द्रिक सिद्धान्त

*दृक् सिद्ध ज्योतिष*


इस सम्बन्ध में कई शब्द हैं-दृक् तुल्य, दृग्गणित, दृक् सिद्ध पञ्चाङ्ग। सिद्धान्त दर्पण के प्रति अध्याय के अन्त में उस पुस्तक के दो उद्देश्य लिखे हैं-बालबोध (छात्रों के लिए पाठ्य पुस्तक), तथा गणित-अक्षि सिद्धि (दृक् तुल्यता)
गणित अक्षि सिद्धि के कई अर्थ हैं-

(१) हर विज्ञान का उद्देश्य है दृश्य जगत् की व्याख्या। कई घतनाओं को देखने के बाद उनके नियम बनाये जाते हैं। भविष्य में यदि उनमें कुछ त्रुटि दीखती है, तो नियमों में संशोधन किये जाते हैं।नियमों को गण्तित की भाषा में लिखते हैं। उनकी माप प्रयोग द्वारा होती है, जहां प्रयोग सम्भव नहीं वहां पूर्व निर्धारित सिद्धान्तों के अनुसार गणना की जाती है। जब गणना में अशुद्धि होती है। अविद्या के २ अर्थ हैं-विद्या का अभाव, या अपरा विद्या (वर्गीकरण, विज्ञान)। दोनों अर्थों में इसके ५ अंग हैं-अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश। अपरा विद्या अर्थ में अर्थ हैं-१. अविद्या = विद्या या विषय के वर्ग, २. अस्मिता-हर वर्ग का परिचय या परिभाषा, ३. राग-वर्ग के भीतर की वस्तुओं में समानता, ४. द्वेष-अन्य वर्गों से अन्तर, ५. अभिनिवेश-सिद्धान्त स्थिर करना।
सिद्धान्त तथा गणना का क्रमिक संशोधन द्वारा लगातार समन्वय या तुल्यता हर विज्ञान तथा ज्योतिष का आधार है।

(२) गणना में भूल-इसके कई कारण हैं-१. सिद्धान्त या गणित सूत्र में भूल, २. माप में भूल, ३. गणना पद्धति में भूल। सूत्र ठीक भी हैं तो उनका हल निकालना प्रायः सम्भव नहीं होता। अनुमानित गणना करनी पड़ती है। उदाहरण के लिये ग्रहों की दीर्घवृत्तीय कक्षा ज्ञात है, पर उस कक्षा की गणना करने की अभी तक कोई विधि नहीं है। गणना विधि ठीक है किन्तु अनन्त क्रम तक चल सकती है, जैसे २ का वर्गमूल निकालने की सटीक विधि ज्ञात है, पर गणना कभी समाप्त नहीं होती। १/३ ज्यामितिक रेखा से ठीक कहा जा सकता है, पर दशमलव पद्धति में उसे व्यक्त नहीं किया जा सकता है। माप में सदा भूल रहती है। आंख से ग्रह की दिशा देखेंगे तो आधा अंश की भूल होती है। दूरदर्शक यन्त्र से भी भूल होती है, पर बहुत कम। दिल्ली से लखनऊ की दूरी में किलोमीटर तक की भूल होती है। उसमें भी कई विकल्प माप होंगे-किस मार्ग से लखनऊ जा रहे हैं, दिल्ली के किस स्थान से लखनऊ के किस स्थान तक, या रास्ते के बीच से दूरी मापी जायेगी या बांयी तरफ से। कुछ भी कर लें, किलोमीटर से कम भूल होना सम्भव नहीं है। ज्योतिष में अधिक भूल होती है, क्योंकि चन्द्र या किसी ग्रह तक हम फीता लेकर नहीं जा सकते हैं। चन्द्र की दूरी मापने के लिये कई स्तरों पर माप और गणना होती है-
पहले पृथ्वी की सूक्ष्म माप की जाती है।
दो स्थानों से एक समय चन्द्र को देखते हैं।
दोनों स्थानों की दूरी के अनुसार चन्द्र की कोणीय दिशा में कुछ अन्तर होता है, जिसके अनुसार गणना की जाती है। 
