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अथ शारदोक्तमहामृत्युञ्जयजपविधिः

*।। अथ शारदोक्तमहामृत्युञ्जयजपविधिः।।*   *विनियोगः*  ॐ अस्य श्रीमहामृत्युञ्जयमन्त्रस्य वसिष्टऋषिः अनुष्टुप्छन्दः श्रीत्र्यम्बकरुद्रो देवता श्रीं बीजं ह्रीं शक्तिः मम यजमानस्य वा शरीरे सर्वारिष्ट निवृत्तिपूर्वकसकलमनोरथसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ।   *अथ ऋष्यादिन्यासः*  ॐ वसिष्ठऋषये नमः शिरसि । अनुष्टुप्छन्दसे नमः मुखे । श्रीत्र्यम्बकरुद्र देवतायै नमः हृदये । श्रीं बीजाय नमः गुह्ये । ह्रीं शक्तये नमः पादयोः ।।  *अथ करन्यासः-*  ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः त्र्यम्बकं ॐ नमो भगवते रुद्राय शूलपाणये स्वाहा अङ्गुष्ठाभ्यां नमः ।  ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः यजामहे ॐ नमो भगवते रुद्राय अमृतमूर्तये मां जीवय जीवय तर्जनीभ्यां स्वाहा ।  ॐ हीं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः सुगन्धिम्पुष्टिवर्धनम् ॐ नमो भगवते रुद्राय चन्द्रशिरसे जटिने स्वाहा मध्यमाभ्यां वषट् ।  ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्व: उर्वारुकमिव बन्धनात् ॐ नमो भगवते रुद्राय त्रिपुरान्तकाय हां ह्रीं अनामिकाभ्यां हुम्।  ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः मृत्योर्मुक्षीय ॐ नमो.भगवते रुद्राय त्रिलोचनाय ऋग्यज...

पंचाक्षर मन्त्र के ऋषि, छन्द, देवता और ध्यान :-

पंचाक्षर मन्त्र के ऋषि, छन्द, देवता और ध्यान :- पंचाक्षर मन्त्र के ऋषि वामदेव, छन्द पंक्ति व देवता शिव हैं। आसन लगाकर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके इस मन्त्र का जप करना चाहिए। रुद्राक्ष की माला से जप का अनन्तगुणा फल मिलता है। स्त्री, शूद्र आदि सभी इस मन्त्र का जप कर सकते हैं। इस मन्त्र के लिए दीक्षा, होम, संस्कार, तर्पण और गुरुमुख से उपदेश की आवश्यकता नहीं है। यह मन्त्र सदा पवित्र है | लिंगपुराण में कहा गया हैं ‘जो बिना भोजन किए एकाग्रचित्त होकर आजीवन इस मन्त्र का नित्य एक हजार आठ बार जप करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है’। इस मन्त्र के लिए लग्न, तिथि, नक्षत्र, वार और योग का विचार नहीं किया जाता। यह मन्त्र कभी सुप्त नहीं होता, सदा जाग्रत ही रहता है। अत: पंचाक्षर मन्त्र ऐसा है जिसका अनुष्ठान सब लोग सब अवस्थाओं में कर सकते हैं। श्री शिव पंचाक्षर स्तोत्र के पाँचों श्लोकों में क्रमशः न, म, शि, वा और य, मुख्यतः पांच शब्दों का वर्णन हैं। न, म, शि, वा एवं य अर्थात् "नम: शिवाय"। अतः यह पंचाक्षर स्तोत्र शिवस्वरूप है। जो कोई शिव के समीप इस पवित्र पंचाक्षर मंत्र का नित्य ध्यान अथवा ...

