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अंगारक योग

जन्म कुंडली में क्या होता है अंगारक योग और क्या है उसके प्रभाव वैदिक ज्योतिष के अनुसार अंगारक योग का निर्माण किसी भी कुंडली में उस स्थिति में होता है, जब एक ही भाव में मंगल ग्रह के साथ राहु अथवा केतु उपस्थित हों। इसके अलावा, यदि मंगल का दृष्टि सम्बन्ध भी राहु अथवा केतु से हो रहा हो तो भी इस योग का निर्माण हो सकता है। आमतौर पर अंगारक योग को एक बुरा और अशुभ योग माना जाता है और इससे जीवन में समस्याओं की बढ़ोतरी होती है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार अंगारक दोष बुरे योगों में सम्मिलित किया गया है। अंगारक की प्रकृति से समझें तो अंगारे जैसा फल देने वाला योग बनता है। यह जिस भी भाव में बनता है, उस भाव के कारकत्वों को नष्ट करने की क्षमता रखता है। इस योग के प्रभाव से व्यक्ति के स्वभाव में परिवर्तन आते हैं, और उसमें गुस्से की अधिकता हो सकती है। यह योग व्यक्ति के निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित करता है और वह अपने क्रोध तथा दुर्घटना आदि के कारण समस्याओं को निमंत्रण देता है। मंगल को भाई का कारक कहा जाता है, इसलिए इस योग के प्रभाव से कई बार व्यक्ति की अपने भाइयों से नहीं बनती तथा दुर्घटना होने की संभावना...

*।।अथ अन्नप्राशन मुहूर्त चक्रमीदम।।*

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●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------  तत्र बलकनाम षष्ट मसादरभ्य सममासेषु । कण्यकनाम पंचमसादारभ्य  विषममासेषु कार्यम। मास गड़ना सौरणारात्राशनमं प्रिमितिज्ञेया।। *सद्भानी*   रो० उ०3 मृ० रे० ची० अनु० ह० पुष्य० अश्वी० अभी० पु० श्र० ध० स्वा० शु० श० एशु शुभेशु शुभ। अथ सप्तशालकाबिध्द ग्रहणभं ताजयं।। *तिथियः* 2/3/5/7/10/13/15 सत्त। अन्येषु सम।। *लग्नादि* नान्यस्मिन्नाहिं  सलग्ननी 2/3/4/5/6/7/10/11। एषु जन्मांगभयो मृत्युभस्यांग तदँशकंच हित्वा प्रसस्तम नान्यलग्ने ।                                       सम्पूर्ण---🖌              ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● आप हमारे अन्य प्रसारण माध्यम से जुड़ सकते है , 📡 ब्लॉग Aachary Rudreswaran  👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻       http://mangalamshiva.blogspot.com/?m=1 📡 टेलीग्राम 👇🏼👇🏼👇🏼👇🏼👇🏼👇...

विवाह में गोत्र, गण तथा प्रवर का शास्त्रीय विचार------------------------------------------------------------

नमो धर्माय महते वेदाय च स्वयम्भुवे । ऋषिभ्यश्च ब्राह्मणेभ्यो वेदविद्भ्यो नमोनमः।। वैदिक-सनातन-वर्णाश्रमधर्म में शास्त्रानुसार-- समान-गोत्र में विवाह निषेध है। समान-गण में विवाह निषेध है। समान-प्रवर में विवाह निषेध है। समान प्रवर का विशेष नियम- पञ्चानां त्रिषु सामान्यादविवाहस्त्रिषु द्वयोः । भृग्वङ्गिरो-गणेष्वेवं शेषेष्वेकोऽपि वारयेत्।।-प्रावरिकासूत्रम्। भृगु तथा अङ्गिरोगण में अधिक प्रवर अर्थात् ५ में ३ तथा ३ में २ प्रवर समान होने पर समानप्रवर माना जाता है और विवाह नहीँ होता है। कम प्रवर अर्थात् ५ में २ तथा ३ में १ प्रवर समान होने पर विवाह हो सकता है । अवशिष्ट अन्य सभी गणों में अर्थात् वसिष्ठ, कश्यप, भरद्वाज, विश्वामित्र, अत्रि, अगस्त्य - इन गणों  में तो ५ प्रवरों में से १ अथवा ३ प्रवरों में से १ प्रवर समान होने पर भी समानप्रवर माना जाता है और विवाह निषिद्ध होता है। इति वैदिकशास्त्रव्यवस्था।            

