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स्त्री_शब्दकी_व्युत्पत्ति

श्रीराम! स्त्री-- *शुक्रशोणितसङ्घाताश्रयत्वम् स्त्रीत्वम्।* #स्त्यै शब्दसङ्घातयो: धातो: #स्तायतेर्ड्रट् इत्यनेन #ड्रट् प्रत्ययः। अनु.लोपः।  स्त्यै + र, डित्त्वात् प्रकृते: टेर्लोपः -- स्त्य् र, #लोपो_व्योर्वलि इति य् लोपः--स्त्र। पुनः स्त्रीत्वविवक्षायाम्  टित्त्वाद् #ङीप्-- स्त्र+ङीप्, अनु.लोपः। #यस्येति_च"  इति अल्लोपः-- स्त्री।     अस्य व्युत्पत्ति:-- स्त्यायतः सङ्गते भवतः शुक्रशोणिते अस्याम् इति स्त्री।  --जिसमें शुक्र शोणित (रज:) सङ्घात ( मिश्रण/मेल) को प्राप्त होते हैं, वह स्त्री है।         यहाँ प्रश्न यह उठता है-- जिन में शुक्र शोणित का मेल गर्भाधान) नहीं होता, अविवाहित रहने वालीं या साध्वियाँ,  क्या वे स्त्रियाँ नहीं हैं?     अथवा यह व्युत्पत्ति ही त्रुटित है? या कोई और सङ्गति है? यहाँ यह ध्यातव्य है कि किसी रोग व्याधि आदि उपाधि/निमित्तसे यदि किन्हींमें सङ्घात नहीं होता है, तो उनके  विषय में यह व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ  अव्याप्त नहीं होता।        चाहे साध्वियाँ हों, ब्रह्मचारिणियाँ, हों य...

एकादशमुखी हनुमान

एकादशमुखी हनुमानजी के रहस्य एवं कवच 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ एकादशमुखी हनुमानजी महात्म्य 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ शंकर जी बोले हे उमा ! परम भक्ति पद एकादश मुखी हनुमान जी का चरित्र ,इन्द्रियों से फ़ांस छुड़ाने वाला, इस संसार सागर से मोक्ष दिलाने वाला, सब संकट, दु:ख,ताप, भय को हरने वाला है। सुनो  दोहा भए पुकारत सुरन्ह सब, त्राहि त्राहि परमेश।  सीय रमन करुन अयन, हरहु हमर कलेश।। शिवजी कहते है कि - कालकारमुख नामक एक भयानक बलवान राक्षस हुआ। ग्यारह मुख वाले उस विकराल राक्षस ने बहुत काल तक ब्रम्हा जी की कठोर ताप किया। उसके ताप से प्रसन्न हो कर ब्रम्हा जी ने कालकार मुख राक्षस से कहा की हे तात मुझसे वर मांगो। असुर बोला कि हे कर्तार-आप मुझे ऐसा वर दीजिये -"मुझे कोई भी जीत न पावे ,रण में सामने काल भी क्यों न हो! जो मेरे जनम की तिथि पर ग्यारह मुख धारण करे वही मुझे मारे "तथास्तु कहकर चतुरानन ब्रम्हा जी अन्तर्ध्यान हो गए। वरदान पाकर अभिमानी असुर जगत में मनमानी करने लगा। उसने देवताओ के सभी अधिकार छीन लिए तथा श्रुतियो के सभी आचार भ्रष्ट कर दिए। संसार अति त्रस्त हो गया एवं अपार हाहाकार मच गया।...