लोगों की धारणा है कि आर्यभट ने चन्द्र दूरी आदि की माप की थी। वह यदि पटना की वेधशाला (पटना से सटा खगोल नगर, जो आर्यभट के कुसुमपुर या फुलवारीशरीफ के निकट है) में रहते थे, तो उससे सबसे दूर भारत का स्थान कन्याकुमारी था। आर्यभट के कल्पित समय ३६०० कलि (४९९ ई.) में पटना किसी राज्य की राजधानी नहीं था। वास्तविक समय ३६० कलि (२७४२ ई.पू.) में बार्हद्रथ वंश का मगध में शासन था। उसकी राजधानी राजगृह थी पर पटना उसके राज्य में था तथा वह भारत का मुख्य राज्य था। यह मान लेते हैं कि पटना तथा कन्याकुमारी की वेधशालाओं के अक्षांश-देशान्तर का मान कोण के सेकण्ड (विकला) तक ठीक ज्ञात था, अर्थात् १ विकला तह की भूल देनों स्थानों के अक्षांश देशान्तरों में थी। चन्द्रमा को देखने के समय में भी १ सेकण्ड (१/४ असु) तक की भूल होगी। उस समय किस प्रकार की घड़ी थी तथा उसे कैसे मिलाते थे, यह नहीं पता। आजकल दूरदर्शन या मोबाइल के इन्टरनेट से समय देखने में १ मिनट की भूल होती है। एक साथ दोनों स्थानों से चन्द्रमा को देखने पर १/८ अंश से कम का अन्तर होगा। यदि इसमें भी १ विकला तक की भूल होगी, तो चन्द्र दूरी की गणना में २५% की भूल होगी। स्पष्ट है कि आर्यभट के समय इसकी सूक्ष्म माप का कोई साधन नहीं था तथा अन्य ग्रहों की दूरी, मन्दोच्च गति, सौर मण्डल या ब्रह्माण्ड की माप असम्भव थे।
विभिन्न काल में इन मापों के अनुसार गणना के अनुसार ग्रहस्थिति जानने के जो सूत्र बने उनके अनुसार बाद में देखते हैं कि ग्रह उसी स्थान पर है या नहीं। यदि भूल हुयी तो माप या सूत्र में संशोधन करते हैं।


(३) मध्यम और स्पष्ट ग्रह-ग्रहों की दीर्घवृत्तीय कक्षा की गणना नहीं हो सकती है। वे प्रायः वृत्त हैं, अतः उनको पूर्ण वृत्त मान कर गणना करते हैं। इसमें ग्रह की गति समान होती है जिसे मध्यम गति कहते हैं। दीर्घवृत्तीय कक्षा के लिये, दो बार संशोधन होता है-पहले वृत्त का केन्द्र वहां हटाते हैं जहां दीर्घ वृत्त का केन्द्र होगा। फिर दीर्घवृत्त की गणना करते हैं। बाद के चित्रों से यह स्पष्ट होगा। दीर्घवृत्तीय कक्षा का स्थान जो दृश्य ग्रह का स्थान होता है, उसे स्पष्ट ग्रह कहते हैं। यह ठीक क्रान्तिवृत्त पर नहीं होगा, बल्कि उससे थोड़ा उत्तर या दक्षिण होगा, जितना उसका शर हो। उस स्थान से क्रान्तिवृत्त पर लम्ब स्पष्ट ग्रह का स्थान है।


(४) भूकेन्द्रित गणना-बहुत वर्षों तक निरर्थक शास्त्रार्थ चलता रहा कि भारत में भूकेन्द्रीय ग्रह कक्षा मानते थे या सूर्य केन्द्रित। इसी प्रकार का निरर्थक विवाद था कि वेद के समय लिपि थी या नहीं, यह विचार नहीं हुआ कि ६ दर्शनों के कारण ६ दर्श वाक् या लिपि थी। श्रुति के अनुसार स्मृति का यह अर्थ निकाला गया कि सुन कर वेद याद किया जाता था। श्रुति का अर्थ वेद है तथा स्मृति का अर्थ धर्मशास्त्र जैसे मनुस्मृति। ऋग्वेद सुनने पर मनुस्मृति कैसे कण्ठस्थ हो सकती है?