बृहत्संहिता के अनुसार सूर्य और चंद्र के दश ग्रास

सुत्र:- (राहुचाराध्याय: श्लोक ४३) सव्यापसव्यलेहग्रसननिरोधावमर्दनारोहा: । आघ्रातं मध्यतमस्तमो∙न्त्य इति ते दश ग्रासा:॥ इस सुत्र के‍ अनुसार सूर्य एवं चंद्रमा के ग्रहण के समय उत्पन्न स्थिति से सव्य, अपसव्य, लेह, ग्रसन, निरोध, अवमर्दन, आरोह, आघ्रात, मध्यतम, तमोन्त्‍य ये सूर्य एवं चंद्र के दश ग्रास होते है ।    सूर्य ग्रहण हमेशा आमावस्या के दिन होता है। सूर्य एवं पृथ्वी के बिच में चंद्र आने पर सूर्य ग्रहण की स्थिती बनती है, तथा चंद्र ग्रहण हमेशा पूर्णिमा के दिन होता है। सूर्य तथा चंद्रमा के बीच में पृथ्वी आने पर चंद्र ग्रहण की स्थिती बनती है।    सभी देशों में प्राय: चंद्र ग्रहण एक रूप का तथा सूर्य ग्रहण अलग अलग आकृती का दिखता है । उसका कारण यह है कि बादलो की तरह अध:स्थित चंद्रमा पश्चिम की ओर से आकर रविबिंब को ढकता है । इसलिए प्रत्येक देश में सूर्य ग्रहण अलग अलग रूपो में दिखाई देता है। १ सव्यग्रास : ग्रहण के समय में सूर्य या चंद्र से सव्य (दक्षिण भाग) में होकर राहु गमन करे तो संसार हर्षित, भय रहित और जल से पूर्ण होता है । संसार में सूख, शांती होती है । २ अपसव्य : यदि राहु ...

मंगली दोष

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों------ मंगली दोष मंगल उष्ण प्रकृति का ग्रह है.इसे पाप ग्रह माना जाता है. विवाह और वैवाहिक जीवन में मंगल का अशुभ प्रभाव सबसे अधिक दिखाई देता है. मंगल दोष जिसे मंगली के नाम से जाना जाता है इसके कारण कई स्त्री और पुरूष आजीवन अविवाहित ही रह जाते हैं.इस दोष को गहराई से समझना आवश्यक है ताकि इसका भय दूर हो सके. मंगली दोष का ज्योतिषीय आधार वैदिक ज्योतिष में मंगल को लग्न, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम और द्वादश भाव में दोष पूर्ण माना जाता है.इन भावो में उपस्थित मंगल वैवाहिक जीवन के लिए अनिष्टकारक कहा गया है.जन्म कुण्डली में इन पांचों भावों में मंगल के साथ जितने क्रूर ग्रह बैठे हों मंगल उतना ही दोषपूर्ण होता है जैसे दो क्रूर होने पर दोगुना, चार हों तो चार चार गुणा.मंगल का पाप प्रभाव अलग अलग तरीके से पांचों भाव में दृष्टिगत होता है जैसे: लग्न भाव में मंगल  लग्न भाव से व्यक्ति का शरीर, स्वास्थ्य, व्यक्तित्व का विचार किया जाता है.लग्न भाव में मंगल होने से व्यक्ति उग्र एवं क्रोधी होता है.य...

रन्ध्र तिथियां

चतुर्दशी  चतुर्थी  अष्टमी नवमी  षष्टी तथा द्वादशी तिथिया पक्ष रन्ध्र कहलाती है।  इनमे विवाह होने पर स्त्री विधवा हो जाती है। उपनयन होने पर  बटु व्रात्य (संस्कार हीन) होता है। सीमन्त करने पर गर्भ नष्ट। अन्नप्राशन करने पर मरण तथा गृहारम्भ करने पर अग्निकांड,  मंदिर की प्रतिष्ठा करने पर  राजा व प्रजा नाश  होता है अर्थात जो भी कर्म किये जाए वह नष्ट होते हैं।  अति आवश्यक होने पर -  चतुर्थी को ८, षष्टी को ९, अष्टमी को १४,  नवमी को २५, द्वादशी को १०, चतुर्दशी को तिथि आरम्भ की ५घड़ियां छोड़ देना चाहिये

