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कला भेद से भगवान् के अवतार ---

कला भेद से भगवान् के अवतार --- कला भेद से छः प्रकार के भगवान् के अवतार कहे गये हैं -- १ . पूर्णतमावतार ,  २ . पूर्णावतार ,  ३. विभूत्यावतार, ४. कलावतार ,  ५. अंशांशावतार, ६. आवेशावतार । १. पूर्णतमावतार ---   सूक्ष्म दृष्टि से विचार करने पर  जीव , ईश्वर तथा शुद्ध ब्रह्म सभी पूर्ण हैं , उतना ही नहीं ! बल्कि तिनके से लेकर ब्रह्मा पर्यन्त सभी पूर्ण हैं , जैसा कि वेद में कहा गया है --- "पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।  पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥ " अद: का अर्थ होता है ईश्वर (परोक्ष) पूर्ण है ।   इदं = प्रत्यक्ष जीव , यह भी पूर्ण है । पूर्ण ब्रह्म से पूर्णता को लेकर जो जगत् की रचना के अनन्तर शेष बचता है --- वह भी पूर्ण है । वह ब्रह्म ज्ञान-स्वरूप है , ज्ञान के सम्बन्ध में कहा है -- "ज्ञानमेकं सदा भाति सर्वावस्थासु निर्मलम् । मन्दभाग्या: न जानन्ति स्वरूपं केवलं वृहत् ।।" ज्ञान एक है , वह सदा सभी अवस्थाओं में निर्मलता से प्रकाशित होता है , किन्तु मन्दभाग्य वाले पुरुष  अर्थात्  मल-विक्षेप-आवरण से युक्त अंतःकरण वाले परमा...

ब्राह्मण हेतु भोजन ग्रहण

ये लोक सूक्ति है, लोकोक्ति। ब्राह्मण के लिये तो ऋत ,अमृत, मृत,। ये तीन ही धर्म से जीवकोपार्जन का उल्लेख है। ऋत, खतों मे पड़े अन्न से निर्वाह करना। या बाजार उठ जाने पर गिरा हुआ अन्न से जीवन यापन। जौ अब संभव नही, क्योंकि बाजार अब लगता नही, और कृषक स्वयं खेतों मे पड़ा अनाज उठा लेता है। अमृत, बिना मांगे मिल जाये उससे जीवनयापन करना। यह भी आज के समय मे संभव नही, क्योंकि बिना मांगे केवल सांई को देना जानते हैं, अज्ञानी हिन्दू। मृत धन, जो मागने पर मिले। भिक्षाटन। ये तीन ही ब्राह्मणों की वृत्ति कहा गया है। स्वानृत्य, कृषि द्वारा प्राप्त अन्न से जीवकोपार्जन। सत्यानृत, सत्य व्यापार से प्राप्त आमद पर निर्भर रहना। ये दो वृत्ति वैश्यों के लिये है। कर लेना क्षत्रवृत्ति है। सेवा सूद्र वृत्ति कहा गया है। विशेष परिस्थितियों मे ब्राह्मण वैश्य वृत्ति से जीवन यापन कर ले पर स्वान वृत्ति कभी न करे। स्वानवृत्ति, अपने से नीच की सेवा, ब्राह्मण कभी न करें। राधे राधे। विजय पाण्डेय।