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जीवन मे नियम की आवश्यकता

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------  एक व्यवस्थित जीवन जीने के लिए जीवन में नियमों का पालन अपरिहार्य है। नियमरहित जीवन एक अवस्था के बाद भार में परिवर्तित हो जाता है और हमें अपना ही शरीर भारवत प्रतीत होने लगता है। भारतीय ज्ञान-परंपरा में हम जब भी जीवन के संदर्भ में चर्चा करते हैं, तब योग की प्राथमिकता से हम अवगत होते हैं।अष्टांग योग का द्वितीय सोपान नियम है। नियम के बगैर इस संसार में कुछ भी चलायमान नहीं है। सूर्य नित्य बिना किसी आलस्य और व्यर्थ की प्रतिस्पर्धा के बगैर निरंतर हर दिन उगता है और चंद्रमा भी स्थितप्रज्ञ के समान अपने हिस्से की चांदनी बिना किसी रोक-टोक के बिखेरता है। प्रकृति का सब कुछ नियमबद्ध है और जब यह नियमबद्धता टूटती है, तब प्रकृति का सुंदर हरा-भरा कलेवर भी हमें रास नहीं आता।जब प्रकृति नियमों पर इतनी अडिग है तो भला वह मनुष्य को उच्छृंखल होने के लिए कैसे छोड़ सकती है? प्रकृति जब अपने नियम से हटती है तब विकराल घटनाएं घटती हैं और विध्वंस होता है। प्रकृति के समान ही जीवन में भी नियमबद्धता आवश्य...

आध्यात्मिक विचार

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------  “समान रंग के (एक से) पंखवालि कोयलों में हिलेमिले कौए को कौन पहचानता यदि वह स्वयं काँव-काँव न कर बैठता॥६६॥तुल्यवर्णच्छदै: कृष्ण: संगतै: किल कोकिलै:। केन विज्ञायते काक: स्वयं यदि न भाषते ॥६६॥” <<<वि०श्वकाककोकिलान्योक्ति व०वासिष्ठ रा०नि०उ-११६।भाग ६ >>> कहीं पर नदी के किनारे निर्माल्य, अक्षत आदि खाने के लिए शिवलिंग के ऊपर काँव-काँव कर रहे कौवे को देखकर कोई अनुचर उसके काँव-काँव करने के आशय की उत्प्रेक्षा करता है। लिङ्ग्स्योर्ध्वं रटत्काक आत्मानं दर्शयत्ययम्। सर्वाध:पातकोत्तुङ्गगतं पश्यत मामिति॥६२॥ शिवलिंग के ऊपर काँव-काँव करता हुआ कौवा अपने को दृष्टान्तरुप से दर्शा रहा है, हे लोगों, अधोगति के हेतुभूत सब पातकों में से शिवस्वभक्षण के लिए शिवलिंग के आश्रयरुप सर्वोत्कृष्ट पातक को प्रप्त हुए प्रत्यक्ष काकरुप मुझे देखो॥६२॥ दूसरा अनुचर तालाब में काँव करते हुए घूम रहे कौए के प्रति कहता है। काकक कटुकल्कारव कबलितगुणकर्दमे भ्रमन्सरसि।अन्तरयसि मधुपरवं यदतो मे शिरसि ...

शिव और गंग का आध्यामिक चिंतन

जिज्ञासा  शिव और गंगा का आध्यात्मिक चिंतन शिव संस्कृत भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है, कल्याणकारी या शुभकारी। यजुर्वेद में शिव को शांतिदाता बताया गया है। 'शि' का अर्थ है, पापों का नाश करने वाला, जबकि 'व' का अर्थ देने वाला यानी दाता। गंगा में गं शब्द का अर्थ है जाना, गा शब्द का अर्थ है राग। गंगा का शाब्दिक अर्थ है संगीत के ध्वनि के साथ बहती जाना। तो शिव के गुण कल्याण करना है और कल्याण जहाँ पाप यानी अशुद्धता का विनाश हो जाता जी गंगा का स्वभाव है । और जो  शुद्ध हो जाये उसे शिव मिल जाते है इसलिए शिव गंगा एक साथ है  कहते हैं कि ब्रह्मचारिणी गंगा के द्वारा किए स्पर्श से ही महादेव ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया। पत्नी पुरुष की सेवा करती है अतः उसका वास पति के हृदय में अथवा चरणों मे होता है किंतु भगवती गंगा शिव के मस्तक पर विराजति है। भगवान विष्णु के अंगूठे से गंगा प्रकट हुई अतः उसे विष्णुपदी कहां जाता है। भगवान विष्णु के प्रसाद रूप में शिव ने देवी गंगा का पत्नी के रूप में स्वीकार किया और अपने जटाओं में वाश दिए क्योंकि गंगा विष्णुपदी है और विष्णु शिव के आराध्य तो आ...