*ज्योतिषनुसार सूर्य अर्घ्य के आर्थिक एवं शारीरिक लाभ*

*ज्योतिषनुसार सूर्य अर्घ्य के आर्थिक एवं शारीरिक लाभ* 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ भारतीय शास्त्रों के अनुसाए सूर्य देव को जल चढ़ाना बहुत शुभ माना जाता है. जी हां अक्सर आप अपनी समस्या लेकर जब किसी पंडित के पास जाते है, तो वो सबसे पहले सूर्य को अर्घ देने का उपाय ही सुझाते है. वही अगर किसी व्यक्ति की कुंडली मे सूर्य ग्रह मजबूत हो तो यह माना जाता है, कि वह व्यक्ति काफी गुणवान होता है. साथ ही समाज मे उसका बहुत मान सम्मान भी होता है. इसके इलावा वह बहुत प्रतिष्ठित भी होता है. ऐसे मे कुंडली मे सूर्य ग्रह को मजबूत रखना बेहद जरुरी है। वैसे महाभारत काल से ऐसा माना जाता है, कि कर्ण नियमित रूप से सूर्य देव की पूजा करते थे और सूर्य को जल का अर्घ भी देते थे. इसके इलावा सूर्य देव की पूजा के बारे मे भगवान् राम की कथा मे भी यह लिखा गया है, कि भगवान् राम हर रोज सूर्य देव की पूजा करते थे और अर्घ देते थे. वैसे कलयुग मे भी ऐसे बहुत से लोग है जो सूर्य देव को जल अर्पित करते है और उनकी पूजा करते है. गौरतलब है, कि सूर्य देव को अगर पूरी विधि के साथ जल चढ़ाया जाये तो इसके परिणाम और भी अच्छे होते है। यदि हम सूर्य द...

गंड मूल नक्षत्र

२७ नक्षत्र में से ६ नक्षत्र ऐसे है जिन्हें गंड मूल नक्षत्र कहा जाता है जैसे : अश्विनी नक्षत्र , अश्लेशा , माघ, ज्येष्ठ , मूला, रेवती। इनमे से ३ नक्षत्र अश्विनी , माघ,मूला इसके स्वामी केतु है, तथा अश्लेशा,ज्येष्ठ , रेवती, इनके स्वामी बुध है, इन नक्षत्र को गंड मूल कहा जाता है, गंड: गंड हम उस शब्द को कहते है जहा राशि और नक्षत्र एक साथ समाप्त होता है , तथा दूसरे राशि से नक्षत्र का आरम्भ होता है उसको हम मूल कहते है, और इसका पौराणिक कारण यह है की : - अश्वनी नक्षत्र के चारो चरण मेष राशि में आएगा तथा मेष राशि का स्वामी मंगल एक अग्नि प्रधान गृह है - अश्लेशा नक्षत्र जिसका चारो चरण कर्क राशि में समाप्त होता है जो जल तत्त्व राशि है तथा चंद्रमा इसके बाद अपना संचार सिंह राशि में तथा माघ नक्षत्र में करता है जो को अग्नि तत्त्व राशि है , अर्थात कर्क से सिंह राशि जो की अग्नि तत्त्व राशि है , जल से अग्नि की और चंद्रमा अग्रसर होता है - फिर वृस्चक राशि में ज्येष्ठ के चारो चरण जो धनु राशि तथा मूला नक्षत्र की और चंद्रमा अग्रसर होता है , अर्थात अग्नि तत्त्व (वृस्चक राशि) की और से धनु वायु तत्त्व की और जाता है...

ग्रह और रोग

आचार्य डॉ0 विजय शंकर मिश्र (प्रशासनिक सेवा)  -------------------------------------------------------------- चिकित्सा ज्योतिष में ग्रहों के कारक तत्व |  जैसे भचक्र की भिन्न-भिन्न राशियों तथा नक्षत्रों का अधिकार क्षेत्र शरीर के विभिन्न अंगों पर है, ठीक उसी प्रकार भिन्न-भिन्न ग्रह भी शरीर के विभिन अंगों से संबंधित है. इसके अतिरिक्त कुछ रोग, ग्रह अथवा नक्षत्र की स्वाभाविक प्रकृति के अनुसार जातक को कष्ट देते हैं. अत: भावों, राशियों, नक्षत्रों तथा ग्रहों एवं विशिष्ट समय पर चल रही दशाओं के व्यापक विचार के बाद शरीर पर रोग का स्थान एवं प्रकृति, निदान तथा रोग का संभावित समय एवं परिणाम ज्ञात करना भी संभव है. चिकित्सा ज्योतिष में विभिन्न ग्रहों के कारक तत्व यहाँ पर संक्षिप्त रूप में दिये जा रहे है. सूर्य | The Sun यह पित्त प्रकृति का कारक ग्रह है. इसका बलाबल किसी व्यक्ति के सामान्य स्वास्थ्य को प्रतिबिंबित करता है. इनका अधिकार क्षेत्र ह्रदय, पेट, अस्थि तथा दाहिनी आँख है. चिकित्सीय क्षेत्र में सूर्य के अधिकार क्षेत्र में सिरदर्द, गंजापन,चि़डचिडापन, ज्वर, दर्द, जलना, पित की सूजन से होने वाल...

