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चाक्षुषी विद्या प्रयोग

 चाक्षुषी विद्या प्रयोग (पुनः प्रेषित) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ नेत्ररोग होने पर भगवान सूर्यदेव की रामबाण उपासना है।  इस अदभुत मंत्र से सभी नेत्ररोग आश्चर्यजनक रीति से अत्यंत शीघ्रता से ठीक होते हैं। सैंकड़ों साधकों ने इसका प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त किया है। सभी नेत्र रोगियों के लिए चाक्षुषोपनिषद् प्राचीन ऋषि मुनियों का अमूल्य उपहार है। इस गुप्त धन का स्वतंत्र रूप से उपयोग करके अपना कल्याण करें। शुभ तिथि के शुभ नक्षत्रवाले रविवार को इस उपनिषद् का पठन करना प्रारंभ करें। पुष्य नक्षत्र सहित रविवार हो तो वह रविवार कामनापूर्ति हेतु पठन करने के लिए सर्वोत्तम समझें। प्रत्येक दिन चाक्षुषोपनिषद् का कम से कम बारह बार पाठ करें। बारह रविवार (लगभग तीन महीने) पूर्ण होने तक यह पाठ करना होता है। रविवार के दिन भोजन में नमक नहीं लेना चाहिए। प्रातःकाल उठें। स्नान आदि करके शुद्ध होवें। आँखें बन्द करके सूर्यदेव के सामने खड़े होकर भावना करें कि ‘मेरे सभी प्रकार के नेत्ररोग भी सूर्यदेव की कृपा से ठीक हो रहे हैं।’ लाल चन्दनमिश्रित जल ताँबे के पात्र में भरकर सूर्यदेव को अर्घ्य दें। संभव हो तो षोडशोपचार वि...

शत्रु विनाश के उपाय / श्रीआकाशभैरव चित्रमाला मंत्र ॥

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  *श्रीआकाशभैरव चित्रमाला मंत्र ॥*     आकाशभैरव से तात्पर्य रुद्रावतार भगवान् शरभ शालुव पक्षिराज से है । शत्रूनाश हेतु यह प्रयोग किया जाता है । गुरु स्मरण एवं इष्ट-देवता-पूजन कर निम्न मन्त्र का १०८ बार पाठ करें अथवा शरभ पूजन उपरांत एक बार पाठ करे । इससे सभी कार्य सिद्ध होते हैं ।  साधारण कार्यों हेतु ३ पाठ ही पर्याप्त हैं ।  विनियोगः- ॐ श्री आकाशभैरवरस्य चित्रमाला नाममंत्रस्य श्रीआनन्दभैरव ऋषिः, गायत्री छन्दः श्रीआकाशभैरव देवता, हीं बीजं, हुं शक्तिः, सर्वाभीष्टसिद्धयर्थे जपे विनियोगः ।  ऋष्यादिन्यासः- ॐ श्रीआनन्दभैरव ऋषये नमः शिरसि । ॐ गायत्री छन्दसे नमः मुखे । ॐ आकाशभैरव देवतायै नमः हृदि । ॐ ह्रीं बीजाय नमः गुह्ये । ॐ हुं शक्तये नमः पादयोः । सर्वाभीष्ट सिद्धयर्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे ।  करन्यासः- ॐ ह्रां अंगुष्ठाभ्यां नमः । ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां स्वाहा । ह्रूं मध्यमाभ्यां वषट् । ॐ ह्रैं अनामिकाभ्यां हूं । ॐ ह्रौं कनिष्ठिकाभ्यां वौषट् । ॐ ह्रः करतलकर-पृष्ठाभ्यां फट् ।  अङ्गन्यासः- ॐ ह्रां हदयाय नमः । ॐ ह्रीं शिरसे स्वाह । ॐ ह्रूं शिखायै ...