आम की लकड़ी से हवन नही करना चाहिए प्रमाण सहित

*यज्ञादि कर्मोंमें आमकी समिधासे हवन नहीं करना चाहिए।* परंतु लोगोंको न जाने कहांसे यह भ्रम हो गया है कि हवनमें आमकी समिधा अत्यंत उपयोगी है। *#प्रमाण*- *#यज्ञीयवृक्ष*-  *1 पलाशफल्गुन्यग्रोधाः प्लक्षाश्वत्थविकंकिताः।* *उदुंबरस्तथा बिल्वश्चंदनो यज्ञियाश्च ये।।* *सरलो देवदारुश्च शालश्च खदिरस्तथा।*  *समिदर्थे प्रशस्ताः स्युरेते वृक्षा विशेषतः।।*     (#आह्निकसूत्रावल्यां_वायुपुराणे) *2 शमीपलाशन्यग्रोधप्लक्षवैकङ्कितोद्भवाः।* *वैतसौदुंबरौ बिल्वश्चंदनः सरलस्तथा।।* *शालश्च देवदारुश्च खदिरश्चेति याज्ञिकाः।।*      (#संस्कारभास्करे_ब्रह्मपुराणे) *#अर्थ*- 1पलाश /ढाक/छौला  2फल्गु  3वट  4पाकर  5पीपल  6विकंकत /कठेर  7गूलर  8बेल 9चंदन  10सरल  11देवदारू  12शाल  13खैर  14शमी 15बेंत उपर्युक्त ये सभी वृक्ष यज्ञीय हैं, यज्ञोंमें इनका इद्ध्म (काष्ठ) तथा इनकी समिधाओंका उपयोग करना चाहिए।  शमी व बेल आदि वृक्ष कांँटेदार होने पर भी वचनबलात् यज्ञमें ग्राह्य हैं। *परंतु इन वृक्षोंमें आमका नाम नहीं है।* *#यज्ञीयवृक्षोंके...

स्नान निर्णय

स्नान से न केवल तन की शुद्धि होती है, बल्कि यह मन में पवित्र भाव पैदा करता है। तन व मन की ऐसी पवित्रता और ताजगी से कार्य व संकल्प बिना बाधा के पूरे ही नहीं होते,  अपितु ऊर्जा युक्त होने पर परिणाम भी उत्तम देते हैं। मनुष्य को स्नान करने से दस गुणों की प्राप्ति होती है :-   १- रूप, २- बल, ३- तेज, ४- शुद्धता, ५- आयु, ६- आरोग्य, ७- आलोलुप्तता (स्पष्टता और स्फूर्ति) ८- कुस्वप्ननाश (बुरे सपने का नाश) ९- तप, १०- मेधा (बुद्धि) जो स्नान आलस्यवश नहीं करता उसको अनगिनत रोग और विकार घेर लेते हैं. स्नान के प्रकार – शास्त्रों में तरह-तरह के स्नान बताए गए हैं। जिनमें तीर्थस्नान मन, वचन और कर्म के दोष व पापों को दूर करने वाला माना गया है।वेद स्मृति में स्नान भी सात प्रकार के बताए गए हैं। १. मंत्र स्नान- मंत्र से २. भौम स्नान – मिट्टी से ३.अग्नि स्नान – भस्म से, यज्ञ में हवन के पश्चात हविष्य की बची बुझी हुई भस्म सर्वकार्य सिद्धि का साधन मानी गई है। इसको पूरे शरीर में लगाकर नहाने से स्वास्थ्य मिलता है तथा त्वचा के रोगों से मुक्ति होती है। ऐसा भी कहा गया है कि यह असाध्य रोगादि दुर्घटनाओं से पीडतज...

