वेदों में अवतार वाद समर्थन
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❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗
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👉🏻 प्रिय पाठकों-------
विशेष अवश्य पढ़ें-------
हिन्दू समाज में ईश्वर के विभिन्न अवतारो की मान्यता है ।
बहुत सारे नवविद्वानो ने अवतार वाद का खंडन भी किया है अपनी बुद्धि से ।
पुराणों में अवतार परिचर्चा कथात्मक रुप में है तथा जनमानस में फैलाव का यही कारण है ।
कुछ विद्वान केवल वेदों को मानते हैं , और वैदिक मान्यता से ही अवतार वाद का खंडन तथा ईश्वर के निर्गुण होने का दावा भी करते हैं !!!
क्या वैदिक वाङ्गमय में अवतार तथा ईश्वर के सगुण रुप की चर्चा नहीं है ?
अवश्य है ।वेदों के अवतार तत्वों के बीज को ही उपबृहण कर पुराणों में आख्यान रुप में विस्तार हुआ है ।
जैसे –
शतपथ ब्राह्मण (1/8/1/1-6)-मनु तथा महामत्स्य का प्रसंग है जिससे मत्स्यावतार कथा का विस्तार हुआ ।
तैत्तरीय आरण्यक-प्रजापति का कूर्म रुप ही सहस्रशीर्षा पुरुष: रुप में प्रकट हुआ ।
तैत्तरीय ब्राह्मण (1/1/3/6)-प्रजापति ने वाराह रुप धारणकर धरती को जल से बाहर निकाला ।
ऋग्वेद(8/14/13)-नमुचि दैत्य का मस्तक इन्द्र ने जल के फेन से उडाया , इस कथा का विस्तार ही नृसिह कथा है ।
नृसिह का सबसे पहले उल्लेख तैत्तरीय आरण्यक में आया है ।
ऋग्वेद (1/22/17)- इदं विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा नि दधे पदम् ।अर्थात इस विश्व को तीन पैर से विष्णु ने आक्रान्त किया -यही कथा वामनावतार के रुप में है ।
शतपथ ब्राह्मण (1/2/5/5)-वामनो हि विष्णुरास ।विष्णु का अर्थ यज्ञ भी होता है ।
अथर्ववेद (5/19/1-11) में कथा है कि सृञ्जय वैतहव्य नामक राजा भृगु तथा ब्राह्मणो की हिंसा करने पर पराभूत हुए ।इससे परशुराम अवतार की कथा निकली ।
छान्दोग्य उपनिषद (3/17/6)-देवकी पुत्र श्री कृष्ण का उल्लेख है ।
वेदों में ईश्वर को मित्र, वरुण, अग्नि , इन्द्र आदि कहा गया , जो सगुण रुप ही है ।
यह सैद्धांतिक परिचर्चा है ।
ग्रंथ जिस दृष्टिकोण से लिखे गये , उस दृष्टिकोण से
सम्पूर्ण---🖌
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