वक्री ग्रह

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------  वक्री ग्रह सौर मंडल कें नौ ग्रह में सूर्य -चंद्र की गति नियमित है़ । राहू केतू हमेशा वक्री रहते है़ । सूर्य सें बुध की दूरी 28 डिग्री सें अधिक नही हो सकती । शुक्र भी सूर्य सें 48 डिग्री सें अधिक नही रहते । जन्मान्ग चक्र की शुद्धता का परीक्षण इन ग्रहों की स्थिति देखकर की जा सकती है़ ।        शनि , मंगल , गुरू जब सूर्य सें 150 डिग्री पार कर आगे बढ़ते है़ तो धीरे धीरे वक्री होने लगते है़ ।  वक्री ग्रह उच्च हो तो नीच का , नीच हो तो उच्च का फल देते है़ ।  उच्च ग्रह पिछले जन्मों का उत्कृष्ट कार्यों का प्रतीक है़ । वक्री ग्रह कें फल :-- मंगल (व.) -- मंगल कें वक्री होने सें उत्साह तथा कार्यक्षमता में कमी महशूस होगी ।  बुध (व.) -- बुध ग्रह वक्री हो तो शिक्षा में अवरोध उत्पन्न होंगे ।  गुरू (व.) -- गुरू वक्री हो तो संतान सें असंतोष तथा संतान को कष्ट होंगे ।  शुक्र (व.) -- शुक्र वक्री होने सें विपरीत लिंगी कें प्रति विशेष झुकाव होगा ।...

विवाह के कुछ रोचक ज्योतिषी गड़ना,

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------  विवाह और ससुराल की दुरी कन्या विवाह संबंधित शंका समाधान* 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ विवाह कहां होगा 〰️〰️〰️〰️〰️ माता-पिता अपनी कन्या का विवाह करने के लिए वर की कुंडली का गुण मिलान करते हैं। कन्या के भविष्य के प्रति चिंतित माता-पिता का यह कदम उचित है। किंतु, इसके पूर्व उन्हें यह देखना चाहिए कि लड़की का विवाह किस उम्र में, किस दिशा में तथा कैसे घर में होगा? उसका पति किस वर्ण का, किस सामाजिक स्तर का तथा कितने भाई-बहनों वाला होगा? लड़की की जन्म लग्न कुंडली से उसके होने वाले पति एवं ससुराल के विषय में सब कुछ स्पष्टतः पता चल सकता है। ज्योतिष विज्ञान में फलित शास्त्र के अनुसार लड़की की जन्म लग्न कुंडली में लग्न से सप्तम भाव उसके जीवन, पति, दाम्पत्य जीवन तथा वैवाहिक संबंधों का भाव है। इस भाव से उसके होने वाले पति का कद, रंग, रूप, चरित्र, स्वभाव, आर्थिक स्थिति, व्यवसाय या कार्यक्षेत्र, परिवार से संबंध कि आदि की जानकारी प्राप्त की जा सकती है। यहां सप्तम भाव के आधार पर कन्या के विवाह स...