कुछ ग्रहों के उपाय

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------  1- शनि मुद्रिका (शनिवार के दिन) शनि मंत्र का जाप करते हुये धारण करें। काले घोडे की नाल या नव की किल से बनी होनी चाहिए यह शनि मुद्रिका/अंगूठी…   —– काले घोडे की नाल प्राप्त कर घर के मुख्य दरवाजे के ऊपर लगायें। 2 -बीसा यंत्र मे नीलम जडकर धारण करें। शनि यंत्र को शनिवार के दिन, शनि की होरा में अष्टगंध में भोजपत्र पर बनाकर उडद के आटे से दीपक बनाकर उसमें तेल डालकर दीप प्रज्जवलित करें। फिर शनि मंत्र का जाप करते हुये यंत्र पर खेजडी के फुल पत्र अर्पित करें। तत्पश्चात इसे धारण करने से राहत मिलती हैं। 3- उडद के आटे की रोटी बनाकर उस पर तेल लगायें। फिर कुछ उडद के दाने उस पर रखें। अब रोगी के उपर से सात बार उसारकर शमशान में उसे रख आयें। घर से निकालते समय व वापिस घर आते समय पीछे कदापि नही देखें एवं न ही इस अवधि में किसी से बात करें। ऐसा प्रयोग 21 दिन करने से राहत मिलती है। पूरी   राहत/आराम  न मिलने की स्थिति में इसे बढाकर 43 या 73 दिन तक बिना नागा करें। केवल पुरू...

सन्यासी के लक्षण क्या है

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------  भिक्षुकोपनिषद् के संबंधित दो श्लोक अर्थ समेत नीचे उद्धरित हैं ॐ अथ भिक्षुणां मोक्षार्थिनां कुटीचकबहूदकहंसपरमहंसाश्चेति चत्वारः ॥ अर्थ: मोक्षार्थी भिक्षुओं की चार श्रेणियाँ होती हैं-कुटीचक, बहूदक, हंस और परमहंस ॥ [यहाँ मोक्षार्थी भिक्षुओं के बारे में अनुशासन में बताये जा रहे हैं। भोगार्थी-स्वार्थी भिक्षु थे, जो अपनी असमर्थता के कारण भिक्षा माँगते हैं । मोक्षार्थी समर्थ होते हुए भी लौकिक बन्धनों से ऊपर उठने के क्रम में भिक्षाजीवी बनते हैं।] कुटीचकानाम गौतमभरद्वाजयाज्ञवल्क्यवसिष्ठप्रभृतयोऽष्टौ ग्रासांश्चरन्तो योगमार्गे मोक्षमेव प्रार्थयन्ते ॥ अर्थ: कुटीचक-भिक्षु गौतम, भरद्वाज, याज्ञवल्क्य और वसिष्ठ आदि के समान अष्टग्रास भोजन लेकर योगमार्ग में (योग के माध्यम से) मोक्ष के लिए प्रयत्न करते हैं ॥                                        सम्पूर्ण---🖌        ...