भगवान शिव के पंच मुख की स्तुति

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पञ्चब्रह्म मन्त्र पञ्चमुखी शिव के पाँच रूप (मुख) ही पञ्चब्रह्म (ईशान, तत्पुरुष, अघोर, वामदेव, सद्योजात) हैं तथा यहाँ उपस्थित पाँच मंत्र भगवान विष्णु ने ज्योतिर्मय महलिङ्ग से प्राप्त करके जप करना आरम्भ किया था। ये मंत्र शिव पूजा के लिए अत्यंत प्रभावशाली हैं।  १. ॐकार से उत्पन्न, पांच कलाओं से युक्त, बुद्धि विवर्धक तथा सभी धर्म-अर्थ को सिद्ध करने वाला शुद्ध स्फटिक तुल्य अत्यंत शुभ्र तथा अड़तीस शुभ अक्षरों वाला पवित्र मंत्र  “ईशान सर्वविद्यानामीश्वरः सर्वभूतानां ब्रह्मादिपति ब्रह्मणोऽधिपतिर्। ब्रह्मा शिवो मे अस्तु सदाशिवोम्॥” २. गायत्री से उत्पन्न, चार कलाओं वाला, चौबीस अक्षरों से युक्त तथा वश्यकारक हरित वर्ण अत्युत्तम मंत्र  “तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥” ३. अथर्ववेद से उत्पन्न, आठ कलाओं से युक्त, तैंतीस शुभ अक्षर वाला कृष्णवर्ण तथा अत्यंत अभिचारिक अघोर मंत्र  “अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो अघोरघोरेतरेभ्यः। सर्वेभ्यो सर्व सर्वेभ्यो नमस्ते अस्तु रुद्र रूपेभ्यः॥” ४. यजुर्वेद से प्रादुर्भूत, आठ कलाओं वाला, श्वेतवर्ण वाला, शान्तिकारक पैंतीस...

अष्टमूर्ति स्तोत्रं

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------  ॥ अष्टमूर्तिस्तोत्रम् ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ ईशा वास्यमिदं सर्वं चक्षोः सूर्यो अजायत । इति श्रुतिरुवाचातो महादेवः परावरः ॥ १॥ अष्टमूर्तेरसौ सूर्यौ मूर्तित्वं परिकल्पितः । नेत्रत्रिलोचनस्यैकमसौ सूर्यस्तदाश्रितः ॥ २॥ यस्य भासा सर्वमिदं विभातीदि श्रुतेरिमे । तमेव भान्तमीशानमनुभान्ति खगादयः ॥ ३॥ ईशानः सर्वविद्यानां भूतानां चेति च श्रुतेः । वेदादीनामप्यधीशः स ब्रह्मा कैर्न पूज्यते ॥ ४॥ यस्य संहारकाले तु न किञ्चिदवशिष्यते । सृष्टिकाले पुनः सर्वं स एकः सृजति प्रभुः ॥ ५॥ सूर्याचद्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् । इति श्रुतेर्महादेवः श्रेष्ठोऽर्यः सकलाश्रितः ॥ ६॥ विश्वं भूतं भवद्भयं सर्वं रुद्रात्मकं श्रुतम् । मृत्युञ्जयस्तारकोऽतः स यज्ञस्य प्रसाधनः ॥ ७॥ विषमाक्षोऽपि समदृक् सशिवोऽपि शिवः स च । वृषसंस्थोऽध्यतिवृषो गुणात्माऽप्यगुगुणोऽमलः ॥ ८॥ यदाज्ञामुद्वहन्त्यत्र शिरसा सासुराः सुराः । अभ्रं वातो वर्षं इतीषवो यस्य स विश्वपाः ॥ ९॥ भिषक्रमं त्वा भिषजां शृणोमीति श्रुतेरवम् । स्वभक्तसंसारमह...

