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संध्या तत्व विमर्श

*संध्या तत्त्व विमर्श* भाग-१ *ॐकारप्रौढमूलः क्रमपदसहितश्छन्दविस्तीर्णशाख* *ऋक्पत्रः सामपुष्पो यजुरधिकफलोऽथर्वगन्धं दधानः।* *यज्ञच्छायासमेतो द्विजमधुपगणैः सेव्यमानः प्रभाते* *मध्ये सायं त्रिकालं सुचरितचरितः पातु वो वेदवृक्षः॥* परमात्माको प्राप्त किये अथवा जाने बिना जीवनकी भवबन्धनसे मुक्ति नहीं हो सकती। यह सभी ऋषि-महर्षियोंका निश्चित मत है। उनके ज्ञानका सबसे सहज, उत्तम और प्रारम्भिक साधन है- *संध्योपासना*। संध्योपासना द्विजमात्रके लिये परम आवश्यक कर्म है। इसकी अवहेलनासे पाप होता है और पालनसे अन्तःकरण शुद्ध होकर परमात्मसाक्षात्कारका अधिकारी बन जाता है।  तन-मनसे संध्योपासनाका आश्रय लेनेवाले द्विजको स्वल्पकालमें ही परमेश्वरकी प्राप्ति हो जाती है। अतः द्विजातिमात्रको संध्योपासनामें कभी प्रमाद नहीं करना चाहिये। *संध्योपासनाका अर्थ* संध्योपासनामें दो शब्द हैं—संध्या और उपासना। संध्याका प्रायः तीन अर्थों में व्यवहार होता है-१-संध्याकाल, २- संध्याकर्म और ३-सूर्यस्वरूप ब्रह्म (परमात्मा)। तीनों ही अर्थोके समर्थक शास्त्रीय वचन उपलब्ध होते हैं- *अहोरात्रस्य यः संधिः सूर्यनक्षत्रवर्जितः।* *सा तु ...