आध्यात्मिक विचार

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        ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗
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👉🏻 प्रिय पाठकों------- 
“समान रंग के (एक से) पंखवालि कोयलों में हिलेमिले कौए को कौन पहचानता यदि वह स्वयं काँव-काँव न कर बैठता॥६६॥तुल्यवर्णच्छदै: कृष्ण: संगतै: किल कोकिलै:। केन विज्ञायते काक: स्वयं यदि न भाषते ॥६६॥”
<<<वि०श्वकाककोकिलान्योक्ति व०वासिष्ठ रा०नि०उ-११६।भाग ६ >>>
कहीं पर नदी के किनारे निर्माल्य, अक्षत आदि खाने के लिए शिवलिंग के ऊपर काँव-काँव कर रहे कौवे को देखकर कोई अनुचर उसके काँव-काँव करने के आशय की उत्प्रेक्षा करता है।
लिङ्ग्स्योर्ध्वं रटत्काक आत्मानं दर्शयत्ययम्। सर्वाध:पातकोत्तुङ्गगतं पश्यत मामिति॥६२॥
शिवलिंग के ऊपर काँव-काँव करता हुआ कौवा अपने को दृष्टान्तरुप से दर्शा रहा है, हे लोगों, अधोगति के हेतुभूत सब पातकों में से शिवस्वभक्षण के लिए शिवलिंग के आश्रयरुप सर्वोत्कृष्ट पातक को प्रप्त हुए प्रत्यक्ष काकरुप मुझे देखो॥६२॥
दूसरा अनुचर तालाब में काँव करते हुए घूम रहे कौए के प्रति कहता है।
काकक कटुकल्कारव कबलितगुणकर्दमे भ्रमन्सरसि।अन्तरयसि मधुपरवं यदतो मे शिरसि फलभूत:॥६३॥
अरे निन्द्य कौए, अरे अपनी कर्णकटु काँव-काँव से हंस, सारस आदि के सुगुणों को मटियामेट करनेवाले, तालाब में कीचड में घूमता हुआ तू सुन्दर भ्रमरों की गूँजार को अपनी कर्णकटू काँव-काँव से जो तिरोहित करता है, इससे मेरे सिरपर शल्यकी-सी वेदना पैदा होती है॥६३॥
कवलयति मृणालिकां ध्वाङ्क्ष। यदतोस्तु मा स्मयस्ते स्वभ्यस्तम् सर्वदा स्वदते॥६४॥
अपने मित्र के प्रति कोई कहता है। कौआ नाना प्रकार की अपवित्र वस्तुओं को खाता है, मृणाल् की डण्डी को, जो प्राप्त है, छोड देता है, इस विषय में आपको आश्चर्य नहीं करना चाहिए, क्योंकि व्यसन होने के कारण खूब आदत पडी रहती है, तो निन्दनीय वस्तु भी बडी स्वादिष्ट लगति है जैसे कि लहसुन मिश्रित खटाई निन्दित वस्तुएँ अभ्यस्त लोगों को अच्छी लगती हैं॥६४॥
विविधवनकुसुमकेसरधवलवपुर्हंस इव द्दष्ट:। काक: कृमिकुलकवलं क्लिन्नमथो कवलयन्ज्ञात:॥६५॥
विविध वनपुष्पों के केसर से धवल देहवाले कौए को लोगों ने हंस समझा। बाद में जब उसे सडे-पडे कीडे मकोडे निगलते देखा तब जाना कि यह कौआ है॥६५॥
तुल्यवर्णच्छदै: कृष्ण: संगतै: किल कोकिलै:। केन विज्ञायते काक: स्वयं यदि न भाषते ॥६६॥
समान रंग के (एक से) पंखवालि कोयलों में हिलेमिले कौए को कौन पहचानता यदि वह स्वयं काँव-काँव न कर बैठता॥६६॥
अरण्यान्या मृद: स्थाणौ स्थित: काको निरीक्षते। चैत्याद्दशदिशश्चोरो निशि सुप्ते जने यथा॥६७॥
महाअरण्य की मिट्टी की बनी पुरानी दीवार के ऊपर बैठा हुआ यह कौआ जैसे रात्रि के समय लोगों के सो जाने पर चोर श्मशान वृक्ष पर चढकर दसों दिसाओं के और झाँकता है वैसे ही चारों और देखता है॥६७॥
