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सनातन में संक्रमण से बचने हेतु नियम

*सनातन धर्म में हजारों सालों से संक्रमण से बचने के लिए कुछ सूत्र* जो अब पूरी दुनिया अपना रही है - - घ्राणास्ये वाससाच्छाद्य मलमूत्रं त्यजेत् बुध:।  (वाधूलस्मृति 9) - नियम्य प्रयतो वाचं संवीताङ्गोऽवगुण्ठित:।(मनुस्मृति 4/49)) - नाक, मुंह तथा सिर को ढ़ककर, मौन रहकर मल मूत्र का त्याग करना चाहिए। *तथा न अन्यधृतं धार्यम्* (महाभारत अनु.104/86) दुसरों के पहने कपड़े नहीं पहनने चाहिए। *स्नानाचारविहीनस्य सर्वा:स्यु: निष्फला: क्रिया:*(वाधूलस्मृति 69) स्नान और शुद्ध आचार के बिना सभी कार्य निष्फल हो जाते हैं, अतः: सभी कार्य स्नान करके शुद्ध होकर करने चाहिए। *लवणं व्यञ्जनं चैव घृतं तैलं तथैव च। लेह्यं पेयं च विविधं हस्तदत्तं न भक्षयेत्।*(धर्मसिंधु 3 पू.आह्निक) नमक, घी, तैल, कोई भी व्यंजन, चाटने योग्य एवं पेय पदार्थ यदि हाथ से परोसे गए हों तो न खायें, चम्मच आदि से परोसने पर ही ग्राह्य हैं। *न अप्रक्षालितं पूर्वधृतं वसनं बिभृयात्।*(विष्णुस्मृति 64) पहने हुए वस्त्र को बिना धोए पुनः न पहनें। पहना हुआ वस्त्र धोकर ही पुनः पहनें। *न चैव आर्द्राणि वासांसि नित्यं सेवेत मानव:।*(महाभारत अनु.104/52) *न आर्द्...