आध्यात्मिक विचार

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------  “समान रंग के (एक से) पंखवालि कोयलों में हिलेमिले कौए को कौन पहचानता यदि वह स्वयं काँव-काँव न कर बैठता॥६६॥तुल्यवर्णच्छदै: कृष्ण: संगतै: किल कोकिलै:। केन विज्ञायते काक: स्वयं यदि न भाषते ॥६६॥” <<<वि०श्वकाककोकिलान्योक्ति व०वासिष्ठ रा०नि०उ-११६।भाग ६ >>> कहीं पर नदी के किनारे निर्माल्य, अक्षत आदि खाने के लिए शिवलिंग के ऊपर काँव-काँव कर रहे कौवे को देखकर कोई अनुचर उसके काँव-काँव करने के आशय की उत्प्रेक्षा करता है। लिङ्ग्स्योर्ध्वं रटत्काक आत्मानं दर्शयत्ययम्। सर्वाध:पातकोत्तुङ्गगतं पश्यत मामिति॥६२॥ शिवलिंग के ऊपर काँव-काँव करता हुआ कौवा अपने को दृष्टान्तरुप से दर्शा रहा है, हे लोगों, अधोगति के हेतुभूत सब पातकों में से शिवस्वभक्षण के लिए शिवलिंग के आश्रयरुप सर्वोत्कृष्ट पातक को प्रप्त हुए प्रत्यक्ष काकरुप मुझे देखो॥६२॥ दूसरा अनुचर तालाब में काँव करते हुए घूम रहे कौए के प्रति कहता है। काकक कटुकल्कारव कबलितगुणकर्दमे भ्रमन्सरसि।अन्तरयसि मधुपरवं यदतो मे शिरसि ...

बृहत्संहिता के अनुसार सूर्य और चंद्र के दश ग्रास

सुत्र:- (राहुचाराध्याय: श्लोक ४३) सव्यापसव्यलेहग्रसननिरोधावमर्दनारोहा: । आघ्रातं मध्यतमस्तमो∙न्त्य इति ते दश ग्रासा:॥ इस सुत्र के‍ अनुसार सूर्य एवं चंद्रमा के ग्रहण के समय उत्पन्न स्थिति से सव्य, अपसव्य, लेह, ग्रसन, निरोध, अवमर्दन, आरोह, आघ्रात, मध्यतम, तमोन्त्‍य ये सूर्य एवं चंद्र के दश ग्रास होते है ।    सूर्य ग्रहण हमेशा आमावस्या के दिन होता है। सूर्य एवं पृथ्वी के बिच में चंद्र आने पर सूर्य ग्रहण की स्थिती बनती है, तथा चंद्र ग्रहण हमेशा पूर्णिमा के दिन होता है। सूर्य तथा चंद्रमा के बीच में पृथ्वी आने पर चंद्र ग्रहण की स्थिती बनती है।    सभी देशों में प्राय: चंद्र ग्रहण एक रूप का तथा सूर्य ग्रहण अलग अलग आकृती का दिखता है । उसका कारण यह है कि बादलो की तरह अध:स्थित चंद्रमा पश्चिम की ओर से आकर रविबिंब को ढकता है । इसलिए प्रत्येक देश में सूर्य ग्रहण अलग अलग रूपो में दिखाई देता है। १ सव्यग्रास : ग्रहण के समय में सूर्य या चंद्र से सव्य (दक्षिण भाग) में होकर राहु गमन करे तो संसार हर्षित, भय रहित और जल से पूर्ण होता है । संसार में सूख, शांती होती है । २ अपसव्य : यदि राहु ...

एक ही अक्षर से बना श्लोक

एक ही अक्षर से बना श्लोक पढ़ा है कभी..?? यदि नहीं, तो लीजिए..👇👇 *"कः कौ के केककेकाकः* *काककाकाककः ककः।* *काकः काकः ककः काकः*  *कुकाकः काककः कुकः॥"* अर्थात- परब्रह्म (कः) [श्री राम] पृथ्वी (कौ) और साकेतलोक (के) में [दोनों स्थानों पर] सुशोभित हो रहे हैं। उनसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में आनन्द निःसृत होता है। वह मयूर की केकी (केककेकाकः) एवं काक (काकभुशुण्डि) की काँव-काँव (काककाकाककः) में आनन्द और हर्ष की अनुभूति करते हैं। उनसे समस्त लोकों (ककः) के लिए सुख का प्रादुर्भाव होता है। उनके लिए [वनवास के] दुःख भी सुख (काकः) हैं। उनका काक (काकः) [काकभुशुण्डि] प्रशंसनीय है। उनसे ब्रह्मा (ककः) को भी परमानन्द की प्राप्ति होती है। वह [अपने भक्तों को] पुकारते (काकः) हैं। उनसे कूका अथवा सीता (कुकाकः) को भी आमोद प्राप्त होता है। वह अपने काक [काकभुशुण्डि] को पुकारते (काककः) हैं और उनसे सांसारिक फलों एवं मुक्ति का आनन्द (कुकः) प्रकट होता है।🙏😊

