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सत्यम शिवम सुंदरम

शास्त्रो का महावाक्य है सत्यं शिवम् सुन्दरम, मानव जीवन के यही तीन मूल्य हैं, जो सत्य है वही शिव है और जो शिव है वहीं सुंदर है, पश्चिम का सौंदर्यशास्त्री यह मानकर चलता है कि सुंदरता द्रष्टा की दृष्टि में है, यानी सौंदर्य बोध नितांत व्यक्तिनिष्ठ है, परन्तु अध्यात्म सुन्दरता की इस परिभाषा को खारिज कर देती है, वह सत्य, शिव और सुन्दर को सर्वथा वस्तुनिष्ठ मानती है, मूल्य सापेक्ष न होकर निरपेक्ष हैं। मनुष्य इसलिये मनुष्य है, क्योंकि वह मूल्यों के अधीन है, मूल्य उसकी विशिष्ट संपत्ति है, सुन्दर क्या है? जो शिव है वही सुंदर है, अर्थात जिसमें शिवत्व नहीं है, उसमें सौंदर्य भी नहीं है, "यस्मिन् शिवत्वंनास्तितस्मिन सुन्दरम् अपिनास्तिएव" हमारे मन को सुख देने वाली चीज सुंदर है, यह सुंदरता की बचकानी परिभाषा है, सुख और दु:ख संस्कारगत होने के नाते व्यक्तिनिष्ठ हैं, अनुकूल वेदना का नाम सुख है और प्रतिकूल वेदना का नाम दु:ख है। एक ही चीज किसी को सुख देती है और किसी को दु:ख, परंतु सुंदरता तो वस्तुनिष्ठ ही है, हमारे शास्त्र कहते है कि जो कल्याणकारी है वही सुंदर है, यह जरूरी नहीं है कि सुखद चीज सुंदर...

ब्राह्मण के 11 कारक

ब्राह्मण कुल परम्परा के 11  कारक  🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 (1) गोत्र👉  व्यक्ति की वंश-परम्परा जहाँ और  से प्रारम्भ होती है, उस वंश का गोत्र भी वहीं से प्रचलित होता गया है। इन गोत्रों के मूल ऋषि :– विश्वामित्र, जमदग्नि, भारद्वाज, गौतम, अत्रि, वशिष्ठ, कश्यप। इन सप्तऋषियों और आठवें ऋषि अगस्त्य की संतान गोत्र कहलाती है। यानी जिस व्यक्ति का गौत्र भारद्वाज है, उसके पूर्वज ऋषि भरद्वाज थे और वह व्यक्ति इस ऋषि का वंशज है।  (2) प्रवर👉 अपनी कुल परम्परा के पूर्वजों एवं महान ऋषियों को प्रवर कहते हैं। अपने कर्मो द्वारा ऋषिकुल में प्राप्‍त की गई श्रेष्‍ठता के अनुसार उन गोत्र प्रवर्तक मूल ऋषि के बाद होने वाले व्यक्ति, जो महान हो गए, वे उस गोत्र के प्रवर कहलाते हें। इसका अर्थ है कि कुल परम्परा में गोत्रप्रवर्त्तक मूल ऋषि के अनन्तर अन्य ऋषि भी विशेष महान हुए थे। (3) वेद👉 वेदों का साक्षात्कार ऋषियों ने लाभ किया है। इनको सुनकर  कंठस्थ किया जाता है। इन वेदों के उपदेशक गोत्रकार ऋषियों के जिस भाग का अध्ययन, अध्यापन, प्रचार प्रसार, आदि किया, उसकी रक्षा का भार उसकी संतान पर पड़ता ...

पतिब्रत क्या है

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●     ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों------- चर्चा🤔🤔🤔 पतिर्बन्धु गतिर्भर्ता दैवतं गुरूरेव च। सर्वस्याच्च परः स्वामी न गुरू स्वामीनः परः।। (ब्रह्मवैवतं पु. कृष्ण जन्म खं 57-11) अर्थ == *स्त्रियों का सच्चा बन्धु पति है, पति ही उसकी गति है। पति ही उसका एक मात्र देवता है। पति ही उसका स्वामी है और स्वामी से ऊपर उसका कोई गुरू नहीं।। भर्ता देवो गुरूर्भता धर्मतीर्थव्रतानी च। तस्मात सर्वं परित्यज्य पतिमेकं समर्चयेत्।। (स्कन्द पु. काशी खण्ड पूर्व 30-48) अर्थ == *स्त्रियों के लिए पति ही इष्ट देवता है। पति ही गुरू है। पति ही धर्म है, तीर्थ और व्रत आदि है। स्त्री को पृथक कुछ करना अपेक्षित नहीं है। दुःशीलो दुर्भगो वृध्दो जड़ो रोग्यधनोSपि वा। पतिः स्त्रीभिर्न हातव्यो लोकेप्सुभिरपातकी।। (श्रीमद् भा. 10-29-25) अर्थ == *पतिव्रता स्त्री को पति के अलावा और किसी को पूजना नहीं चाहिए, चाहे पति बुरे स्वभाव वाला हो, भाग्यहीन, वृध्द, मुर्ख, रोगी या निर्धन हो। पर वह पातकी न होना चाहिए। विशेष ,, उपरोक्त लेख में जहाँ पत्नियों के लिए " पति...

