ब्राह्मण हेतु भोजन ग्रहण

ये लोक सूक्ति है, लोकोक्ति।
ब्राह्मण के लिये तो ऋत ,अमृत, मृत,।
ये तीन ही धर्म से जीवकोपार्जन का उल्लेख है।

ऋत,
खतों मे पड़े अन्न से निर्वाह करना।
या बाजार उठ जाने पर गिरा हुआ अन्न से जीवन यापन।
जौ अब संभव नही, क्योंकि बाजार अब लगता नही, और कृषक स्वयं खेतों मे पड़ा अनाज उठा लेता है।

अमृत,
बिना मांगे मिल जाये उससे जीवनयापन करना।
यह भी आज के समय मे संभव नही, क्योंकि बिना मांगे केवल सांई को देना जानते हैं, अज्ञानी हिन्दू।

मृत धन,

जो मागने पर मिले।
भिक्षाटन।

ये तीन ही ब्राह्मणों की वृत्ति कहा गया है।

स्वानृत्य,
कृषि द्वारा प्राप्त अन्न से जीवकोपार्जन।

सत्यानृत,

सत्य व्यापार से प्राप्त आमद पर निर्भर रहना।

ये दो वृत्ति वैश्यों के लिये है।

कर लेना क्षत्रवृत्ति है।
सेवा सूद्र वृत्ति कहा गया है।

विशेष परिस्थितियों मे ब्राह्मण वैश्य वृत्ति से जीवन यापन कर ले पर स्वान वृत्ति कभी न करे।

स्वानवृत्ति,
अपने से नीच की सेवा, ब्राह्मण कभी न करें।
राधे राधे।
विजय पाण्डेय।

टिप्पणियाँ