धन लक्ष्मी प्राप्ति की विधि

 



*🙏🏻ॐमंगलायैनमः🪷ॐश्रीमहादेव्यै नमः🌷

ॐश्रीं श्रियै नमः। ॐश्रीमहालक्ष्म्यै देव्यै नमोनमः।

ॐद्रां द्रीं द्रौं सःशुक्रायनमः।

ॐअश्व ध्वजाय विद्महे धनुर्हस्ताय धीमहि तन्नो शुक्रः प्रचोदयात्।

ॐऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायैविच्चैनमः ।ॐअन्नात्परिस्त्रुतोरसं ब्रह्मणाव्यपिकेबत्क्षत्रंपयःसोमंप्रजापतिः,ऋतेनसत्यमिन्द्रियंविपानं शुक्रमन्धस इन्द्रस्येन्द्रियमिदं पयोऽमृतं मधु।दैत्यमन्त्री गुरुस्तेषां प्राणदश्च महामति:।प्रभु: तारा ग्रहाणांचपीड़ां हरतुमेभृगु:।

ॐश्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्मयै नम:॥




हिमकुंद मृणालाभं दैत्यानां परमंगुरुम्।सर्वशास्त्रप्रवक्तारं भार्गवं प्रणमा- म्यहम्।।दैत्यमन्त्रीगुरुस्तेषां प्राणदश्चमहामतिः ।प्रभुःताराग्रहाणांचपीड़ां हरतुमेभृगुः।।द्रविण विरहेणालसतयाविधेया शक्यत्वात्तवचरणयो -र्याच्युतिरभूत्।तदेतत्क्षन्तव्यं जननिसकलो -द्धारिणि शिवे, कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता नभवति।।*


सबका उद्धारकरने वाली हे करुणामयी माता!तुम्हारी पूजाकी विधि न जाननेके कारण, धनके आभावमें,आलस्यसे और उन विधियोंको अच्छी तरह नकर सकनेके कारण,तुम्हारे चरणोंकीसेवा करनेमें जोभूल हुईहो उसे क्षमाकरो,क्योंकि पूत तो कपूतहो जाताहै पर माता कुमाता नहीं होती।

*केनोपमाभवतुतेऽस्य पराक्रमस्यरूपंच शत्रु भयकार्यतिहारिकुत्र।चित्तेकृपा समरनिष्ठुरता चदृष्टा त्वय्येव देवि वरदेभुवनत्रयेऽपि॥*

वरदायिनी देवि! आपके इस पराक्रमकी किसके साथ तुलनाहो सकतीहै तथा शत्रुओंको भयदेने वालाएवं अत्यन्तमनोहरऐसारूपभी आपकेसिवा और कहाँहै?हृदयमें कृपाऔर युद्धमें निष्ठुरता ये दोनों बातें तीनों लोकोंके भीतर केवल आपमें ही देखी गयी हैं।

*नमः शिवाय,महादेवाय, सर्वलोकानां पतये।नमः शिवाय,शशिधराय,नमो नमः शिवाय।।*

हेमहादेव!हेसर्वलोकोंके स्वामी आपको मेरा नमस्कार है।हे शशिधर!हेशिव!आपको मेरा बार -बार नमस्कार है।

*न ते नामसंख्यां न ते रूपमीदृक्तथा कोऽपि वेदादिदेवस्वरूपे।त्वमेवासि सर्वेषु शक्ति स्वरूपा प्रजासृष्टिसंहारकाले सदैव।।स्मृति -स्त्वं धृतिस्त्वं त्वमेवासि बुद्धिर्जरा पुष्टितुष्टी धृति:कान्ति शान्ती।सुविद्या सुलक्ष्मीर्गति: कीर्तिमेधेत्वमेवासि विश्वस्यबीजं पुराणम्।।*

हेआदि स्वरूपिणि!आपके नामों की निश्चित संख्या तथा आपके इस रूप को कोई भी नहीं जान सकता।सबमें आपही विराजमान हैं।जीवों के सृजन और संहारकाल में शक्ति स्वरूपसे सदा आपही कार्य करतीहैं।आपही स्मृति,धृति,बुद्धि, जरा,पुष्टि,तुष्टि,धृति,कान्ति,शान्ति,सुविद्या,सुलक्ष्मी,गति,कीर्ति,मेधाऔरविश्वकीपुरातनमूलप्रकृति हैं।आपको बार-बार प्रणामहै।शुक्रवार के दिन माँ दुर्गाको लाल पुष्प चढ़ाकर माँ के 32 नामो का उच्चारण करनेसे घोरसे घोरसंकटोंका नाशहोता है।शुक्रवारको लक्ष्मीमंदिरमें सुगन्धित धूप और मिश्री अर्पित करें। *आर्थिक तंगी में उपाय* यदि कुंडली उपलब्धनहींहै वआर्थिकतंगीबनी रहतीहै तोशुक्रवार माँलक्ष्मीकेचरणोंमें जटावालापानी का नारियल अर्पितकरें वनारियलसे बनेलड्डू काभोगलगाए!नारियल माँलक्ष्मीको अत्यंतप्रिय है,शिघ्रहीआर्थिक तंगीदूरहोना शुरूहोजाएगी!