पाखंडी वैष्णवों की क्या गति होती है

*पाखण्डी वैष्णव की गति* *आत्मानं वैष्णवं मत्वा अधर्मा भारते कलौ॥* *कर्ण कण्ठे तथा हस्ते हृदये नगनन्दिनि ! ।* *विधृत्य तुलसीमालां तिलकं हरिमन्दिरम् ॥* *गृह्णीषुर्हरिनामानि सुस्वराणि गृहे गृहे ।* *अन्यस्य सञ्चयं कुर्यः पाषण्डा मानवाधमाः ॥* *तेषां पापं महेशानि ! वर्णितुं नैव शक्यते ।* *अधर्मनिरतो भूत्वा हरेर्नाम वदेद्यदि ॥* *तदा पापान्यशेषाणि नाशयत्येव निश्चित ।* *विहाय सन्ध्यां गायत्री हरिर्नाम स्मरेद्यदि ॥* *यान्यक्षराणि नाम्न्येव वसन्ति च शुचिस्मिते ! ।* *तावत् संख्यान्यनेकानि पापानि च पदे पदे ॥* *अन्नं जलं तथा पुष्पं यद्दत्तं विष्णवे प्रिये ! ।* *अन्नं विष्ठासमं तस्य जलं मूत्र समं स्मृतम् ॥* *गेहे गेहे महेशानि ! वैष्णवी वैष्णवा जनाः ।* *सङ्कश वैष्णवा यत्र स देशः पतितः सदा ॥* हे नगनन्दिनि ! कलिकाल में भारतवर्ष में अधम व्यक्तिगण अपने को वैष्णव  मानकर कान में, कण्ठ में, हाथ में तथा हृदय में तुलसी की माला, तिलक तथा हरिमन्दिर धारण करके घर घर सुस्वर ( मधुर स्वर से ) हरिनाम ग्रहण अर्थात् गान करता है। पाषण्डी मानवाधमगण हरिनाम गान करके अन्न का सञ्चय अर्थात् भिक्षादि करते हैं । हे महेशानि !...

आईना देना वर्जित

सुबह उठते ही चेहरा आईने में ना देखें, नकारात्मक ऊर्जा का पूरे दिन रहेगा प्रभाव 〰〰🌸〰〰🌸〰〰🌸〰〰🌸〰〰🌸〰〰 अक्सर सुबह उठते ही अपना चेहरा आईने में देखने की लोगों की आदत होती है. वास्तु के अनुसार हमें ऐसा कभी नहीं करना चाहिए. इसके पीछे कारण यह है कि ऐसा करने से दिनभर आप पर नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव रह सकता है. किसी और का भी चेहरा ना देखें कहा तो यह भी जाता है कि आंख खुलते ही किसी और का भी चेहरा देखने से खुद को बचाना चाहिए. जान लें कि दिन की शुरुआत के साथ सबसे पहले अपने ईष्ट देवता का ध्यान करना ना भूलें और उठते ही सबसे पहले उनके दर्शन करें. अपनी हथेली को देखें कोशिश करें कि सुबह नींद से उठने के साथ ही सबसे पहले अपनी दोनों हथेलियों को मिला लें और फिर उन्हें देखें, साथ ही भगवान का ध्यान भी करें. ऐसा करने से आपके आत्मविश्वास में वृद्धि होगी और आप पूरे दिन हमेशा खुश रहेंगे. शंख या मंदिर की घंटी सुनाई देना अगर आपके सुबह की शुरुआत शंख या मंदिर की घंटियों की आवाज से होती है, तो यह आपके भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है. इससे आपका पूरा दिन बहुत अच्छा व्यतित होता है. हंस या फूल का दिखना ऐसा बहुत कम...

गंड मूल नक्षत्र

२७ नक्षत्र में से ६ नक्षत्र ऐसे है जिन्हें गंड मूल नक्षत्र कहा जाता है जैसे : अश्विनी नक्षत्र , अश्लेशा , माघ, ज्येष्ठ , मूला, रेवती। इनमे से ३ नक्षत्र अश्विनी , माघ,मूला इसके स्वामी केतु है, तथा अश्लेशा,ज्येष्ठ , रेवती, इनके स्वामी बुध है, इन नक्षत्र को गंड मूल कहा जाता है, गंड: गंड हम उस शब्द को कहते है जहा राशि और नक्षत्र एक साथ समाप्त होता है , तथा दूसरे राशि से नक्षत्र का आरम्भ होता है उसको हम मूल कहते है, और इसका पौराणिक कारण यह है की : - अश्वनी नक्षत्र के चारो चरण मेष राशि में आएगा तथा मेष राशि का स्वामी मंगल एक अग्नि प्रधान गृह है - अश्लेशा नक्षत्र जिसका चारो चरण कर्क राशि में समाप्त होता है जो जल तत्त्व राशि है तथा चंद्रमा इसके बाद अपना संचार सिंह राशि में तथा माघ नक्षत्र में करता है जो को अग्नि तत्त्व राशि है , अर्थात कर्क से सिंह राशि जो की अग्नि तत्त्व राशि है , जल से अग्नि की और चंद्रमा अग्रसर होता है - फिर वृस्चक राशि में ज्येष्ठ के चारो चरण जो धनु राशि तथा मूला नक्षत्र की और चंद्रमा अग्रसर होता है , अर्थात अग्नि तत्त्व (वृस्चक राशि) की और से धनु वायु तत्त्व की और जाता है...