चिर हरण लीला

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●     ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों------- चिर हरण लीला का रहस्य भगवान् श्रीकृष्ण पर आरोप लगाने वाले बुद्धि के शत्रु जरा बुद्धिके कपाट खोलो और विचार करो उस समय श्रीकृष्ण मात्र 6 वर्ष 3 मास के थे । 6 वर्षका बालक के अंदर कैसे स्त्रियों को निर्वस्त्र देखने भावना हो सकती है ? अब स्पष्ट करता हूँ — चीर हरण लीला उस समय हुई थी जब भगवान् श्रीकृष्ण 6 वर्ष 3 मास के थे और हेमन्त ऋतु के प्रथम मास मार्गशीर्ष (दिसम्बर) में गोप कन्याएँ जमुना स्नान करके माँ कात्यायनी का पूजन करती थीं — “हेमन्ते प्रथमे मासे नन्दव्रजकुमारिका: । चेरुर्हविष्यं भुञ्जानाः कात्यायन्यर्चनव्रतम् ।।” ये स्त्रियां नहीं व्रजकुमारिकाएं अर्थात् 5 से 8 वर्ष की कन्याएँ थीं । यही नहीं सुबह पौ फटते(ब्रह्म मुहूर्त में 4 बजे) ही जमुना स्नान करती थीं – “उषस्युथाय गोत्रै: ….. कालिन्द्यां स्नातुमन्वहम् ।।” अब कल्पना कीजिए प्रातः पौ फटते ही सुबह ब्रह्ममूर्त में कितना अन्धकार रहता है , जिसमें गोपियाँ स्नान करती थीं , जिसमें कोई निर्वस्त्र तो क्या सवस्त्र भी नहीं दिखता ...

नवग्रह एवं वेद की पत्नियाँ

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●     ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों------- #नवग्रहदेवता के #पत्नी के नाम (1)सूर्य-संध्या, छाया देवी (2)चन्द्र-रोहिणीदेवी (3मंगल-शकितदेवी (4)बुध-इलादेवी (5)बृहस्पति-तारादेवी (6)शुक-सुकितीॅ-उजॅसवथीदेवी (7)शनि-नीला देवी (8)राहु-सीम्हीदेवी (9)केतु-चित्रलेखादेवी #वेदो के #पत्नी के नाम (1) ऋग्वेद-पत्नी सामधेन्याः (2) यजुवेॅद-पत्नी सृगायाः (3) सामवेद-पत्नी कुह्वाः (4) अथवॅवेद-पत्नी समिधः                                        सम्पूर्ण---🖌  ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●                     📳📳📳📳   *9956973754/7607121234*  अत्यधिक पोस्ट के लिए हमारे ब्लॉग को भी देख सकते है-  ```Aachary Rudreshwaran```     आचार्य रुद्रेश्वरण समूह से जुड़ने के लिए        ऊपर के नंबरों पर *YES* भेजें।            ...

प्रश्न : ईश्वर ने सभी मनुष्यों को कुछ नैसर्गिक वृत्ति और सहज ज्ञान दिया है | यह सभी पुस्तकों से बेहतर है क्योंकि इसी से हम सब कुछ समझ सकते हैं, इस ज्ञान के विकास के साथ कुछ लोगों ने वेदों की रचना करना सीख लिया हो, ऐसा हो सकता है | वेद, ईश्वर से ही अवतरित हुए हैं, ऐसा मानना क्यों आवश्यक है ?

