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शिव और गंग का आध्यामिक चिंतन

जिज्ञासा  शिव और गंगा का आध्यात्मिक चिंतन शिव संस्कृत भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है, कल्याणकारी या शुभकारी। यजुर्वेद में शिव को शांतिदाता बताया गया है। 'शि' का अर्थ है, पापों का नाश करने वाला, जबकि 'व' का अर्थ देने वाला यानी दाता। गंगा में गं शब्द का अर्थ है जाना, गा शब्द का अर्थ है राग। गंगा का शाब्दिक अर्थ है संगीत के ध्वनि के साथ बहती जाना। तो शिव के गुण कल्याण करना है और कल्याण जहाँ पाप यानी अशुद्धता का विनाश हो जाता जी गंगा का स्वभाव है । और जो  शुद्ध हो जाये उसे शिव मिल जाते है इसलिए शिव गंगा एक साथ है  कहते हैं कि ब्रह्मचारिणी गंगा के द्वारा किए स्पर्श से ही महादेव ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया। पत्नी पुरुष की सेवा करती है अतः उसका वास पति के हृदय में अथवा चरणों मे होता है किंतु भगवती गंगा शिव के मस्तक पर विराजति है। भगवान विष्णु के अंगूठे से गंगा प्रकट हुई अतः उसे विष्णुपदी कहां जाता है। भगवान विष्णु के प्रसाद रूप में शिव ने देवी गंगा का पत्नी के रूप में स्वीकार किया और अपने जटाओं में वाश दिए क्योंकि गंगा विष्णुपदी है और विष्णु शिव के आराध्य तो आ...

नर्मदाष्टकम

श्री नर्मदाष्टकम सबिंदु सिन्धु सुस्खल तरंग भंग रंजितम द्विषत्सु पाप जात जात कारि वारि संयुतम कृतान्त दूत काल भुत भीति हारि वर्मदे त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे 1 त्वदम्बु लीन दीन मीन दिव्य सम्प्रदायकम कलौ मलौघ भारहारि सर्वतीर्थ नायकं सुमस्त्य कच्छ नक्र चक्र चक्रवाक् शर्मदे त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे 2 महागभीर नीर पुर पापधुत भूतलं ध्वनत समस्त पातकारि दरितापदाचलम जगल्ल्ये महाभये मृकुंडूसूनु हर्म्यदे त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे 3 गतं तदैव में भयं त्वदम्बु वीक्षितम यदा मृकुंडूसूनु शौनका सुरारी सेवी सर्वदा पुनर्भवाब्धि जन्मजं भवाब्धि दुःख वर्मदे त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे 4 अलक्षलक्ष किन्न रामरासुरादी पूजितं सुलक्ष नीर तीर धीर पक्षीलक्ष कुजितम वशिष्ठशिष्ट पिप्पलाद कर्दमादि शर्मदे त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे 5 सनत्कुमार नाचिकेत कश्यपात्रि षटपदै धृतम स्वकीय मानषेशु नारदादि षटपदै: रविन्दु रन्ति देवदेव राजकर्म शर्मदे त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे 6 अलक्षलक्ष लक्षपाप लक्ष सार सायुधं ततस्तु जीवजंतु तंतु भुक्तिमुक्ति दायकं विरन्ची विष्णु शंकरं स्वकीयधाम वर्म...