विवाह के कुछ रोचक ज्योतिषी गड़ना,

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------  विवाह और ससुराल की दुरी कन्या विवाह संबंधित शंका समाधान* 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ विवाह कहां होगा 〰️〰️〰️〰️〰️ माता-पिता अपनी कन्या का विवाह करने के लिए वर की कुंडली का गुण मिलान करते हैं। कन्या के भविष्य के प्रति चिंतित माता-पिता का यह कदम उचित है। किंतु, इसके पूर्व उन्हें यह देखना चाहिए कि लड़की का विवाह किस उम्र में, किस दिशा में तथा कैसे घर में होगा? उसका पति किस वर्ण का, किस सामाजिक स्तर का तथा कितने भाई-बहनों वाला होगा? लड़की की जन्म लग्न कुंडली से उसके होने वाले पति एवं ससुराल के विषय में सब कुछ स्पष्टतः पता चल सकता है। ज्योतिष विज्ञान में फलित शास्त्र के अनुसार लड़की की जन्म लग्न कुंडली में लग्न से सप्तम भाव उसके जीवन, पति, दाम्पत्य जीवन तथा वैवाहिक संबंधों का भाव है। इस भाव से उसके होने वाले पति का कद, रंग, रूप, चरित्र, स्वभाव, आर्थिक स्थिति, व्यवसाय या कार्यक्षेत्र, परिवार से संबंध कि आदि की जानकारी प्राप्त की जा सकती है। यहां सप्तम भाव के आधार पर कन्या के विवाह स...

महाभारत में झंडे

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------  महाभारत योद्धा और झण्डा महाभारत में किस क्षत्रिय योद्धा के पास था कौन-सा ध्वज महाभारत में प्रत्येक योद्धा का अपना अलग ध्वज होता था। ईस प्रमुख योद्धाओं के ध्वज के बारे में संक्षिप्त जानकारी। १.#श्रीकृष्ण : योगेश्वर श्रीकृष्ण के झंडे पर गरूड़ अंकित होने से उसे गरूड़ ध्वज कहा जाता है। २.#बलराम : बलरामजी ने हालांकि युद्ध में भाग नहीं लिया था लेकिन बलराम के झंडे पर ताल वृक्ष की छवि अंकित होने से उसे 'ताल ध्वज' कहते थे। ३.#भीष्म : भीष्‍म के पास ताड़ और 5 तारों के चिह्न से युक्‍त विशाल ध्‍वजा-पताका थी। ४.#नकुल : स्वर्ण पीठ लिए लाल हिरण का चित्र अंकित था। ५.#सहदेव : सहदेव के रथ पर लहराने वाले ध्वज पर चांदीजड़ित हंस का चिन्ह बना हुआ था। ६.#अभिमन्यु : अभिमन्यु के ध्वज पर पीले पत्तों वाला पेड़ अंकित था। ७.#कृपाचार्य : कृपाचार्य की ध्वजा पर सांड बना था। ८.#मद्रराज : मद्रराज की ध्वजा पर हल। ९.#वृषसेन : अंगराज वृषसेन की ध्वजा पर मोर। १०.#जयद्रथ : सिंधुराज जयद्रथ के झंडे पर वराह की...