शुभ अशुभ योग

शुभ कार्य करने के लिये अशुभ योगों का त्याग 🌼🍂🌼🍂🌼🍂🌼🍂🌼🍂🌼🍂🌼🍂🌼 शुभाशुभ कर्मो अथवा दैनिक कार्यो में भी मुहूर्त साधना प्राचीन परंपरा रही है इससे मनुष्य भविष्य में होने वाली अशुभ घटनाओं से बच सकता है। कुछ प्रमुख अशुभ योग का विवरण दिया जा रहा है यह आपके लिए अवश्य लाभदायक रहेगा। कुयोग👉  (अशुभ) वार, तिथि एवं नक्षत्रों के संयोग से अथवा केवल नक्षत्र के आधार पर कुछ ऐसे अशुभ योग बनते हैं जिन्हें, कुयोग कहा जा सकता है। इन कुयोगों में कोई शुभ कार्य प्रारंभ किया जाए तो वह सफल नहीं होता अपितु उसमें हानि, कष्ट एवं भारी संकट का सामना करना पड़ता है।  कुयोग-सुयोग: यदि किन्हीं कारणों से एक कुयोग तथा एक सुयोग एक ही दिन पड़ जाए तो भी उस दिन को त्याग देना चाहिये ।  दग्ध नक्षत्र👉  रविवार को भरणी, सोमवार को चित्रा, मंगलवार को उत्तराषाढ़ा, बुधवार को धनिष्ठा, गुरुवार को उत्तरा फाल्गुनी, शुक्रवार को ज्येष्ठा, शनिवार को रेवती नक्षत्र दग्ध नक्षत्र कहलाते हैं। इनमें कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाना चाहिए। मास-शून्य नक्षत्र👉  चैत्र में अश्विनी और रोहिणी, वैशाख में चित्रा और स्वात...

पित्र दोष का लग्न कुंडली में योग

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------  पितृ दोष में जिम्मेदार ज्योतिषीय योग:- 1. लग्नेश की अष्टम स्थान में स्थिति अथवा अष्टमेष की लग्न में स्थिति। 2. पंचमेश की अष्टम में स्थिति या अष्टमेश की पंचम में स्थिति। 3. नवमेश की अष्टम में स्थिति या अष्टमेश की नवम में स्थिति। 4. तृतीयेश, यतुर्थेश या दशमेश की उपरोक्त स्थितियां। तृतीयेश व अष्टमेश का संबंध होने पर छोटे भाई बहनों, चतुर्थ के संबंध से माता, एकादश के संबंध से बड़े भाई, दशमेश के संबंध से पिता के कारण पितृ दोष की उत्पत्ति होती है।  5. सूर्य मंगल व शनि पांचवे भाव में स्थित हो या गुरु-राहु बारहवें भाव में स्थित हो। 6. राहु केतु की पंचम, नवम अथवा दशम भाव में स्थिति या इनसे संबंधित होना। 7. राहु या केतु की सूर्य से युति या दृष्टि संबंध (पिता के परिवार की ओर से दोष)। 8. राहु या केतु का चन्द्रमा के साथ युति या दृष्टि द्वारा संबंध (माता की ओर से दोष)। चंद्र राहु पुत्र की आयु के लिए हानिकारक। 9. राहु या केतु की बृहस्पति के साथ युति अथवा दृष्टि संबंध (दादा अथवा ...

माह के सनातन नाम

१तपः (माघ) २तपस्य (फाल्गुन) ३मधु (चैत्र) ४माधव (वैशाख) ५शुक्र (ज्येष्ठ) ६शुचि (आषाढ) ७नभः (श्रावण) ८नभस्य (भाद्र) ९इष (आश्विन) १०उर्ज (कार्तिक) ११सहः (मार्गशीर्ष)  १२सहस्य (पाैष)।  मधु, माधव, शुक्र, शुचि, नभ, नभस्य, इष, ऊर्ज, सह, सहस्य, तप, तपस्या।  मधुश्च माधवश्च वासन्तिकावृतू ।  शुक्रश्च शुचिश्च ग्रैष्मावृतू । नभश्च नभस्यश्च वार्षिकावृतू । इषश्चोर्जश्च शारदावृतू । सहश्च सहस्यश्च हैमन्तिकावृतू ।  तपश्च तपस्यश्च शैशिरावृतू ।। (यजुर्वेद तैतरिय संहिता ४.४.११ मधुश्च माध्वश्चैव शुक्र शुचिरथो नभः।।  नभस्यश्चेष उर्जश्च सहश्चाथ सहस्यकः।  तपस्तपस्यः क्रमतः सौरमासाः प्रकीर्तिता।।

सुख-समृद्धि देने वाले पांच देवता

सुख-समृद्धि देने वाले पांच देवता एक परम प्रभु चिदानन्दघन परम तत्त्व हैं सर्वाधार । सर्वातीत, सर्वगत वे ही अखिल विश्वमय रुप अपार। हरि, हर, भानु, शक्ति, गणपति हैं इनके पांच स्...

पञ्चाङ्ग की उपयोगिता

पञ्चाङ्ग की उपयोगिता ~~~~~~~~~~~ भारतीय पंचांग का आधार विक्रम संवत है जिसका सम्बंध राजा विक्रमादित्य के शासन काल से है। ये कैलेंडर विक्रमादित्य के शासनकाल में जारी हुआ था। इसी क...