*किं वर्णितेन बहुना लक्षणं गुणदोषयोः।गुणदोषदृशिर्दोषो गुणस्तूभयवर्णितम्।।श्रीमद्भागवत*

गुण और दोषके बहुत सारे लक्षण क्या बताए जाएं? गुण और दोष दोनोंकी ओर दृष्टि जानाही दोष है और दोनोंसे अलग रहनाही गुण है।

*सुवृत्तः शीलसम्पन्न: प्रसन्नात्मात्मविद्बुधः।प्राप्येह लोके सत्कारं सुगतिं प्रतिपद्यते।।महाभारत*

जोसदाचारी,शीलसम्पन्न,प्रसन्नचित्तऔरआत्मतत्त्व को जाननेवालाहै,वहविद्वान् पुरुष इसलोक में सत्कारपाकर परलोकमें परमगति पाताहै।

*चिन्ता कापि नकार्या निवेदितात्मभि:कदा पीति।भगवानपि पुष्टिस्थो नकरिष्यति लौकिकीं गतिम्।।वल्लभाचार्य*

जिसनेप्रभुकोआत्म-निवेदनकरदियाहै,उन्हेंकभी किसी प्रकारकी चिन्तानहीं करनी चाहिए। पुष्टि (कृपा)करनेवाले प्रभु अंगीकृत जीवकी लौकिक (सामान्य मनुष्यकेसमान)गतिनहीं करते।

*धनवृद्धा बलवृद्धा आयुवृद्धास्तथैव च!ते सर्वेऽपिज्ञानवृद्धाश्चकिंकिराशिष्यकिंकिरा!!*

शास्त्र कहतेहैंकि इससंसारमें अति धनवृद्ध,अति बलवृद्ध,अति आयुवृद्ध वाले मनुष्यकी अपेक्षा ज्ञानवृद्ध सत्पुरुष को अधिक महत्व दिया गयाहै, क्योंकि धन,बल और आयुको तो एक न एकदिन नष्ट हो जाना निश्चित है, किन्तु ज्ञान कभी नष्ट नही होताहै यह जन्म जन्मान्तरतक जीवात्माके साथ रहताहै,इसकारण ज्ञानवृद्ध संत शिरोमणि यत्र-तत्र-सर्वत्र पूज्य है।

*अस्नायी च मलं भुंक्ते अजपी पूयशोणितम्!अकृत्वा तर्पणं नित्यं पितृहा चोपजायते!!*

शास्त्र कहतेहैंकि बिना स्नान किये भोज्य पदार्थ ग्रहण करने वाला मनुष्य भिष्ठा का भक्षण करता है, बिना गुरुमन्त्र जप किये जलका पान करने वाला रक्त पान करता है, बिना सूर्य भगवान को तर्पण किये जल अथवा भोजन ग्रहण करने वाला पितृहन्ता दोष का भागी होता है।

*नशापोनाभिचरणं नवह्निर्नविषं तथा!नास्त्राणिनचशस्त्राणियथातीक्ष्णतमाक्षमा!!*

शास्त्रकहतेहैंकि श्राप,अभिचारअग्नि,विष,अस्त्र औरशस्त्रभी उतनेतीक्ष्ण अथवा प्रभावशालीनही होतेहैं जितनी मनुष्यमें क्षमारुपी शक्ति प्रभाव पूर्ण होती है।

*अर्थिनोजठरज्वालादग्धावाक्कञ्चिदञ्चति! तां चाशमयतो वित्तं किन्निमित्तं नविद्महे!!*

शास्त्रकहतेहैंकि याचककी क्षुधासे दग्धित वाणी भोजन के लिये किसी न किसी मनुष्य को दाता स्वरुप समझकर याचना करती है, तब जो दाता क्षुधा रुपी अग्नि को अन्न दान देकर शांत नही करताहै तो उसके धन क्या उपयोगहै?इस प्रकार के धन को व्यर्थ कहा गया है।

*निराशता निर्भयता नित्यता समता ज्ञता!निरीहता निष्क्रियता सौम्यता निर्विकल्पता!!धृतिर्मैत्रीमनस्तुष्टिर्मृदुता मृदुभाषिता!हेयो पादेयनिर्मुक्ते ज्ञे तिष्ठन्त्यपवासनम्!!*

शास्त्रकहतेहैंकिवासनासेविहीन,निर्भयता,नित्यता,समता,अभिज्ञता,निष्कामता,निष्क्रियता,सौम्यता,निर्विकल्पता,धैर्य,मित्रता,मनःतुष्टि,मृदुलताएवं मृदुभाषिता,हेयऔर उपादेयसेमुक्त दुर्लभ सद् गुण किसीज्ञानी महापुरुषमें ही पाये जासकतेहैं।

*अभ्दिःगात्राणिशुध्यन्ति मनःसत्येन् शुध्यति!विद्यातपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिर्ज्ञानेन शुध्यति!!*

शास्त्र कहतेहैंकि मनुष्यके शरीरकी शुद्धि जलसे होतीहै,एवं मनकीशुद्धि सत्यसे होतीहै,तथाबुद्धि कीशुद्धिज्ञानसे होतीहै औरविद्याकीशुद्धि तपस्या से होतीहै। *ॐ★᭄ꦿ᭄ꦿजय मांलक्ष्मी★᭄ꦿ᭄ꦿ*

*आजकादिवसमङ्गलमयहो भगवानश्रीकृष्ण, श्रीमंगलामाँ,भगवतीदेवीमाँ,से लक्ष्मीमाँ समस्त कामनाओं की पूर्ति करें,आपका सदा कल्याण करें*

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