सरभससारसविदलत्पुष्करमकरन्दसुन्दरे सरसि। कथमिह विहरति काक: स्फुरदवकरनिकरधुसरस्कन्ध:॥६८॥
वेग से उड रहे या कलियो के आस-पास मँडरा रहे सारसों द्वारा चटचट खिल रहे कमलों के मकरन्द से (पुष्परस से) मनोहर इस तालाब में कौआ कैसे क्रीडा करता है, जिसके कन्धे कूडे करकट की उड रही धूलि से धुमैले हैं ? उसका यहाँ क्रीडा करना अनुचित है, यह भाव है॥६८॥
हा कष्टमिष्टवपुषि स्फुटपुण्डरीककोशे कपाहननयोग्यमुख: पिशाच:।
पश्यैष काक उपविश्य कुपल्वलेस्मिन लीला: करोति विविधा: सह राजहंसै:६९
हे राजन, खिले हुए कमलों के आकार स्वानुरुप स्थानरुप सरोवर में तैर रहे राजहंसो के साथ थप्पड खाने योग्य कुरुप मूँहवाला पिशाचतुल्य यह कौआ (जिस सुन्दर सरोवर में राजहंस विहार करते हैं उसमे विहार के अयोग्य यह काला-कलूटा कौआ) इस कीचडपूर्ण तलैया में घुसकर राजहंसों की नकल उतारने के लिए विविध लीलाएँ करता है, यह बडे खेद की बात है, कृपया देखिये॥६९॥
वंचना, चोरि आदि से मुझे प्राप्त होने वाले धनादि भाग को न्याययुक्त उपाय से कोई सज्जन न ले जाय्, इस आशंका से सन्त के खण्डन  के लिए रजसभा में आवांछनीय कर्णकटु प्रलाप कर रहे खल के प्रति अन्योक्ति द्वारा कोई कहता है।
हे कक कर्कशर्व क्रकचैकचिन्ह ताद्दक्स्वशङ्कनमपि क्व नु तेऽद्य यातम।
कस्मादनर्थकमिदम् पिकपाकमेकपुत्राशया तदपि ते ह्युपहाससिद्ध्यै॥७०॥
अरे कौए, अरे कठोररव सुननेवले के कानों के चीर डालनेवाले काँव-काँव शब्दरुपी आरा ही तुम्हारा एकमात्र लक्षण है । मेरे भाग को कौए से भिन्न कोई न खा जाय इस आशंका से तुम सदा कौओं का आह्वान करते हुए काँव-काँव की रट लगाते रहते हो, तुम्हारा आज ऐसी शंका करना कहाँ चला गया ? तुम्हीं मेरे एकमात्र बच्चे हो, तुम चिरकाल तक जीओ इस आशा से कोकिल के बच्चे को तुम व्यर्थ पालते हो। तुम एकमात्र कटु बोलनेवाले, पुत्रभ्रान्ति से तुम्हारा सुस्वरवाले  कोयल के बच्चों को पालना भी मनोरथसिद्धि के लिए नहीं होगा, अपितु उपहासस्पद ही होगा॥७०॥
आलोक्य पङ्कजवने सविलासवन्तं काकं कलङ्गसद्दशं भृशमारटन्तम।
हाकष्टशब्दशतनष्टविचेष्टितो यो नो रोदिति क्रकचकेन विदार्यताम् स:॥७१॥
कमलवन में विविध क्रीडाएँ कर रहे कलंकसदृश कौए को जोर जोर से काँव-काँव कटुशब्दों के श्रवण से दु:खवश भौचक्का होकर जो नहीं रोता उस आदमी को आरे के तुल्य कटुवचनों से तुम्हें चीर डालना चाहिये, मैं तो वैसा नहीं हुँ, अत: क्योंकर मेरे सामने काँव-काँव करते हो॥७१॥
इत्यार्षे श्रीवासिष्ठ०वा०मो०उ०अवि०विपश्चित०श्वकाकोकिलान्योक्तिवर्णनं ११६ सर्ग:
आगे खलों की सभा मे खल ही योग्य है । वहा पर एक भी साधु का रहना ठिक नहीं है, आदि अन्योक्ति का वर्णन होगी ! सादर बन्दन सभि मित्रों को! ॐ नमो नारायण !! कथा कि निरन्तरता आगे ७ भाग मे रहेगी !!
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