अनुस्वार एवम अनुनासिका
अनुस्वार - मुख्यता यह "न्" व "म्" से बनता है और इसे बिन्दु (ं) से प्रदर्शित करते हैँ। यह अनुस्वार सन्धि (संस्कृत) से भली प्रकार समझाया जा सकता है। अनुस्वार सन्धि दो प्रकार की होती है। 1 पदान्त अनुस्वार सन्धि - (८-३-२३)- पदान्त "म्" को अनुस्वार होता है "हल्" (कोई भी व्यञ्जन वर्ण/अक्षर) परे होने पर। उदाहरण - वयम् रक्षामः = वयं रक्षामः, ग्रामम् गच्छति = ग्रामं गच्छति 2 अपदान्त अनुस्वार सन्धि -(८-३-२४) - अपदान्त "न्" व "म्" को अनुस्वार होता है "झल्" (क, च, ट, त या प वर्गोँ के प्रथम, द्वितीय, तृतीय व चतुर्थ वर्ण) परे होने पर। उदाहरण - आक्रम् + स्यते = आक्रंस्यते, मन् + स्यते = मंस्यते किसी शब्द में अनुस्वार वर्ण के परे जो वर्ण है उसी वर्ण के वर्ग का पञ्चम वर्ण(अक्षर) में अनुस्वार परिवर्तित हो जाता है यदि अनुस्वार के परे (बाद मेँ) वर्ण(अक्षर) क, च, ट, त या प वर्ग का है। उदाहरण - तिर्यक लिखित शब्द अनुस्वार के परे हैँ। क वर्ग - अंक = अङ्क, शंख = शङ्ख, गंगा - गङ्गा, लंघन = लङ्घन। च वर्ग - मंच = मञ्च, लांछन = लाञ्छन, खंज = खञ्...