आर्यसमाजियों के पाखण्ड का कालजयी खण्डन --

आर्यसमाजियों के पाखण्ड का कालजयी खण्डन -- सभी सनातन वैदिक धर्मावलम्बी  विप्रजन आर्यसमाजियों के  मत के खण्डन में यह कालजयी ग्रन्थ पढें  और अपने परिजनों को भी पढ़ायें  ----- ------ वेदार्थ पारिजात भाष्य वार्तिक ----- https://archive.org/details/VedarthaParijataBhashyaVartikam  रचयिता - परमपूज्य  जगद्गुरु पुरी शंकराचार्य स्वामी श्री निरञ्जन देवतीर्थ जी महाराज ।  🙏 कथित सामाजिकों  के लिये दो शब्द  -------  यदि   सनातनधर्म की पौराणिक परम्पराओं का  विरोध करने वाले कथित आर्यसमाजी   समाजसुधारकों द्वारा  तिब्बत की गुफाओं  में खोजबीन की जाये तो अवश्य ही  ब्राह्मणवादी सनातनी  इतिहास के विरुद्ध  आर्य नारी उत्थान की दिशा में उनका ये दिवास्वप्न भी पूरा होगा , जहॉ, -  नारी वेद, स्त्री वेद,   महिला वेद,  कैकेयी गृह्यसूत्र ,   मन्थरा संहिता ,  मैत्रेयी  शुल्वसूत्र , अपाला धर्मसूत्र,  गार्गी स्मृति , सीता श्रौतसूत्र  , मन्दोदरी विमानशास्त्र  , कैकेयी ...

शिव और गंग का आध्यामिक चिंतन

जिज्ञासा  शिव और गंगा का आध्यात्मिक चिंतन शिव संस्कृत भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है, कल्याणकारी या शुभकारी। यजुर्वेद में शिव को शांतिदाता बताया गया है। 'शि' का अर्थ है, पापों का नाश करने वाला, जबकि 'व' का अर्थ देने वाला यानी दाता। गंगा में गं शब्द का अर्थ है जाना, गा शब्द का अर्थ है राग। गंगा का शाब्दिक अर्थ है संगीत के ध्वनि के साथ बहती जाना। तो शिव के गुण कल्याण करना है और कल्याण जहाँ पाप यानी अशुद्धता का विनाश हो जाता जी गंगा का स्वभाव है । और जो  शुद्ध हो जाये उसे शिव मिल जाते है इसलिए शिव गंगा एक साथ है  कहते हैं कि ब्रह्मचारिणी गंगा के द्वारा किए स्पर्श से ही महादेव ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया। पत्नी पुरुष की सेवा करती है अतः उसका वास पति के हृदय में अथवा चरणों मे होता है किंतु भगवती गंगा शिव के मस्तक पर विराजति है। भगवान विष्णु के अंगूठे से गंगा प्रकट हुई अतः उसे विष्णुपदी कहां जाता है। भगवान विष्णु के प्रसाद रूप में शिव ने देवी गंगा का पत्नी के रूप में स्वीकार किया और अपने जटाओं में वाश दिए क्योंकि गंगा विष्णुपदी है और विष्णु शिव के आराध्य तो आ...

