पाखंडी वैष्णवों की क्या गति होती है

*पाखण्डी वैष्णव की गति*


*आत्मानं वैष्णवं मत्वा अधर्मा भारते कलौ॥*
*कर्ण कण्ठे तथा हस्ते हृदये नगनन्दिनि ! ।*
*विधृत्य तुलसीमालां तिलकं हरिमन्दिरम् ॥*
*गृह्णीषुर्हरिनामानि सुस्वराणि गृहे गृहे ।*
*अन्यस्य सञ्चयं कुर्यः पाषण्डा मानवाधमाः ॥*
*तेषां पापं महेशानि ! वर्णितुं नैव शक्यते ।*
*अधर्मनिरतो भूत्वा हरेर्नाम वदेद्यदि ॥*
*तदा पापान्यशेषाणि नाशयत्येव निश्चित ।*
*विहाय सन्ध्यां गायत्री हरिर्नाम स्मरेद्यदि ॥*
*यान्यक्षराणि नाम्न्येव वसन्ति च शुचिस्मिते ! ।*
*तावत् संख्यान्यनेकानि पापानि च पदे पदे ॥*
*अन्नं जलं तथा पुष्पं यद्दत्तं विष्णवे प्रिये ! ।*
*अन्नं विष्ठासमं तस्य जलं मूत्र समं स्मृतम् ॥*
*गेहे गेहे महेशानि ! वैष्णवी वैष्णवा जनाः ।*
*सङ्कश वैष्णवा यत्र स देशः पतितः सदा ॥*


हे नगनन्दिनि ! कलिकाल में भारतवर्ष में अधम व्यक्तिगण अपने को वैष्णव  मानकर कान में, कण्ठ में, हाथ में तथा हृदय में तुलसी की माला, तिलक तथा हरिमन्दिर धारण करके घर घर सुस्वर ( मधुर स्वर से ) हरिनाम ग्रहण अर्थात् गान करता है। पाषण्डी मानवाधमगण हरिनाम गान करके अन्न का सञ्चय अर्थात् भिक्षादि करते हैं ।

हे महेशानि ! उन लोगों के पाप का मैं वर्णन भी नहीं कर सकता । स्वधर्म परायण होकर यदि कोई व्यक्ति हरिनाम का उच्चारण करता है, तब उसी समय में वह निश्चय ही अपने बहुविध (विभिन्न प्रकार ) पापों को नाश करता है । सन्ध्या तथा गायत्री का परित्याग करके यदि कोई हरिनाम का स्मरण करता है तो हे शुचिस्मिते ! उस नाम में जितने अक्षर रहते हैं, पद पद में (जन्म जन्म में ) उसको उतना संख्यक बहुपाप होता है ।

हे प्रिये ! अन्न, जल तथा पुष्प-जो विष्णु को अर्पित होता है, उसके द्वारा दत्त अन्न विष्ठातुल्य है, जल मूत्र  तुल्य कहा गया है ।

हे महेशानि ! घर घर में वैष्णवी तथा वैष्णव लोग विद्यमान हैं ।
जिस देश में संकर वैष्णव वास करता है, वह देश सर्वदा पतित है।।

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