेव! यदि मैं आपकी प्रिय हूँ, तब यह बताने की कृपा करे कि साक्षात् परब्रह्मरूप षोडश अक्षर वाली श्रीविद्या क्या है? ईश्वर उवाच- शठत्वेन वरारोहे श्रीविद्यामन्त्रविद्बुध:। योगिनीनां भवेद्भक्ष्य: श्रीगुरौ: शासनात्प्रिये।। ईश्वर कहते हैं- हे प्रिये! हे वरारोहे! यदि श्रीविद्या के ज्ञाता शठ हों तब वे योगिनीगण के भक्ष्य होते हैं। यह श्रीगुरु शासन (आदेश) है। षोडशार्णां महाविद्यां न दद्यात्कस्यचित् प्रिये। राज्ञे राज्यप्रदायापि पुत्राय प्राणदाय वा।। देयं तु सकलं भद्रे साम्राज्यमपि पार्वति। शिरोऽपि प्राणसहितं न देया षोडशाक्षरी।। हे प्रिये! षोडशवर्णात्मक विद्या किसी को प्रदान न करे। राज्य प्रदानकारी राजा को भी, पुत्र को भी अथवा प्राणदान ...