चौराशी लाख योनियों का प्रमाण

कौन कौन सी है यह 84 लाख योनियां  : पदम् पुराण में हमें एक श्लोक मिलता है जो इस धरती पर जलचर, नभचर , स्थलचर एककोशिकीय, बहुकोशिकीय, और अन्य कोटि के जीव जंतु की संख्या बतायी गयी है। श्लोक इस तरह है जलज नव लक्षाणी, स्थावर लक्ष विम्शति, कृमयो रूद्र संख्यकः अर्थ : पानी के जीव जंतु 9 लाख , स्थिर प्राणी यानि पेड़ 20 लाख ,11 लाख सर्प समान जहरीले पक्षिणाम दश लक्षणं, त्रिन्शल लक्षानी पशवः, चतुर लक्षाणी मानवः  अर्थ : पक्षी 10 लाख, पशु स्थल वाले 30 लाख और 4 लाख मनुष्य समान प्राणी , जलीय जीव – 9 लाख स्थिर पेड़ पोधे – 20 लाख सरीसृप/कृमी/कीड़े-मकोड़े – 11 लाख नभचर– 10 लाख स्थलीय/थलचर – 30 लाख मानवीय नस्ल के बन्दर वनमानुष आदि – 4 लाख कुल प्रजातिया = 84 लाख योनियां  । आधुनिक विज्ञान का मत : हमारे वैज्ञानिक अभी तक 13 लाख जीवो की खोज कर चुके है और अभी भी उनका शोध चालू है | हर साल उनकी शोध में नए नए जीव सामने आ रहे है | हमारे पुराणों ने कई युगों पहले ही जो बात बता दी थी , उस बात के करीब धीरे धीरे वैज्ञानिक और खोजकर्ता पहुँच रहे है |

बजरंग बाण सिद्धि

बजरंग बाण सिद्ध करने की विधि 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ इस लेख में हम हनुमान जी के बजरंग बाण के रात्रि में किये जाने वाले पाठ के विषय में बता रहे है। वैसे तो बजरंग बाण का नियमित रूप से पाठ आपको हर संकट से दूर रखता है। किन्तु अगर रात्रि में बजरंग बाण को इस प्रकार से सिद्ध किया जाये तो इसके चमत्कारी प्रभाव तुरंत ही आपके सामने आने लगते है। अगर आप चाहते है अपने शत्रु को परास्त करना या फिर व्यापर में उन्नति या किसी भी प्रकार के अटके हुए कार्य में पूर्णता तो रात्रि में नीचे दिए अनुसार बजरंग बाण पाठ को अवश्य करें। विधि इस प्रकार है : –  〰️〰️〰️〰️〰️〰️ किसी भी मंगलवार को रात्रि का 11 से रात्रि 1 बजे तक का समय सुनिश्चित कर ले, बजरंग बाण का पाठ आपको 11 से रात्रि 1 तक करना है, सबसे पहले आप एक चौकी को पूर्व दिशा की तरफ स्थापित करें अब इस चौकी पर एक पीला कपडा बिछा दे, अब आप इस मंत्र को एक कागज पर लिख कर इसे फोल्ड करके इस चौकी पर रख दे।  मंत्र इस प्रकार है :  “ॐ हं हनुमते रुद्रात्मकाय हुं फट् ”  अब आप चौकी के दायें तरफ एक मिटटी के दिए में घी का दीपक जला दे। आपको इस चौकी के सामने आसन...

वैष्णव पवित्र चिन्ह

तप्त-शंख-चक्र से मनुष्य मोक्ष का अधिकारी ----------------------------------------------------   'अश्नुते शृतास' -----------------   पवित्रं ते विततं ब्रह्मणस्पते प्रभुर्गात्राणि पर्येषि विश्वत: । अतप्ततनूर्न तदामो अश्नुते शृतास इद्वहन्तस्तत्समाशत ।।       –ऋग्वेद, मण्डल 9, सूक्त 83,1  सायणभाष्यम् ----------------- 'पवित्रं ते ' इति पञ्चर्चं षोडशं सूक्तमाङ्गिरसस्य पवित्रस्यार्षं जागतं पवमानसोमदेवताकम् । तथा चानु शंख-क्रान्तं- 'पवित्रं ते पवित्रः' इति । अभिष्टव आद्ये ऋचौ वक्तव्ये । सूत्रितं च पवित्रं ते विततं ब्रह्मणस्पत इति द्वे वि यत्पवित्रं धिषणा अतन्वत ' ( आश्व. श्रौ. 4,6) इति ॥ प॒वित्रं॑ ते॒ वित॑तं ब्रह्मणस्पते प्र॒भुर्गात्रा॑णि॒ पर्ये॑षि वि॒श्वतः॑ । अत॑प्ततनू॒र्न तदा॒मो अ॑श्नुते शृ॒तास॒ इद्वहं॑त॒स्तत्समा॑शत ॥१ पदार्थान्वयः -------------- प॒वित्र॑म् । ते॒ । विऽत॑तम् । ब्र॒ह्म॒णः॒ । प॒ते॒ । प्र॒ऽभुः । गात्रा॑णि । परि॑ । ए॒षि॒ । वि॒श्वतः॑ । अत॑प्तऽतनूः । न । तत् । आ॒मः । अ॒श्नु॒ते॒ । शृ॒तासः॑ । इत् । वह॑न्तः । तत् । सम् । आ॒श॒त॒ ॥१ पवित्रम् । ते । विऽततम् ...