शिव प्रदीक्षणा विधि

शिवालये प्रदक्षिण विधिः || व्रुषं चण्डं व्रुषंचैव सोमसूत्रं पुनर्व्रुषं | चण्डंच सोम सूत्रं च पुनश्चण्डं पुनर्व्रुषम् || शैवागम || नाक्षतैरर्चयेद्विष्णुं न तुलस्या गणाधिपं | न दूर्वाया यजॅद्दुर्गां बिल्वैर्नैव च भास्करम् || न केतक्या महेशानं कुटजेनापि नार्चयेत् | अपामार्गशमीदूर्वाः शिंशपा तुलसी तथा || भ्रंगराजं चामलकं खादिरं च हरिप्रियं | तुलसी पत्रविच्छेदः शालिग्रामे न चेष्यते | उन्मत्तमर्कपुष्पं च विष्णोर्वज्यं सदा बुधैः || धर्मं यो बाधते धर्मोनस धर्मः कदाचन | अविरोधीतु योधर्मः सधर्मः सद्बिरुच्यते || Real vaishnava's उपक्रुति कुशला जगत्यजस्रं परकुशलानि निजानि मन्यमानाः |  अपिपर परिभावने दयार्द्राः शिव मनसः खलु वैष्णवा ||

महालिंग स्तुति

॥ श्रीमहालिङ्गस्तुतिः ॥  अनादिमलसंसार रोगवैद्याय शम्भवे । नमश्शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिङ्गमूर्तये ॥ १॥ आदिमध्यान्तहीनाय स्वभावानलदीप्तये । नमश्शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिङ्गमूर्तये ॥ २॥ प्रलयार्णवसंस्थाय प्रलयोत्पत्तिहेतवे । नमश्शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिङ्गमूर्तये ॥ ३॥ ज्वालामालावृताङ्गाय ज्वलनस्तम्भरूपिणे । नमश्शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिङ्गमूर्तये ॥ ४॥ महादेवाय महते ज्योतिषेऽनन्ततेजसे । नमश्शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिङ्गमूर्तये ॥ ५॥ प्रधानपुरुषेशाय व्योमरूपाय वेधसे । नमश्शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिङ्गमूर्तये ॥ ६॥ निर्विकाराय नित्याय सत्यायामलतेजसे । नमश्शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिङ्गमूर्तये ॥ ७॥ वेदान्तसाररूपाय कालरूपाय धीमते । नमश्शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिङ्गमूर्तये ॥ ८॥ इति श्रीकूर्मपुराणान्तर्गतं श्रीमहालिङ्गस्तुतिः समाप्ता ।              

शिव मंत्रो का जप एवम पुरश्चरण

*शिवमन्त्रों का जप एवं पुरश्चरण* मन्त्रजप से पूर्व जो - जो शास्त्रीय क्रियाएं की जाती हैं ये बहुत लम्बी, समय लेनेपाली, कष्टसाध्य एवं दुरुह है। जनसामान्य  तो क्या मूर्द्धन्य  आचार्यों द्वारा भी ये सभी कियाएं संपादित करना अगर असम्भव नहीं तो अवश्य कठिनता मे पूरी होनेवाली हैं। सभी प्रकार के मन्त्रानुष्ठान के क्रमिक सोपान निम्नलिन्वित है। यहाँ पर इन अंगों की केवल रूपरेखा ही दी जायगी। विस्तृत वर्णन के लिये अनुष्ठानप्रकाश:' आदि ग्रन्थ देवे जा सकते हैं। *मन्त्रजप के सोपान* 1- अगर व्यक्ति म्गय मन्त्रानुष्ठान के योग्य नहीं है अथवा असमर्थ है तो सबसे पहले उसे आचार्य को वरण करना होगा। सभी शास्त्रीय विधियों को सम्पन्न करके ही आचार्य का वरण किया जाता है। 2- स्नानादि नित्यकर्म से निवृत हो पूजा - स्थान पर जाकर पैर धोकर आचमन के अनन्तर द्वार की पूजा शास्त्रीय विधि से करें। 3- तदनन्तर देवताविशेष से संबंधित द्वारपालों की विधिपूर्वक पूजा करें। उदाहरण के लिये शिवमन्त्रों के अनुष्ठान के समय नन्दी, महाकाल, गणेश, भृगी, स्कद, चण्डेश्वर आदि की -द्वारपालो के बाद इन्नादि सभी दिग्पालो की शास्त्रीय रीति से प...