शुभ अशुभ योग

शुभ कार्य करने के लिये अशुभ योगों का त्याग 🌼🍂🌼🍂🌼🍂🌼🍂🌼🍂🌼🍂🌼🍂🌼 शुभाशुभ कर्मो अथवा दैनिक कार्यो में भी मुहूर्त साधना प्राचीन परंपरा रही है इससे मनुष्य भविष्य में होने वाली अशुभ घटनाओं से बच सकता है। कुछ प्रमुख अशुभ योग का विवरण दिया जा रहा है यह आपके लिए अवश्य लाभदायक रहेगा। कुयोग👉  (अशुभ) वार, तिथि एवं नक्षत्रों के संयोग से अथवा केवल नक्षत्र के आधार पर कुछ ऐसे अशुभ योग बनते हैं जिन्हें, कुयोग कहा जा सकता है। इन कुयोगों में कोई शुभ कार्य प्रारंभ किया जाए तो वह सफल नहीं होता अपितु उसमें हानि, कष्ट एवं भारी संकट का सामना करना पड़ता है।  कुयोग-सुयोग: यदि किन्हीं कारणों से एक कुयोग तथा एक सुयोग एक ही दिन पड़ जाए तो भी उस दिन को त्याग देना चाहिये ।  दग्ध नक्षत्र👉  रविवार को भरणी, सोमवार को चित्रा, मंगलवार को उत्तराषाढ़ा, बुधवार को धनिष्ठा, गुरुवार को उत्तरा फाल्गुनी, शुक्रवार को ज्येष्ठा, शनिवार को रेवती नक्षत्र दग्ध नक्षत्र कहलाते हैं। इनमें कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाना चाहिए। मास-शून्य नक्षत्र👉  चैत्र में अश्विनी और रोहिणी, वैशाख में चित्रा और स्वात...

गाय चेतना के लिए सीढी है

गाय चेतना के लिए सीढी है, पशु से उपर उठकर मनुष्य बनने के लिये -  चेतना अपनी अंतर्यात्रा में पेड़ -पौधे, कीट - पतंग और पशु - पक्षी की योनियों से गुजरती हुई, अंत में गाय की योनि में प्रवेश करती है। और गाय का जीवन जीती है।  गाय की योनि में आकर चेतना की समझ इतनी विकसित हो चुकी होती है कि वह आसानी से मनुष्य योनि में छलांग लगा जाती है। गाय पशु और मनुष्य के बीच की एक कड़ी है। गाय चेतना के लिए एक सीढी है, पशु से उपर उठकर मनुष्य बनने के लिये। गाय में आकर चेतना उस तल पर आ खड़ी होती है, जहां से अगले जन्म में मनुष्य योनि में प्रवेश करना सहज ही घट जाता है।  इसलिए हमारे हिंदू धर्म में गाय को इतना महत्व दिया जाता है। उसकी पूजा करके उसे धन्यवाद दिया जाता है, कि धन्य है तू, जो यहां तक आ पहुंची है। उसे संबल दिया जाता है, कि हम भी एक समय वहीं थे जहां आज तू खड़ी है। अब तेरा अगला जन्म मनुष्य का है, हम तेरी पूरी मदद करेंगे, ताकि तू मनुष्य में आकर स्वयं को मुक्त कर सके!  गाय को रोटी देकर, रोटी के स्वाद से उसे अभी से ही परिचित करवाना शुरू कर दिया जाता है, ताकि रोटी का यह स्वाद उसे मनुष्य यो...

