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विद्या एवम अविद्या

विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह । अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते॥ इसका शाब्दिक अर्थ यह है- जो विद्या और अविद्या-इन दोनों को ही एक साथ जानता है, वह अविद्या से मृत्यु को पार करके विद्या से अमृतत्त्व (देवतात्मभाव = देवत्व) प्राप्त कर लेता है।

।।श्रीमते निगमान्तवेदान्तदेशिकाय नमः।।

।।श्रीमते निगमान्तवेदान्तदेशिकाय नमः।। प्रतिष्ठां सर्वचित्राणां प्रपद्ये मणिपादुकाम् । विचित्रजगदाधारो विष्णुर्यत्र प्रतिष्ठितः ॥1।। –पादुकासहस्रं, श्रीवेद...