वेद पुरुष मूर्त रूप

·  वेद रूप पुरुष के मुख्य छह अंगो में --- व्याकरण शास्त्र ....वेद का मुख , ज्योतिष शास्त्र ....दोनों नेत्र , निरुक्त ....दोनों कान , कल्प शास्त्र ....दोनों हाथ , शिक्षा शास्त्र ....वेद की नासिका और छंद शास्त्र ....वेद पुरुष के दोनों पैर कहे गए है । वेदांग / Vedang • वेद पुरुष के 6 अंग माने गये हैं- कल्प, शिक्षा, छन्द, व्याकरण, निरुक्त तथा ज्योतिष। मुण्डकोपनिषद में आता है- 'तस्मै स हो वाच। द्वै विद्ये वेदितब्ये इति ह स्म यद्ब्रह्म विद्यौ वदंति परा चैवोपरा च॥ तत्रापरा ॠग्वेदो यजुर्वेद: सामवेदोऽर्थ वेद: शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दोज्योतिषमिति। अथ परा यथा तदक्षरमधिगम्यते॥'* 'अर्थात मनुष्य को जानने योग्य दो विद्याएं हैं-परा और अपरा। उनमें चारों वेदों के शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद, ज्योतिष- ये सब 'अपरा' विद्या हैं तथा जिससे वह अविनाशी परब्रह्म तत्व से जाना जाता है, वही 'परा' विद्या है।' इन छ: को इस प्रकार बताया गया है- ज्योतिष वेद के दो नेत्र हैं, निरुक्त 'कान' है, शिक्षा 'नाक', व्याकरण 'मुख' तथा कल्प 'दोनों हाथ...

शिव के पैतीस रहस्य

भगवान शिव के पेंतीस रहस्य !     भगवान शिव अर्थात पार्वती के पति शंकर जिन्हें महादेव, भोलेनाथ, आदिनाथ आदि कहा जाता है, उनके बारे में यहां प्रस्तुत हैं 35 रहस्य।   1. आदिनाथ शिव : - सर्वप्रथम शिव ने ही धरती पर जीवन के प्रचार-प्रसार का प्रयास किया इसलिए उन्हें 'आदिदेव' भी कहा जाता है। 'आदि' का अर्थ प्रारंभ। आदिनाथ होने के कारण उनका एक नाम 'आदिश' भी है।   2. शिव के अस्त्र-शस्त्र : - शिव का धनुष पिनाक, चक्र भवरेंदु और सुदर्शन, अस्त्र पाशुपतास्त्र और शस्त्र त्रिशूल है। उक्त सभी का उन्होंने ही निर्माण किया था।   3. शिव का नाग : - शिव के गले में जो नाग लिपटा रहता है उसका नाम वासुकि है। वासुकि के बड़े भाई का नाम शेषनाग है।   4. शिव की अर्द्धांगिनी : - शिव की पहली पत्नी सती ने ही अगले जन्म में पार्वती के रूप में जन्म लिया और वही उमा, उर्मि, काली कही गई हैं।   5. शिव के पुत्र : - शिव के प्रमुख 6 पुत्र हैं- गणेश, कार्तिकेय, सुकेश, जलंधर, अयप्पा और भूमा। सभी के जन्म की कथा रोचक है।   6. शिव के शिष्य : - शिव के 7 शिष्य हैं जिन्हें प्रारंभिक सप्तऋषि माना गया है।...

