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द्रिक सिद्धान्त

*दृक् सिद्ध ज्योतिष* इस सम्बन्ध में कई शब्द हैं-दृक् तुल्य, दृग्गणित, दृक् सिद्ध पञ्चाङ्ग। सिद्धान्त दर्पण के प्रति अध्याय के अन्त में उस पुस्तक के दो उद्देश्य लिखे हैं-बालबोध (छात्रों के लिए पाठ्य पुस्तक), तथा गणित-अक्षि सिद्धि (दृक् तुल्यता) गणित अक्षि सिद्धि के कई अर्थ हैं- (१) हर विज्ञान का उद्देश्य है दृश्य जगत् की व्याख्या। कई घतनाओं को देखने के बाद उनके नियम बनाये जाते हैं। भविष्य में यदि उनमें कुछ त्रुटि दीखती है, तो नियमों में संशोधन किये जाते हैं।नियमों को गण्तित की भाषा में लिखते हैं। उनकी माप प्रयोग द्वारा होती है, जहां प्रयोग सम्भव नहीं वहां पूर्व निर्धारित सिद्धान्तों के अनुसार गणना की जाती है। जब गणना में अशुद्धि होती है। अविद्या के २ अर्थ हैं-विद्या का अभाव, या अपरा विद्या (वर्गीकरण, विज्ञान)। दोनों अर्थों में इसके ५ अंग हैं-अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश। अपरा विद्या अर्थ में अर्थ हैं-१. अविद्या = विद्या या विषय के वर्ग, २. अस्मिता-हर वर्ग का परिचय या परिभाषा, ३. राग-वर्ग के भीतर की वस्तुओं में समानता, ४. द्वेष-अन्य वर्गों से अन्तर, ५. अभिनिवेश-सिद्धान्त स्थिर ...