इसी प्रकार निरर्थक विवाद भूकेन्द्रीय कक्षा के विषय में है। आदि काल से अभी तक पृथ्वी से ही ग्रह नक्षत्रों को देख रहे हैं। ग्रह कक्षा सूर्य केन्द्रित है, पर सूर्य के केन्द्र या उसकी सतह पर जा कर देखना असम्भव है। अतः दृक् सिद्ध गणना का अर्थ है कि पृथ्वी से जिस स्थान पर ग्रह दीखते हैं, उसकी गणना।
(५) फलित ज्योतिष-ग्रह स्थिति के अनुसार मनुष्य पर जो प्रभाव पड़ता है, उसकी गणना। मनुष्य का सम्बन्ध सूर्य के साथ प्रकाश गति से है। वह १ मुहूर्त में ३ बार जाकर लौट आता है। उस रश्मि अनुसार सम्बन्ध पर चन्द्र तथा अन्य ग्रहों के कारण जो प्रभाव होता है, उसका उल्लेख, वेद, पुराण, उपनिषद्, ब्रह्म सूत्र आदि ग्रन्थों में विस्तार से है। सूर्य आत्मा जगतस्तथुषश्च (वाजसनेयी यजुर्वेद ७/४२)
तदेते श्लोका भवन्ति-अणुः पन्था विततः पुराणो मां स्पृष्टोऽनुवित्तो मयैव। तेन धीरा अपियन्ति ब्रह्मविदः स्वर्गं लोकमिव ऊर्ध्वं विमुक्ताः।८।
तस्मिञ्छुक्लमुत नीलमाहुः पिङ्गलं हरितं लोहितं च। एष पन्था ब्रह्मणा ह्यानुवित्तस्तेनैति ब्रह्मवित्पुण्यकृत्तैजसश्च॥ (बृहदारण्यक उपनिषद् ४/४/८,९)
अथ या एता हृदयस्य नाड्यस्ताः पिङ्गलाणिम्नस्तिष्ठन्ति शुक्लस्य नीलस्य पीतस्य लोहितस्येत्यसौ वा आदित्यः पिङ्गल एष शुक्ल एष नील एष लोहितः॥१॥ तद्यथा महापथ आतत उभौ ग्रामौ गच्छन्तीमं चामुं चामुष्मादित्यात्प्रतायन्ते ता आसु नाडीषु सृप्ता आभ्यो नाडीभ्यः प्रतायन्ते तेऽमुष्मिन्नादित्ये सृप्ताः॥२॥ ..... अथ यत्रैतदस्माच्छरीरादुत्क्रामति अथैतैरेव रश्मिभिरूर्ध्वमाक्रामते सओमिति वा होद्वामीयते स यावत्क्षिप्येन्मनस्तावदादित्यं गच्छत्यतद्वै खलु लोकद्वारं विदुषा प्रपदनं निरोधोऽवदुषाम् ॥५॥ (छान्दोग्य उपनिषद् ८/६/१,२,५)
ब्रह्मसूत्र (४/२/१७-२०)-१-तदोकोऽग्रज्वलनं तत्प्रकाशितद्वारो विद्यासामर्थ्यात्तच्छेषगत्यनुस्मृतियोगाच्च हार्दानुगृहीतः शताधिकया।
२. रश्म्यनुसारी। ३. निशि नेति चेन सम्बन्धस्य यावद्देहभावित्वाद्दर्शयति च। ४. अतश्चायनेऽपि दक्षिणे।
रूपं रूपं मघवाबोभवीति मायाः कृण्वानस्तन्वं परि स्वाम्। 
त्रिर्यद्दिवः परिमुहूर्त्तमागात् स्वैर्मन्त्रैरनृतुपा ऋतावा॥(ऋग्वेद ३/५३/८)
त्रिर्ह वा एष (मघवा=इन्द्रः, आदित्यः = सौर प्राणः) एतस्या मुहूर्त्तस्येमां पृथिवीं समन्तः पर्य्येति। (जैमिनीय ब्राह्मण उपनिषद् १/४४/९)
