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शिव मंत्रो का जप एवम पुरश्चरण

*शिवमन्त्रों का जप एवं पुरश्चरण* मन्त्रजप से पूर्व जो - जो शास्त्रीय क्रियाएं की जाती हैं ये बहुत लम्बी, समय लेनेपाली, कष्टसाध्य एवं दुरुह है। जनसामान्य  तो क्या मूर्द्धन्य  आचार्यों द्वारा भी ये सभी कियाएं संपादित करना अगर असम्भव नहीं तो अवश्य कठिनता मे पूरी होनेवाली हैं। सभी प्रकार के मन्त्रानुष्ठान के क्रमिक सोपान निम्नलिन्वित है। यहाँ पर इन अंगों की केवल रूपरेखा ही दी जायगी। विस्तृत वर्णन के लिये अनुष्ठानप्रकाश:' आदि ग्रन्थ देवे जा सकते हैं। *मन्त्रजप के सोपान* 1- अगर व्यक्ति म्गय मन्त्रानुष्ठान के योग्य नहीं है अथवा असमर्थ है तो सबसे पहले उसे आचार्य को वरण करना होगा। सभी शास्त्रीय विधियों को सम्पन्न करके ही आचार्य का वरण किया जाता है। 2- स्नानादि नित्यकर्म से निवृत हो पूजा - स्थान पर जाकर पैर धोकर आचमन के अनन्तर द्वार की पूजा शास्त्रीय विधि से करें। 3- तदनन्तर देवताविशेष से संबंधित द्वारपालों की विधिपूर्वक पूजा करें। उदाहरण के लिये शिवमन्त्रों के अनुष्ठान के समय नन्दी, महाकाल, गणेश, भृगी, स्कद, चण्डेश्वर आदि की -द्वारपालो के बाद इन्नादि सभी दिग्पालो की शास्त्रीय रीति से प...

दुर्गा सप्तशती पाठ विधि

श्री दुर्गा सप्तशती श्री दुर्गा सप्तशती के पाठ करने का अलग विधान है। कुछ अध्यायों में उच्च स्वर, कुछ में मंद और कुछ में शांत मुद्रा में बैठकर पाठ करना श्रेष्ठ माना गया है। जैसे कीलक मंत्र को शांत मुद्रा में बैठकर मानसिक पाठ करना श्रेष्ठ है। देवी कवच उच्च स्वर में और श्रीअर्गला स्तोत्र का प्रारम्भ उच्च स्वर और समापन शांत मुद्रा से करना चाहिए। देवी भगवती के कुछ मंत्र यंत्र, मंत्र और तंत्र क्रिया के हैं। संपूर्ण दुर्गा सप्तशती स्वर विज्ञान का एक हिस्सा है। वाकार विधि:  प्रथम दिन एक पाठ प्रथम अध्याय, दूसरे दिन दो पाठ द्वितीय, तृतीय अध्याय, तीसरे दिन एक पाठ चतुर्थ अध्याय, चौथे दिन चार पाठ पंचम, षष्ठ, सप्तम व अष्टम अध्याय, पांचवें दिन दो अध्यायों का पाठ नवम, दशम अध्याय, छठे दिन ग्यारहवां अध्याय, सातवें दिन दो पाठ द्वादश एवं त्रयोदश अध्याय करके एक आवृति सप्तशती की होती है।  संपुट पाठ विधि:  किसी विशेष प्रयोजन हेतु विशेष मंत्र से एक बार ऊपर तथा एक नीचे बांधना उदाहरण हेतु संपुट मंत्र मूलमंत्र-1, संपुट मंत्र फिर मूलमंत्र अंत में पुनः संपुट मंत्र आदि इस विधि में समय अधिक लगता है। ले...