शिव और गंग का आध्यामिक चिंतन

जिज्ञासा  शिव और गंगा का आध्यात्मिक चिंतन शिव संस्कृत भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है, कल्याणकारी या शुभकारी। यजुर्वेद में शिव को शांतिदाता बताया गया है। 'शि' का अर्थ है, पापों का नाश करने वाला, जबकि 'व' का अर्थ देने वाला यानी दाता। गंगा में गं शब्द का अर्थ है जाना, गा शब्द का अर्थ है राग। गंगा का शाब्दिक अर्थ है संगीत के ध्वनि के साथ बहती जाना। तो शिव के गुण कल्याण करना है और कल्याण जहाँ पाप यानी अशुद्धता का विनाश हो जाता जी गंगा का स्वभाव है । और जो  शुद्ध हो जाये उसे शिव मिल जाते है इसलिए शिव गंगा एक साथ है  कहते हैं कि ब्रह्मचारिणी गंगा के द्वारा किए स्पर्श से ही महादेव ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया। पत्नी पुरुष की सेवा करती है अतः उसका वास पति के हृदय में अथवा चरणों मे होता है किंतु भगवती गंगा शिव के मस्तक पर विराजति है। भगवान विष्णु के अंगूठे से गंगा प्रकट हुई अतः उसे विष्णुपदी कहां जाता है। भगवान विष्णु के प्रसाद रूप में शिव ने देवी गंगा का पत्नी के रूप में स्वीकार किया और अपने जटाओं में वाश दिए क्योंकि गंगा विष्णुपदी है और विष्णु शिव के आराध्य तो आ...

गवय श्रृंगी

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●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------  गवय श्रृंग श्रृंगी या गवय या जलधारी आदि नाम से विख्यात भगवान का अभिषेक करने में प्रयुक्त होने वाला एक यन्त्र है । जिससे भगवान शिव का अभिषेक करते समय विग्रह पर जल सतत गिरता रहता है और जल धारा न टूटने में सहायक सिद्ध होती है । जो प्राचीन काल मे गाय के सिंघ के खोल से बनाया जाता था ।जो स्वयम ही सींग से पृथक हो जाते थे उन श्रृंग का संचय कर के , नाम गवय श्रृंग था । परन्तु वर्तमान में सिंग सुलभता से प्राप्त न होने के कारण कई अन्य धातुओं से निर्माण किया जाने लगा जैसे की स्वर्ण,रजत,पीतल,ताम्र आदि । भगवान शिव को अभिषेक प्रिय है इसीलिए पुराणों में कहा गया है कि - गणेशं ताम्रपात्रेंण स्वर्णपात्रेंण जगदम्बिका। शिवम गवय श्रीगेंण विष्णुम शङ्खवारीना । रुद्राष्टाध्यायी के अनुसार शिव ही रूद्र हैं और रुद्र ही शिव है। रुतम्-दु:खम्,और शिव को अभिषेक करने से उद्रावयति-नाशयतीतिरुद्र: अर्थात रूद्र रूप में प्रतिष्ठित शिव हमारे सभी दु:खों को शीघ्र ही समाप्त कर देते हैं। वस्तुतः जो ...

