भोजन करने के नियम
मनुस्मृति में कहा है-अन्नं ब्रह्म इत्युपासीत्। अर्थात अन्न ब्रह्म है यह समझकर उसकी उपासना करनी चाहिए। दोनों हाथ, दोनों पांव और मुख इन पांचों अंगों को जल का उपस्पर्श करके नित्य सावधान होकर अन्न को खाना चाहिए। भोजन के उपरांत भली प्रकार आचमन करना चाहिए तथा जल के द्वारा मुखस्थ छहों छिद्रों का स्पर्श करना चाहिए। नित्य प्रथम भोजन का पूजन करना चाहिए और बिना निंदा किए खाना चाहिए। भोजन को देखकर हर्ष-युक्त होना चाहिए और प्रसन्नतापूर्वक उसका अभिनंदन करना चाहिए। ब्रह्मवैवर्त पुराण ब्रह्मखंड में लिखा है-अन्नं ब्रह्मा रसो विष्णुर्भोक्ता देवो महेश्वर:। अर्थात अन्न ब्रह्म है, रस विष्णु है और खाने वाले महेश्वर हैं। अन्नं विष्टा जलं मूत्रं यद् विष्णोरनिवेदितम्।। अर्थात विष्णु भगवान को भोग न लगा अन्न विष्टा के समान है और जल मूत्र के तुल्य है। स्कंद पुराण में कहा गया है-अस् नायी समलं भुङक्ते अजपी पूयशोणितम्।सूय्र्यायाध्र्यमदत्वा च नर: किलिवषमश्नुते। अर्थात् बिना स्नान किए भोजन करना मल खाने के तुल्य है। बिना जप किए भोजन खाना राध, पीप, रुधिर सेवन करने के समान है और सूर्य को अर्घ्य दिए बिना भोजन करना पाप खान...