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●     ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों------- शंका : ईश्वर ने सभी मनुष्यों को कुछ नैसर्गिक वृत्ति और सहज ज्ञान दिया है | यह सभी पुस्तकों से बेहतर है क्योंकि इसी से हम सब कुछ समझ सकते हैं, इस ज्ञान के विकास के साथ कुछ लोगों ने वेदों की रचना करना सीख लिया हो, ऐसा हो सकता है | वेद, ईश्वर से ही अवतरित हुए हैं, ऐसा मानना क्यों आवश्यक है ? – १.क्या जंगली जनजातियों और शिक्षा के अभाव में अकेले जंगल में पले बच्चे के पास उनका सहज ज्ञान नहीं था ? फ़िर भी वो विद्वान या समझदार क्यों न हुए ? २.भाषा भी वेदों से ही मिली है लेकिन वेदों पर विश्वास के अभाव में भाषा की उत्पत्ति भी आधुनिक और शंकाशील वैज्ञानिकों के लिए एक रहस्य रह जाता है | ३.हम शाला में जा कर और हम से बड़ों से पाठ पढ़ कर भी सीखते रहते हैं तो फ़िर शुरू के समय में लोग इतना सब कैसे सीख सकते हैं कि उन वेदों को बना सकें – जिस में बहुत सारे मंत्र हों और वो भी उस भाषा में जो अन्य किसी भी भाषा से परिपूर्ण और विस्तृत है और जिस में विविध और महत्वपूर्ण विषयों पर गहन विचार हों और ज...

पूजा विधि में वस्त्र निषेध

देव उपासना में निषिद्ध वस्त्र “( न स्यूते न दग्धेन पारक्येन विशेषतः | मूषिकोत्कीर्ण जीर्णेन कर्म कुर्याद्विचक्षणः ||महा भा०||)” सिले हुए वस्त्र से , जले हुए वस्त्र से, विशेषकर दूसरे के वस्त्र से, चूहे से कटे हुए वस्त्र से धर्मकार्य नहीं करना चाहिए. “(जीर्णं नीलं संधितं च पारक्यं मैथुने धृतम् | छिन्नाग्रमुपवस्त्रं च कुत्सितं धर्मतो विदुः ||आचारादर्शे नृसिंहपुराणवचन)” जीर्ण, नीला, सीला हुआ, दूसरे का, संभोगावस्था में पहना हुआ, जिसका तत्र भाग कटा हो एवं छोर रहित वस्त्र धर्मकी दृष्टि से धारण न करें, “(अहतं यन्त्र निर्मुक्तं वासः प्रोक्तं स्वयंभुवा | शस्तं तन् मांगलिक्येषु तावत् कालं न सर्वदा ||कश्यपः||)” यन्त्र(मील) से निकले हुए बने हुए वस्त्र को “अहत” वस्त्र माना हैं | वह यन्त्र से निकला हुआ कपड़ा विवाह आदि मांगलिक कार्य में उतने ही समय तक ठीक हैं, हमेशा के लिए नहीं. “( अन्यत्र यज्ञादौ तु इषद्धौतमिति | #न_च_यज्ञादिकमपि #मांगलिक्यमेवेत्याशंकनीयम् / विवाहोत्सवादेरैहिकसुखस्याभ्युदयस्य च मांगलिकत्वात् / यज्ञोदेस्तु #धर्मरूपादृष्टफलदत्वेन मांगलिकत्वाभावात् ” ||मदन पारि० शातातपः || )” म०पारि ग्र...

वेदों में अवतार वाद समर्थन

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साधक कैसे बने।

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जीवात्मा का स्वरूप

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शास्त्रों के अन्दर वर्णित संकेत

शास्त्रों के अन्दर वर्णित चुनिन्दा ऐसे संकेत जो अगर आपको दिखें तो समझ लेना ज़िन्दगी में रौनक आने वाली है। सफेद गाय : -  सनातन धर्मियों की गौ माता जिसे कुछ लोग केवल राजनैतिक म...

कर्तृत्व , भोक्तृत्व और निवारण

*कर्तृत्व , भोक्तृत्व और निवारण* जीे जैसे जल बिना किसी प्रयोजन के नीचे की और ही बहता है क्यूंकि नीचे की और बहना जल की प्रकृति है वैसे ही सृष्टि रचना करना ब्रह्म (परम) की प्रकृति ...

शास्त्रों में वर्णित हैं पुरोहित के लिए मर्यादाएं व नियम, जानिए

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ईश्वर निराकार हैं।

*💥ईश्वर निराकार हैं💥* १. परमात्मा सर्वशक्तिमान, स्थूल, सूक्षम तथा कारण शरीर से रहित, छिद्र रहित, नाड़ी आदि के साथ सम्बन्ध रूप बंधन से रहित, शुद्ध, अविद्यादि दोषों से रहित, पाप स...

धर्म न दूसर सत्य समाना, आखिर ये सत्य है क्या?💥*

*💥बाबा तुलसी ने रामचरितमानस में लिखा है, धर्म न दूसर सत्य समाना, आखिर ये सत्य है क्या?💥* सत्य के कई अर्थ हैं, एक अर्थ में जो अविनाशी, चिरंतन और शाश्वत है वही सत्य है, दूसरे अर्थों ...