लिंग पूजन का विधान एवं महत्व

*लिंग पूजन का विधान एवं महत्व* लिंगोपासना की महिमा का वर्णन शास्त्रों में मिलता है। लिंग शब्द का साधारण अर्थ चिह्न अथवा लक्षण है। देव-चिह्न के अर्थ में लिंग शब्द शिवजी के ही लिंग के लिए आता है। पुराण में लयनालिंगमुच्यते कहा गया है अर्थात लय या प्रलय से लिंग कहते हैं। प्रलय की अग्नि में सब कुछ भस्म होकर शिवलिंग में समा जाता है। वेद-शास्त्रादि भी लिंग में लीन हो जाते हैं। फिर सृष्टि के आदि में सब कुछ लिंग से ही प्रकट होता है। शिव मंदिरों में पाषाण निर्मित शिवलिंगों की अपेक्षा बाणलिंगों की विशेषता ही अधिक है। अधिकांश उपासक मृण्मय शिवलिंग अर्थात बाणलिंग की उपासना करते हैं। गरुड़ पुराण तथा अन्य शास्त्रों में अनेक प्रकार के शिवलिंगों के निर्माण का विधान है। उसका संक्षिप्त वर्णन भी पाठकों के ज्ञानार्थ यहां प्रस्तुत है। दो भाग कस्तूरी, चार भाग चंदन तथा तीन भाग कुंकुम से ‘गंधलिंग’ बनाया जाता है। इसकी यथाविधि पूजा करने से शिव सायुज्य का लाभ मिलता है। ‘रजोमय लिंग’ के पूजन से सरस्वती की कृपा मिलती है। व्यक्ति शिव सायुज्य पाता है। जौ, गेहूं, चावल के आटे से बने लिंग को ‘यव गोधूमशालिज लिंग’ कहते हैं। ...

श्रीशिवस्तुतिः वन्दे शिवं

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श्रीशिवसुन्दरध्यानाष्टकम्

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शिव को तुलसी समर्पित करना चाहिए या नही

*शिवजी पर तुलसी चढाने का फल* *तुलसीमंजरीभिर्यः कुर्याद्धरिहराऽर्चनम् ।।*  *न स गर्भगृहं याति मुक्तिभागी न संशयः ।। १३ ।।* (स्कंदे महापुराणे द्वितीये वैष्णवखण्डे  त्रयोविंशोऽध्यायः) पद्मपुराण खण्डः ६ (उत्तरखण्डःअध्यायः १०५ -१३,) लिंगमभ्यर्चितं दृष्ट्वा, प्रतिमां केशवस्य च। तुलसीपत्रनिकरैर्मुच्यते ब्रह्महत्यया।। (ब्रह्मपुराण,नित्यकर्म पूजा प्रकाश, पृष्ठ 368) लिंगमभ्यर्चितं दृष्ट्वा सहोमासे च मामकम्। तुलसीपत्रनिकरैर्मुच्यते ब्रह्महत्यया !।  (स्कन्दपुराण खण्डः २, वैष्णवखण्ड श्लोक ७) *_देवी तत्व पर तुलसी अर्पण विचार_*  विना तुलस्या स्नानाङ्ग श्राद्ध यज्ञार्चनं प्रिये। न संपूर्ण फलं प्राहु: सर्व एव विपश्चित:!! सुंदरीभैरवीकाली ब्रह्माविष्णुविवस्वताम्। विना तुलस्या या पूजा सा पूजा निष्फला भवेत् । सावित्री च भवानी च, दुर्गा देवीं सरस्वतीम्। योऽर्चयेत्तुलसीपत्रै: सर्वकामै: स मेधते।।  (वृहत्तन्त्रसार)

