आमंत और पूर्णिमांत
खगोल स्वयं में विज्ञान है. आकाश में टिमटिमाते तारों की बाह्य -अंत: प्रवृत्तियों का बिना वैज्ञानिक यंत्रों का अध्ययन कर हमारे पूर्वजों ने बहुत पहले अनेक खगोलीय रहस्यों का उद्घाटन कर दिया था, जिसे हम ज्योतिष विद्या के नाम से जानते हैं. अनगिनत नक्षत्रों में से कुछ समूहों को विशेष नाम देकर अपनी विद्या और लोक कल्याण में उनको जोड़ा. ऐसे ही नक्षत्र-समूहों में हैं- अश्विनी, भरणी आदि 27 (अभिजित को लेकर 28) नक्षत्र हैं. ज्योतिष के ये मुख्य आधार हैं. सबसे बड़ी बात कि हमारे महीनों के नाम के भी ये ही आधार हैं. चंद्रमा का इन पर संचरण से चांद्र मास और सूर्य के संचरण से सौर मास बनता है. हमारे चैत्र आदि महीनों के नाम चित्रा आदि नक्षत्रों के नाम पर ही पड़ा है. प्रायः चंद्रमा कृष्ण प्रतिपदा से शुक्ल पक्ष की अंतिम तिथि अर्थात् पूर्णिमा को उसी नक्षत्र पर आ जाता है, जिसके नाम पर वह महीना बना है. नारद जी का भी कथन है - यस्मिन् मासे पौर्णमासी येन धिष्ण्येन संयुता। तन्नक्षत्राह्वयो मासः पौर्णमासःतथाह्वयः।। अर्थात पूर्णिमांत मास जिस नक्षत्र से युक्त होता है, यानी पूर्णिमा को जो नक्षत्र रहता है, उसी नाम पर उस महीने...