वाजसनेयी यजुर्वेद, अध्याय १५-अयं पुरो हरिकेशः सूर्यरश्मिस्तस्य रथगृत्सश्च रथौजाश्च सेनानीग्रामण्यौ। पुञ्जिकस्थला च क्रतुस्थला चाप्सरसौ दृङ्क्ष्णवः पशवो हेतिः पौरुषेयो वधः प्रहेतिस्तेभ्यो नमो अस्तु ते नोऽवन्तु ते नो मृडयन्तु ते यं द्विष्मो यश्च नो द्वेष्टि तमेषां जम्भे दध्मः॥१५॥ अयं दक्षिणा विश्वकर्मा तस्य रथस्वनश्च रथेचित्रश्च सेनानी ग्रामण्यौ। मेनका च सहजन्या चाप्सरसौ यातुधाना हेती रक्षांसि प्रहेतिस्तेभ्यो नमो अस्तु ते नोऽवन्तु ते नो मृडयन्तु ते यं द्विष्मो यश्च नो द्वेष्टि तमेषां जम्भे दध्मः॥१६॥ अयं पश्चाद्विश्वव्यचास्तस्य रथप्रोतश्चासमरथश्च  सेनानी ग्रामण्यौ। प्रम्लोचन्ती चानुम्लोचन्ती चाप्सरसौ व्याघ्रा हेतिः सर्पाः प्रहेतिस्तेभ्यो नमो अस्तु ते नोऽवन्तु ते नो मृडयन्तु ते यं द्विष्मो यश्च नो द्वेष्टि तमेषां जम्भे दध्मः॥१७॥  अयमुत्तरात् संयद्वसुस्तस्य तार्क्ष्यश्चारिष्टनेमिश्च सेनानी ग्रामण्यौ। विश्वाची च घृताची चाप्सरसावापो हेतिर्वातः  प्रहेतिस्तेभ्यो नमो अस्तु ते नोऽवन्तु ते नो मृडयन्तु ते यं द्विष्मो यश्च नो द्वेष्टि तमेषां जम्भे दध्मः॥१८॥ अयमुपर्यर्वाग्वसुस्तस्य सेनजिच्च सुषेणश्च सेनानी ग्रामण्यौ। उर्वशी च पूर्वचित्तिश्चाप्सरसाववस्फूर्जन् हेतिर्विद्युत् प्रहेतिस्तेभ्यो नमो अस्तु ते नोऽवन्तु ते नो मृडयन्तु ते यं द्विष्मो यश्च नो द्वेष्टि तमेषां जम्भे दध्मः॥१९॥ 
अध्याय १७-सूर्यरश्मिर्हरिकेशः पुरस्तात् सविता ज्योतिरुदयाँ अजस्रम्। तस्य पूषा प्रसवे याति विद्वान्त्सम्पश्यन्विश्वा भुवनानि गोपाः॥५८॥
अध्याय १८-सुषुम्णः सूर्यरश्मिश्चन्द्रमा गन्धर्वस्तस्य नक्षत्राण्यप्सरसो भेकुरयो नाम। 
स न इदं ब्रह्म क्षत्रं पातु तस्मै स्वाहा वाट् ताभ्यः स्वाहा॥४०॥
कूर्म पुराण, पूर्वविभाग, अध्याय ४१-
तस्य ये रश्मयो विप्राः सर्वलोक प्रदीपकाः। तेषां श्रेष्ठाः पुनः सप्त रश्मयो ग्रहयोनयः॥२॥
सुषुम्नो हरिकेशश्च विश्वकर्मा तथैव च। विश्वव्यचाः पुनश्चान्यः संयद्वसुरतः परः॥३॥
अर्वावसुरिति ख्यातः स्वराडन्यः प्रकीर्तितः। सुषुम्नः सूर्यरश्मिस्तु पुष्णाति शिशिरद्युतिम्॥४॥
तिर्यगूर्ध्वप्रचारोऽसौ सुषुम्नः परिपठ्यते। हरिकेशस्तु यः प्रोक्तो रश्मिर्नक्षत्र पोषकः॥५॥
विश्वकर्मा तथा रश्मिर्बुधं पुष्णाति सर्वदा। विश्वव्यचास्तु यो रश्मिः शुक्रं पुष्णाति नित्यदा॥६॥
संयद्वसुरिति ख्यातः स पुष्णाति च लोहितम्। बृहस्पतिं प्रपुष्णाति रश्मिरर्वावसुः प्रभोः। 
शनैश्चरं प्रपुष्णाति सप्तमस्तु सुराट् तथा॥७॥
एवं सूर्य प्रभावेण सर्वा नक्षत्रतारकाः। वर्धन्ते वर्धिता नित्यं नित्यमाप्याययन्ति च॥८॥
मत्स्य पुराण, अध्याय १२८-सुषुम्ना सूर्यरश्मिर्या क्षीणम् शशिनमेधते। हरिकेशः पुरस्तात्तु यो वै नक्षत्रयोनिकृत्॥२९॥
दक्षिणे विश्वकर्मा तु रश्मिराप्याययद् बुधम्। विश्वावसुश्च यः पश्चाच्छुक्रयोनिश्च स स्मृतः॥३०॥