शिव के पैतीस रहस्य

भगवान शिव के पेंतीस रहस्य !     भगवान शिव अर्थात पार्वती के पति शंकर जिन्हें महादेव, भोलेनाथ, आदिनाथ आदि कहा जाता है, उनके बारे में यहां प्रस्तुत हैं 35 रहस्य।   1. आदिनाथ शिव : - सर्वप्रथम शिव ने ही धरती पर जीवन के प्रचार-प्रसार का प्रयास किया इसलिए उन्हें 'आदिदेव' भी कहा जाता है। 'आदि' का अर्थ प्रारंभ। आदिनाथ होने के कारण उनका एक नाम 'आदिश' भी है।   2. शिव के अस्त्र-शस्त्र : - शिव का धनुष पिनाक, चक्र भवरेंदु और सुदर्शन, अस्त्र पाशुपतास्त्र और शस्त्र त्रिशूल है। उक्त सभी का उन्होंने ही निर्माण किया था।   3. शिव का नाग : - शिव के गले में जो नाग लिपटा रहता है उसका नाम वासुकि है। वासुकि के बड़े भाई का नाम शेषनाग है।   4. शिव की अर्द्धांगिनी : - शिव की पहली पत्नी सती ने ही अगले जन्म में पार्वती के रूप में जन्म लिया और वही उमा, उर्मि, काली कही गई हैं।   5. शिव के पुत्र : - शिव के प्रमुख 6 पुत्र हैं- गणेश, कार्तिकेय, सुकेश, जलंधर, अयप्पा और भूमा। सभी के जन्म की कथा रोचक है।   6. शिव के शिष्य : - शिव के 7 शिष्य हैं जिन्हें प्रारंभिक सप्तऋषि माना गया है।...

रुद्राक्ष

रुद्राक्ष के महत्व, लाभ और धारण विधि 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔹🔸🔸🔹🔹🔹 एक मुखी रुद्राक्ष 〰️〰️〰️〰️〰️ इसके मुख्य ग्रह सूर्य होते हैं। इसे धारण करने से हृदय रोग, नेत्र रोग, सिर दर्द का कष्ट दूर होता है। चेतना का द्वार खुलता है, मन विकार रहित होता है और भय मुक्त रहता है। लक्ष्मी की कृपा होती है।* दो मुखी रुद्राक्ष 〰️〰️〰️〰️ मुख्य ग्रह चन्द्र हैं यह शिव और शक्ति का प्रतीक है मनुष्य इसे धारण कर फेफड़े, गुर्दे, वायु और आंख के रोग को बचाता है। यह माता-पिता के लिए भी शुभ होता है। तीन मुखी रुद्राक्ष 🔸🔸🔹🔸🔸 मुख्य ग्रह मंगल, भगवान शिव त्रिनेत्र हैं। भगवती महाकाली भी त्रिनेत्रा है। यह तीन मुखी रुद्राक्ष धारण करना साक्षात भगवान शिव और शक्ति को धारण करना है। यह अग्रि स्वरूप है इसका धारण करना रक्तविकार, रक्तचाप, कमजोरी, मासिक धर्म, अल्सर में लाभप्रद है। आज्ञा चक्र जागरण (थर्ड आई) में इसका विशेष महत्व है। चार मुखी रुद्राक्ष 🔸🔸🔹🔸🔸 चार मुखी रुद्राक्ष के मुख्य देवता ब्रह्मा हैं और यह बुधग्रह का प्रतिनिधित्व करता है इसे वैज्ञानिक, शोधकर्त्ता और चिकित्सक यदि पहनें तो उन्हें विशेष प्रगति का फल देता है। यह मान...