मनुस्मृति और शूद्र

*मनुस्मृति और शूद्र -* भारत में आज अनेक संकट छाये हुए हैं – भ्रष्टाचार, आतंकवाद, कट्टरवाद, धर्मांतरण, नैतिक अध : पतन, अशिक्षा, चरमरायी हुई स्वास्थ्य व्यवस्था, सफ़ाई की समस्या वगैरह – वगैरह | पर इन सभी से ज्यादा भयावह है – जन्मना जातिवाद और लिंग भेद | क्योंकि यह दो मूलभूत समस्याएँ ही बाकी समस्याओं को पनपने में मदद करती हैं | यह दो प्रश्न ही हमारे भूत और वर्तमान की समस्त आपदाओं का मुख्य कारण हैं |  इन को मूल से ही नष्ट नहीं किया तो हमारा उज्जवल भविष्य सिर्फ़ एक सपना बनकर रह जाएगा क्योंकि एक समृद्ध और समर्थ समाज का अस्तित्व जाति प्रथा और लिंग भेद के साथ नहीं हो सकता | यह भी गौर किया जाना चाहिए कि जाति भेद और लिंग भेद केवल हिन्दू समाज की ही समस्याएँ नहीं हैं किन्तु यह दोनों सांस्कृतिक समस्याएँ हैं | लिंग भेद सदियों से वैश्विक समस्या रही है और जाति भेद दक्षिण एशिया में पनपी हुई, सभी धर्मों और समाजों को छूती हुई समस्या है | चूँकि सनातन वेद सबसे प्राचीन संस्कृति और सभी धर्मों का आदिस्रोत है, इसी पर व्यवस्था को भ्रष्ट करने का आक्षेप मढ़ा जाता है | यदि इन दो कुप्रथाओं को हम ढोते रहते हैं तो...

समता का भाव

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------  🌺दृष्टि में समता का भाव🌺दृष्टि सम कैसे हो?सर्व प्रथम अपने भीतर यह भाव दृढ रहना चाहिए कि''मैं साधक हूँ''परमात्मा का जिज्ञासु हूँ''और एक बात यह कि सब में परमात्मा है। सब में परमात्मा को कैसे देखें?इस बात पर थोङा ध्यान देने की आवश्यकता है।मनुष्य है --इसमें जो ''है''---पना है सत्ता है,वह कभी मिटती नहीं।वह बुरा हो या भला हो,दुराचारी हो या सदाचारी हो,उसमें जो ''है''--पना हैवह मिटेगा क्या?उत्तम से उत्तम वस्तुओं में भी वह ''है''--पना है और जो निम्न से निम्न दृष्टिगोचर होती है उसमें भी ''है''--पना है।उन वस्तुओं का रूप बदल जाता है पर ''है'--पना(सत्ता)नहीं बदलता।कूङा करकट को जला दो तो वह राख बन जाएगा।पर उसकी सत्ता दूसरी नहीं हो जाएगी।वह सत्ता परमात्मा की है।उस सत्ता की तरफ दृष्टि रखनी चाहिए।जो परिवर्तन होता है वह प्रकृति में होता है।🌸संक्षेप में प्रकृति का स्वरूप बताऐं तो एक वस्तु और एक क्रिया---ये द...

सोलह श्रृंगार

क्या होते है, सोलह श्रृंगार?????? सोलह श्रृंगार के बारें में ये सब नहीं जानते होंगे आप,आपको शायद जानकर आश्चर्य होगा कि सोलह शृंगार घर मे सुख और समृद्धि की लाने के लिए किया जाता है। शृंगार अगर पवित्रता और दिव्यता के हिसाब से किया जाए तो यह प्रेम और अहिंसा का सहायक बनकर समाज में सौम्यता और प्यार का वाहक बनता है। तभी तो भारतीय संस्कृति में सोलह शृंगार को जीवन का अहम और अभिन्न अंग माना गया है। ऋग्वेद में सौभाग्य के लिए किए जा रहे सोलह शृंगारों के बारे में बताया गया है। आईए जानते हैं श्रृंगार के बारे में कुछ रोचक तथ्य... पहला श्रृंगार: बिंदी : - संस्कृत भाषा के बिंदु शब्द से बिंदी की उत्पत्ति हुई है। भवों के बीच रंग या कुमकुम से लगाई जाने वाली भगवान शिव के तीसरे नेत्र का प्रतीक मानी जाती है। सुहागिन स्त्रियां कुमकुम या सिंदूर से अपने ललाट पर लाल बिंदी लगाना जरूरी समझती हैं। इसे परिवार की समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। दूसरा श्रृंगार, सिंदूर : - उत्तर भारत में लगभग सभी प्रांतों में सिंदूर को स्त्रियों का सुहाग चिन्ह माना जाता है और विवाह के अवसर पर पति अपनी पत्नी के मांग में सिंदूर भर कर जी...