धन लक्ष्मी प्राप्ति की विधि

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  *🙏🏻ॐमंगलायैनमः🪷ॐश्रीमहादेव्यै नमः🌷 ॐश्रीं श्रियै नमः। ॐश्रीमहालक्ष्म्यै देव्यै नमोनमः। ॐद्रां द्रीं द्रौं सःशुक्रायनमः। ॐअश्व ध्वजाय विद्महे धनुर्हस्ताय धीमहि तन्नो शुक्रः प्रचोदयात्। ॐऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायैविच्चैनमः ।ॐअन्नात्परिस्त्रुतोरसं ब्रह्मणाव्यपिकेबत्क्षत्रंपयःसोमंप्रजापतिः,ऋतेनसत्यमिन्द्रियंविपानं शुक्रमन्धस इन्द्रस्येन्द्रियमिदं पयोऽमृतं मधु।दैत्यमन्त्री गुरुस्तेषां प्राणदश्च महामति:।प्रभु: तारा ग्रहाणांचपीड़ां हरतुमेभृगु:। ॐश्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्मयै नम:॥ हिमकुंद मृणालाभं दैत्यानां परमंगुरुम्।सर्वशास्त्रप्रवक्तारं भार्गवं प्रणमा- म्यहम्।।दैत्यमन्त्रीगुरुस्तेषां प्राणदश्चमहामतिः ।प्रभुःताराग्रहाणांचपीड़ां हरतुमेभृगुः।।द्रविण विरहेणालसतयाविधेया शक्यत्वात्तवचरणयो -र्याच्युतिरभूत्।तदेतत्क्षन्तव्यं जननिसकलो -द्धारिणि शिवे, कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता नभवति।।* सबका उद्धारकरने वाली हे करुणामयी माता!तुम्हारी पूजाकी विधि न जाननेके कारण, धनके आभावमें,आलस्यसे और उन विधियोंको अच्छी तरह नकर सकनेके कारण,तुम्हारे चरणोंकीसेवा...

श्री नृसिंह साधना विधि

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 श्री नृसिंह साधना विधि  भगवान श्री नृसिंह शक्ति तथा पराक्रम के प्रमुख देवता हैं, पौराणिक मान्यता एवं धार्मिक ग्रंथों के अनुसार इसी तिथि को भगवान विष्णु ने श्री नृसिंह अवतार लेकर दैत्यों के राजा हिरण्यकशिपु का वध किया था. हिन्दू पंचांग के अनुसार श्री नरसिंह जयंती का व्रत वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को किया जाता है. पुराणों में वर्णित कथाओं के अनुसार इसी पावन दिवस को भक्त प्रहलाद की रक्षा करने के लिए भगवान विष्णु ने श्री नृसिंह रूप में अवतार लिया तथा दैत्यों का अंत कर धर्म कि रक्षा की. अत: इस कारणवश यह दिन भगवान श्री नृसिंह के जयंती रूप में बड़े ही धूमधाम और हर्सोल्लास के साथ संपूर्ण भारत वर्ष में मनाया जाता है. श्री नरसिंह जयंती कथा । श्री नृसिंह अवतार भगवान विष्णु के प्रमुख अवतारों में से एक है. श्री नरसिंह अवतार में भगवान विष्णु ने आधा मनुष्य व आधा शेर का शरीर धारण करके दैत्यों के राजा हिरण्यकशिपु का वध किया था. धर्म ग्रंथों में भगवान के इस अवतरण के बारे विस्तार पूर्वक विवरण प्राप्त होता है जो इस प्रकार है- प्राचीन काल में कश्यप नामक ऋषि हुए थे उनकी पत्नी का नाम ...

प्रदोष व्रत

प्रदोष व्रत यह एक पाक्षिक व्रत है अर्थात प्रत्येक महीने शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष की प्रदोषकालीन त्रयोदशी तिथि को व्रत रखते हैं। स्कंदपुराण के अनुसार त्रयोदश्यां तिथौ सायं प्रदोषः परिकीर्त्तितः । तत्र पूज्यो महादेवो नान्यो देवः फलार्थिभिः ।। प्रदोषपूजामाहात्म्यं को नु वर्णयितुं क्षमः । यत्र सर्वेऽपि विबुधास्तिष्ठंति गिरिशांतिके ।। प्रदोषसमये देवः कैलासे रजतालये । करोति नृत्यं विबुधैरभिष्टुतगुणोदयः ।। अतः पूजा जपो होमस्तत्कथास्तद्गुणस्तवः । कर्त्तव्यो नियतं मर्त्यैश्चतुर्वर्गफला र्थिभिः ।। दारिद्यतिमिरांधानां मर्त्यानां भवभीरुणाम् । भवसागरमग्नानां प्लवोऽयं पारदर्शनः ।। दुःखशोकभयार्त्तानां क्लेशनिर्वाणमिच्छताम् । प्रदोषे पार्वतीशस्य पूजनं मंगलायनम् ।। जिसका सार है “त्रयोदशी तिथि में सायंकाल को प्रदोष कहा गया है। प्रदोष के समय महादेवजी कैलाशपर्वत के रजत भवन में नृत्य करते हैं और देवता उनके गुणों का स्तवन करते हैं। अतः धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की इच्छा रखने वाले पुरुषों को प्रदोष में नियमपूर्वक भगवान शिव की पूजा, होम, कथा और गुणगान करने चाहिए। दरिद्रता के तिमिर से अंधे और भक्तसागर में डूबे हु...