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सप्त स्वप्न विधि

सप्तविधस्वप्न दृष्टः श्रुतोऽनुभूतश्च प्रार्थितःकल्पितस्तथा । भाविको दोषजश्चैव स्वप्नः सप्तविधो विदुः॥३॥  अर्थ- तहाँ कहते है कि स्वप्न सात प्रकारका है । १ दृष्ट (जो दिनमें देखा हो उसीको रात्रिको स्वप्नमें देखे ) २. श्रुत (जो बात सुनी हो उसीको स्वप्नमें देखे) ३. अनुभूत ( जो बात जाग्रतअवस्थामें अनुभव करी हो उन्हीको स्वप्नमें देखे) ४.प्रार्थित (जो वस्तूको जाग्रतअवस्थामें इच्छा की हो उसीको स्वा देखना)५ कल्पित (जो दिनमें किसी वस्तुकी कल्पना करे। स्वममें देखे) ६ भाविक (जो दृष्टऋतसे विलक्षण देखे और को उसका वैसाही फल हो उसको भाविक जानना)७ दोष (अर्थात् पात पित्त कफ इनकी प्रकृतिके अनुसार स्वप्न दीखना। तंत्र पञ्चविधं पूर्वमफलं भिषगादिशेत् ।  दिवास्वप्नमतिह्रस्वमतिदीर्घ च बुद्धिमान् ॥ ४॥ दृष्टः प्रथमरात्रे यः स्वप्नः सोऽल्पफलो भवेत्। न स्वप्यादं पुनर्दृष्ट्वा स सद्यः स्यान्महाफलः।।५।। अर्थ-उन दृष्टादिक सात स्वप्नों में प्रथमके पांच स्वप्नों को निष्फल कहे । तथा दिनका स्वप्न एवं अति छोटा अथवा अत्यंत बड़ा स्वप्नको भी वैद्य निष्फल जाने और जो स्वप्न प्रथम रात्रि  में देखा हो वह अल्प फलको द...