शक्तिपात भाग1 एवं भाग 2

*शक्तिपात सूत्र भाग-१* *१. अथातः शक्तिपातं व्याख्यास्यामः ।* अब यहाँ से हम शक्तिपात की व्याख्या करेंगे। *'अथ'* शब्द का प्रयोग मङ्गलार्थ किया जाता है। जैसा कि कहा है- *ॐकारश्चाथ शब्दश्च द्वावेतौ ब्रह्मरणः पुरा।* *कण्ठं भित्त्वा विनिर्यातौ तस्मान्माङ्गलिकावुभौ ॥* -ॐकार' और 'अथ' दोनों शब्द पहले ब्रह्माजी के कण्ठ को भेद कर बाहर निकले थे, इसलिए ये दोनों माङ्गलिक शब्द हैं।'  यहाँ पर 'अथ' शब्द का प्रयोग आनन्तर्यार्थ में किया गया है। यद्यपि 'शक्तिपात' की दीक्षा ग्रहण करने के लिए किसी पूर्व साधन अथवा किसी शास्त्र के अध्ययन की अनिवार्य आवश्यकता नहीं है। जिस पर गुरु अनुग्रह करते हैं, उसी को इस की प्राप्ति हो सकती है, चाहे शिष्य शास्त्रों का विद्वान् हो, चाहे कुछ भी पढ़ा न हो, उस ने योगानुष्ठान किया हो अथवा न किया हो । बिना पूर्वानुष्ठित तैयारी की अपेक्षा के, गुरु के 'शवितपात' रूप अनुग्रह से, शिष्य की शक्ति का उद्बोधन हो जाता है । यहाँ 'शक्तिपात' के विज्ञान की व्याख्या करने का तात्पर्य यह है कि आधुनिक भौतिक विज्ञानों के अन्वेषणों के सदृश्य पू...

शयन के नियम

, *शयन के नियम :- 1. *सूने तथा निर्जन* घर में अकेला नहीं सोना चाहिए। *देव मन्दिर* और *श्मशान* में भी नहीं सोना चाहिए। *(मनुस्मृति)* 2. किसी सोए हुए मनुष्य को *अचानक* नहीं जगाना चाहिए। *(विष्णुस्मृति)* 3. *विद्यार्थी, नौकर औऱ द्वारपाल*, यदि ये अधिक समय से सोए हुए हों, तो *इन्हें जगा* देना चाहिए। *(चाणक्यनीति)* 4. स्वस्थ मनुष्य को आयुरक्षा हेतु *ब्रह्ममुहुर्त* में उठना चाहिए। *(देवीभागवत)* बिल्कुल *अँधेरे* कमरे में नहीं सोना चाहिए। *(पद्मपुराण)* 5. *भीगे* पैर नहीं सोना चाहिए। *सूखे पैर* सोने से लक्ष्मी (धन) की प्राप्ति होती है। *(अत्रिस्मृति)* टूटी खाट पर तथा *जूठे मुँह* सोना वर्जित है। *(महाभारत)* 6. *”नग्न होकर/निर्वस्त्र”* नहीं सोना चाहिए। *(गौतम धर्म सूत्र)* 7. पूर्व की ओर सिर करके सोने से *विद्या*, पश्चिम की ओर सिर करके सोने से *प्रबल चिन्ता*, उत्तर की ओर सिर करके सोने से *हानि व मृत्यु* तथा दक्षिण की ओर सिर करके सोने से *धन व आयु* की प्राप्ति होती है। *(आचारमय़ूख)* 8. दिन में कभी नहीं सोना चाहिए। परन्तु *ज्येष्ठ मास* में दोपहर के समय 1 मुहूर्त (48 मिनट) के लिए सोया जा सकता है। (दिन ...

नवधा भक्ति निरूपण

*नवधा भक्ति*                       〰〰〰〰  प्राचीन शास्त्रों में भक्ति के 9 प्रकार बताए गए हैं जिसे नवधा भक्ति कहते हैं। श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्। अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥ श्रवण (परीक्षित), कीर्तन (शुकदेव), स्मरण (प्रह्लाद), पादसेवन (लक्ष्मी), अर्चन (पृथुराजा), वंदन (अक्रूर), दास्य (हनुमान), सख्य (अर्जुन) और आत्मनिवेदन (बलि राजा) - इन्हें नवधा भक्ति कहते हैं। *श्रवण*👉  ईश्वर की लीला, कथा, महत्व, शक्ति, स्रोत इत्यादि को परम श्रद्धा सहित अतृप्त मन से निरंतर सुनना। *कीर्तन*👉 ईश्वर के गुण, चरित्र, नाम, पराक्रम आदि का आनंद एवं उत्साह के साथ कीर्तन करना। *स्मरण*👉 निरंतर अनन्य भाव से परमेश्वर का स्मरण करना, उनके महात्म्य और शक्ति का स्मरण कर उस पर मुग्ध होना। *पाद सेवन*👉 ईश्वर के चरणों का आश्रय लेना और उन्हीं को अपना सर्वस्य समझना। *अर्चन*👉 मन, वचन और कर्म द्वारा पवित्र सामग्री से ईश्वर के चरणों का पूजन करना। *वंदन*👉 भगवान की मूर्ति को अथवा भगवान के अंश रूप में व्याप्त भक्तजन, आचार्य, ब्राह...