उमामहेश्वर स्तोत्रम

*।।श्री उमा महेश्वर स्तोत्रं।।* ······••●◆❁✿❁◆●••······  नमः शिवाभ्यां नवयौवनाभ्यां परस्पराश्लिष्टवपुर्धराभ्याम् । नगॆन्द्रकन्यावृषकॆतनाभ्यां नमॊ नमः शङ्करपार्वतीभ्याम् ॥०१॥ नमः शिवाभ्यां सरसॊत्सवाभ्यां नमस्कृताभीष्टवरप्रदाभ्याम् । नारायणॆनार्चितपादुकाभ्यां नमॊ नमः शङ्करपार्वतीभ्याम् ॥०२॥ नमः शिवाभ्यां वृषवाहनाभ्यां विरिञ्चिविष्ण्विन्द्रसुपूजिताभ्याम् । विभूतिपाटीरविलॆपनाभ्यां नमॊ नमः शङ्करपार्वतीभ्याम् ॥०३॥ नमः शिवाभ्यां जगदीश्वराभ्यां जगत्पतिभ्यां जयविग्रहाभ्याम् । जम्भारिमुख्यैरभिवन्दिताभ्यां नमॊ नमः शङ्करपार्वतीभ्याम् ॥०४॥ नमः शिवाभ्यां परमौषधाभ्यां पञ्चाक्षरीपञ्जररञ्जिताभ्याम् । प्रपञ्चसृष्टिस्थितिसंहृताभ्यां नमॊ नमः शङ्करपार्वतीभ्याम् ॥०५॥ नमः शिवाभ्यामतिसुन्दराभ्यां अत्यन्तमासक्तहृदम्बुजाभ्याम् । अशॆषलॊकैकहितङ्कराभ्यां नमॊ नमः शङ्करपार्वतीभ्याम् ॥०६॥ नमः शिवाभ्यां कलिनाशनाभ्यां कङ्कालकल्याणवपुर्धराभ्याम् । कैलासशैलस्थितदॆवताभ्यां नमॊ नमः शङ्करपार्वतीभ्याम् ॥०७॥ नमः शिवाभ्यामशुभापहाभ्यां अशॆषलॊकैकविशॆषिताभ्याम् । अकुण्ठिताभ्यां स्मृतिसम्भृताभ्यां नमॊ नमः शङ्करपार्वतीभ्याम् ॥०...

ओम निरंजन

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------  ऊँ निरंजन निराकार मनुष्य मेँ दो प्रकार के व्यक्तित्व हैँ-अंतरमुखी और बहिर्मुखी । बहिर्मुखी के लिए कर्म व भक्ति मार्ग अनुकूल पडता है तथा अंतरमुखी के लिए ध्यान । यदि यह ग्यान कर लिया कि मैँ शरीर, मन आदि नहीँ हूँ , बल्कि शुद्ध चैतन्य आत्मा हूँ तो सारी भ्राँतियां मिट जाती हैँ व यही मोक्ष है । मोक्ष कोई स्थान नहीँ बल्कि चित्त की एक अवस्था है जिसमेँ स्थित हुआ जीव परमानन्द की अनुभूति करता है । अपने कर्म को सच्चाई ईमानदारी पूर्ण निष्ठा व लगन के साथ करने वाला भी स्वर्ग का अधिकारी होता है । फिर यदि निष्काम भाव से, लोकहितार्थ, ईश्वर की आग्या समझ कर जो समर्पण भाव से कर्म करता है उसके वे कर्म बंधन का कारण नहीँ बनते । अहंकार वश अपने स्वार्थ के लिए जो कर्म किये जाते हैँ वे ही बंधन का कारण बनते हैँ ।यह आध्यात्म एक ऐसी धरोहर है जिसके बारे मेँ कुछ कहना सूर्य को दीपक दिखाना है ।  यह समझने के लिए नहीँ पीने व पचाने के लिए है                 ...

