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वैदिक यज्ञ क्या है

*प्रमुख वैदिक यज्ञोंका क्रम एवं उनका संक्षिप्त विवरण* सम्पूर्ण भारतीय संस्कृति ‘‘यज्ञ-दान और तप’’ इन तीन शब्दोंमें समाहित है[1]।  इनमें भी यज्ञ का विशिष्ट महत्त्व है। इसीलिए छान्दोग्योपनिषद् में धर्मके तीन आधरस्तम्भोंमें जो पहला आधरस्तम्भ है, उसमें भी यज्ञका स्थान सर्वप्रथम है[2]। वैदिक आर्ष सम्प्रदायमें यज्ञका जो मुख्य अर्थ है, उसका उल्लेख कात्यायन ने अपने श्रौतसूत्रमें किया है, यथा – देवताके उद्देश्यसे द्रव्यका त्याग ही यज्ञ है[3]।  देवतासे तात्पर्य अग्नि-इन्द्रादि देवता, द्रव्यसे तात्पर्य दही, चावल, जौं तथा सोम इत्यादि तथा त्यागसे तात्पर्य है – उन देवताओंके उद्देश्यसे किया जाने वाला ऐसा व्यापार जिसमें अपने स्वत्वकी निवृत्ति हो[4]। इन यज्ञोंके मुख्यतया दो विभाग हैं – 1. श्रौत तथा 2. स्मार्त्त। श्रुतिप्रतिपादित यज्ञोंको श्रौतयज्ञ तथा स्मृतिप्रतिपादित यज्ञोंको स्मार्त्त यज्ञ कहते हैं। श्रौतयज्ञोंमें केवल श्रुतिप्रतिपादित मन्त्रोंका प्रयोग होता है तथा स्मार्त्त यज्ञोंमें वैदिक, पौराणिक तथा तान्त्रिक मन्त्रोंका प्रयोग होता है। स्मृतियोंमें तथा गृह्यसूत्रोंमें औपासनहोम, वैश्वदेव,...