मासिक धर्म

मासिकधर्म के विषय मे विभिन्न पंथों के मत 〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰 सिख धर्म के पहले गुरु ने मासिक धर्म को लेकर सभी भ्रांतियों को नकारते हुए इसे एक नार्मल प्रोसेस मानने को कहा है. 'गुरु' बाक़ी लोगों को भी मासिक धर्म में इस्तेमाल हुए कपड़े को 'ख़राब' कहने के लिए डांटते हैं. सिख धर्म में कई जगह ये भी लिखा हुआ है कि, 'मां के रक़्त' से ही जीवन की शुरुआत होती है. और ये जीवन के लिए बेहद ज़रूरी है. जीवन की उत्पत्ति मां के लहू और पिता के वीर्य से होती है. बौद्ध धर्म में मासिक धर्म को एक प्राकृतिक प्रक्रिया के तौर पर देखा जाता है. अगर कोई बुद्धिस्ट नन मासिक धर्म से गुज़र रही है, तो उसे अपने कपड़ों को धो कर पहनने को कहा गया है. इससे वो कपड़े फिर से पवित्र और साफ़-सुथरे माने जाएंगे. पीरियड्स को यहूदी धर्म में 'निद्दाह' कहते हैं. मासिक धर्म के बारे में सबसे ज़्यादा और विस्तृत तौर पर यहूदी धर्म में कहा गया है. आपको पता है यहूदी औरत के सनसेट से पहले किसी को छूने से अपवित्रता होती है. ज्यूइश लॉ में आप स्त्री को तब तक नहीं छू सकते जब तक वो पवित्र नहीं होती. यहां तक की अगर आपको कोई चीज़ दे...

त्रिपुंड

*शिवलिंग पर बने त्रिपुण्ड्र की तीन आड़ी रेखाओं का रहस्य ......* *शैव परम्परा का तिलक है त्रिपुण्ड्र । यह कितना बड़ा होना चाहिए ? कैसे लगाना चाहिए ? त्रिपुण्ड्र की तीनों रेखाओं का क्या रहस्य है ?*   *प्राय: साधु-सन्तों और विभिन्न पंथों के अनुयायियों के माथे पर अलग-अलग तरह के तिलक दिखाई देते हैं । तिलक विभिन्न सम्प्रदाय, अखाड़ों और पंथों की पहचान होते हैं । हिन्दू धर्म में संतों के जितने मत, पंथ और सम्प्रदाय है उन सबके तिलक भी अलग-अलग हैं । अपने-अपने इष्ट के अनुसार लोग तरह-तरह के तिलक लगाते हैं ।* *शैव परम्परा का तिलक कहलाता है त्रिपुण्ड्र......* *भगवान शिव के मस्तक पर और शिवलिंग पर सफेद चंदन या भस्म से लगाई गई तीन आड़ी रेखाएं त्रिपुण्ड्र कहलाती हैं । ये भगवान शिव के श्रृंगार का हिस्सा हैं । शैव परम्परा में शैव संन्यासी ललाट पर चंदन या भस्म से तीन आड़ी रेखा त्रिपुण्ड्र बनाते हैं ।* *एक बार सनत्कुमारों ने भगवान कालाग्निरुद्र से पूछा......* *· त्रिपुण्ड्र कितना बड़ा होना चाहिए ?* *· कैसे लगाना चाहिए ?* *· त्रिपुण्ड्र की तीनों रेखाओं का क्या रहस्य है ?* *भगवान कालाग्निरुद्र बोले......* ...