नीलकंठ साधना

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------  कौई भी साधना गुरु सानिध्य मैं करै. नीलकंठ अघोर मंत्र स्तोत्र संकल्प:(विनियोग ): ओम अस्य श्री नीलकंठ स्तोत्र-मन्त्रस्य ब्रह्म ऋषि अनुष्टुप छंद :नीलकंठो सदाशिवो देवता ब्रह्म्बीजम पार्वती शक्ति:शिव इति कीलकं मम काय जीव स्वरक्षनार्थे सर्वारिस्ट विनाशार्थेचतुर्विद्या पुरुषार्थ सिद्धिअर्थे भक्ति-मुक्ति सिद्धिअर्थे श्री परमेश्वर प्रीत्यर्थे च जपे पाठे विनियोग: मंत्र प्रयोग ओम नमो नीलकंठाय श्वेत शरीराय नमःसर्पलिंकृत भुषनाय नमः भुजंग परिकराय नाग यग्नोपविताय नमः,अनेक काल मृत्यु विनाशनाय नमः,युगयुगान्त काल प्रलय प्रचंडाय नमः ज्वलंमुखाय नमः दंष्ट्रा कराल घोर रुपाय नमः हुं हुं फट स्वाहा,ज्वालामुख मंत्र करालाय नमः,प्रचंडार्क सह्स्त्रान्शु प्रचंडाय नमः कर्पुरामोद परिमलांग सुगंधीताय नमः इन्द्रनील महानील वज्र वैदूर्यमणि माणिक्य मुकुट भूषणाय नमः श्री अघोरास्त्र मूल मन्त्रस्य नमः ओम ह्रां स्फुर स्फुर ओम ह्रीं स्फुर स्फुर ओम ह्रूं स्फुर स्फुर अघोर घोरतरस्य नमः रथ रथ तत्र तत्र चट चट कह क...

श्रीगुरु स्त्रोतम

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------     श्री गुरु स्तोत्रम् ~ श्री महादेव्युवाच || गुरुर्मन्त्रस्य देवस्य धर्मस्य तस्य एव वा | विशेषस्तु महादेव ! तद् वदस्व दयानिधे || श्री गुरु स्तोत्रम् श्री महादेवी (पार्वती) ने कहा : हे दयानिधि शंभु ! गुरुमंत्र के देवता अर्थात् श्री गुरुदेव एवं उनका आचारादि धर्म क्या है – इस बारे में वर्णन करें | श्री महादेव उवाच || जीवात्मनं परमात्मनं दानं ध्यानं योगो ज्ञानम् | उत्कल काशीगंगामरणं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ||१|| श्री महादेव बोले : जीवात्मा-परमात्मा का ज्ञान, दान, ध्यान, योग पुरी, काशी या गंगा तट पर मृत्यु – इन सबमें से कुछ भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ||१|| प्राणं देहं गेहं राज्यं स्वर्गं भोगं योगं मुक्तिम् | भार्यामिष्टं पुत्रं मित्रं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ||२|| प्राण, शरीर, गृह, राज्य, स्वर्ग, भोग, योग, मुक्ति, पत्नी, इष्ट, पुत्र, मित्र – इन सबमें से कुछ भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ||२|| वा...

पशुपशास्त्र साधना

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------  पाशुपतास्त्र मंत्र साधना एवं सिद्धि . शिव का एक भीषण शूलास्त्र जिसे अर्जुन ने तपस्या करके प्राप्त किया था। महाभारतका युद्ध हुआ, उसमें भगवान्‌ शंकरका दिया हुआ पाशुपतास्त्र अर्जुनके पास था, भगवान्‌ शंकरने कह दिया कि तुम्हें चलाना नहीं पड़ेगा । यह तुम्हारे पास पड़ा-पड़ा विजय कर देगा, चलानेकी जरूरत नहीं, चला दोगे तो संसारमें प्रलय हो जायगा । इसलिये चलाना नहीं । इस पाशुपत स्तोत्र का मात्र एक बार जप करने पर ही मनुष्य समस्त विघ्नों का नाश कर सकता है । सौ बार जप करने पर समस्त उत्पातो को नष्ट कर सकता है तथा युद्ध आदि में विजय प्राप्त कर सकता है । इस मंत्र का घी और गुग्गल से हवं करने से मनुष्य असाध्य कार्यो को पूर्ण कर सकता है । इस पाशुपातास्त्र मंत्र के पाठ मात्र से समस्त क्लेशो की शांति हो जाती है । यह अत्यन्त प्रभावशाली व शीघ्र फलदायी प्रयोग है। यदि मनुष्य इस स्तोत्र का पाठ गुरू के निर्देशानुसार संपादित करे तो अवश्य फायदा मिलेगा। शनिदेव शिव भक्त भी हैं और शिव के शिष्य भी हैं। ...