आदिगुरु शंकराचार्य एक चांडाल से निरुत्तर हुए?

कुछ लोगों का कहना हैं - आदिगुरू शंकराचार्य एक चाण्डाल से निरुत्तर होकर उसे गुरु मानकर प्रणाम किया, इसके बाद वह जातिभेद या वर्णाश्रमाचार आदि नहीं मानते थे ।  --------------------------------------------------------------- वस्तुतः ऐसे विचार अत्यन्त भ्रामक हैं, निरुत्तर होनेका तो कोई प्रश्न ही नहीं ! चाण्डाल की बातों का सीधा सा उत्तर यह होगा कि यद्यपि आत्मा और पञ्चभूत दोनों ही व्यापक होनेके कारण आत्मा से आत्मा और भूत से भूत हटाये नहीं जा सकते ; तथापि जीवित ब्राह्मणादि-देहविशिष्ट आत्मा से जीवित शूकरादि-शरीर को व्यावहारिक पवित्रता के लिए दूर रखना संभव और उचित भी हैं । व्यवहार में जल और विष, भोजन और विष्ठा, गंगाजल और कर्मनाशा का जल, गोमूत्र-गर्दभमूत्र, अस्थि-नरकपाल, व्याघ्रचर्म-गर्दभचर्म इत्यादि में भेद मान्य ही हैं । इसी व्यवहारिक दृष्टि से नीति-भेद , वर्णभेद ज्ञानी को भी मान्य हैं । शंकराचार्य की परम मान्य उपनिषदों में ही रमणीय कर्मों से ब्राह्मणादि-योनि एवं निन्द्य आचरणों से श्व-सूकर चाण्डालादि योनियों की प्राप्ति कही गयी हैं - // तद्य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येर...

क्यों दी जाती है संतों को समाधि

हमारे यहां दो मत प्रचलित हैं शैव और वैष्णव शैवमत का सन्यास शिखा सूत्र और अग्नि का त्याग करके होता है जबकि वैष्णव मत में शिखा सूत्र और अग्नि का त्याग नहीं होता। सन्यास शैव मत में जब लिया जाता है तो अजीब अपनी और्ध्वदेहिक क्रिया संपूर्ण कर शिखा सूत्र और अग्नि स्पर्श का त्याग कर देता है इसलिए सामान्यतया शैव मत में मृत्यु उपरांत समाधि दी जाती है।

मनुस्मृति और शूद्र

*मनुस्मृति और शूद्र -* भारत में आज अनेक संकट छाये हुए हैं – भ्रष्टाचार, आतंकवाद, कट्टरवाद, धर्मांतरण, नैतिक अध : पतन, अशिक्षा, चरमरायी हुई स्वास्थ्य व्यवस्था, सफ़ाई की समस्या वगैरह – वगैरह | पर इन सभी से ज्यादा भयावह है – जन्मना जातिवाद और लिंग भेद | क्योंकि यह दो मूलभूत समस्याएँ ही बाकी समस्याओं को पनपने में मदद करती हैं | यह दो प्रश्न ही हमारे भूत और वर्तमान की समस्त आपदाओं का मुख्य कारण हैं |  इन को मूल से ही नष्ट नहीं किया तो हमारा उज्जवल भविष्य सिर्फ़ एक सपना बनकर रह जाएगा क्योंकि एक समृद्ध और समर्थ समाज का अस्तित्व जाति प्रथा और लिंग भेद के साथ नहीं हो सकता | यह भी गौर किया जाना चाहिए कि जाति भेद और लिंग भेद केवल हिन्दू समाज की ही समस्याएँ नहीं हैं किन्तु यह दोनों सांस्कृतिक समस्याएँ हैं | लिंग भेद सदियों से वैश्विक समस्या रही है और जाति भेद दक्षिण एशिया में पनपी हुई, सभी धर्मों और समाजों को छूती हुई समस्या है | चूँकि सनातन वेद सबसे प्राचीन संस्कृति और सभी धर्मों का आदिस्रोत है, इसी पर व्यवस्था को भ्रष्ट करने का आक्षेप मढ़ा जाता है | यदि इन दो कुप्रथाओं को हम ढोते रहते हैं तो...