संवर्धनस्तु यो रश्मिः स योनिर्लोहितस्य च। षष्ठस्तु ह्यश्वभू रश्मिर्योनिः सा हि बृहस्पतेः॥३१॥
शनैश्चरं पुनश्चापि रश्मिराप्यायते सुराट्। न क्षीयन्ते यतस्तानि तस्मान्नक्षत्रता स्मृता॥३२॥
क्षेत्राण्येतानि वै सूर्यमातपन्ति गभस्तिभिः। क्षेत्राणि तेषामादत्ते सूर्यो नक्षत्रता ततः॥३३॥
ब्रह्माण्ड पुराण, पूर्व भाग, अध्याय२४-
रवे रश्मि सहस्रं यत् प्राङ् मया समुदाहृतम्। तेषां श्रेष्ठाः पुनः सप्त रश्मयो ग्रह-योनयः॥६५॥
सुषुम्णो-हरिकेशश्च-विश्वकर्मा तथैव च। विश्वश्रवाः पुनश्चान्यः संपद्-वसुरतः परः॥६६॥
अर्वावसुः पुनश्चान्यः स्वराडन्यः प्रकीर्त्तितः। सुषुम्णः सूर्य-रश्मिस्तु क्षीण शशिन-मेधयेत्॥६७॥
तिर्यगूर्ध्व प्रचारोऽसौ सुषुम्णः परिकीर्त्तितः। हरिकेशः पुरस्ताद्य ऋक्ष-योनिः स कीर्त्यते॥६८॥
दक्षिणे विश्वकर्मा तु रश्मिन् वर्द्धयते बुधम्। विश्वश्रवास्तु यः पश्चाच्छुक्र-योनिः स्मृतो बुधैः॥६९॥
सम्पद् वसुस्तु यो रश्मिः स योनि-र्लोहितस्य तु। षष्ठ-स्त्वर्व्वावसू रश्मि-र्योनिस्तु स बृहस्पतेः॥७०॥
शनैश्चरं पुनश्चापि रश्मि-राप्यायते स्वराट्। एवं सूर्य प्रभावेण ग्रह-नक्षत्र-तारकाः॥७१॥
वर्त्तन्ते दिविताः सर्वा विश्वं चेदं पुन-र्जगत्। न क्षीयन्ते यतस्तानि तस्मा-न्नक्षत्र संज्ञिताः॥७२॥
क्षेत्राण्येतानि वै पूर्व-मातपन्ति गभस्तिभिः। तेषां क्षेत्राण्य-थादत्ते सूर्यो नक्षत्र कारकाः॥७३॥
इस विषय की व्याख्या कई प्रकार से नीचे दी जाती है।
१. मापों का आधार-अभी उपलब्ध सभी ज्योतिष १ कल्प में ग्रह भगण (परिक्रमा) संख्या देते हैं, पर इस की माप कैसे हुई इसके विषय में कुछ नहीं कहा है। ग्रह-गति तथा उनकी दूरी की माप बहुत सूक्ष्म है, पर यह कब और कैसे हुआ, इसका कोई संकेत नहीं है। स्पष्टतः महाभारत युद्ध के बाद विश्व सभ्यता नष्ट हुई थी अतः विभिन्न विषयों को सुरक्षित करने का कार्य शुरु हुआ। नैमिषारण्य में शौनक की महाशाला में यह कार्य प्रायः ३०० वर्षों तक चला। स्वयं वेद व्यास ने अपने शिष्यों को वेद शाखायें विभाजित कर उनके अध्ययन का दायित्व सौंपा। कुछ लोगों की धारणा है कि ध्यान या यज्ञ द्वारा ज्योतिष गणनायें की गयीं। यदि यह सम्भव है तो इन लोगों को ऐसी कोई भी छोटी गणना उदाहरण के लिये कर के दिखानी चाहिये। इस कल्पना में कई भूल धारणा तथा कल्पना हैं-(१) वेद के विषय में ठीक धारणा नहीं है, केवल पाश्चात्य विचारों की नकल है। सुभाष काक ने अपनी पुस्तक-ऋग्वेद में ज्योतिषीय माप-में यज्ञ वेदी तथा मन्त्र सूक्तों की संख्या के आधार पर ग्रह गति के विषय में बहुत सी कल्पना की है। मूल वेद ऋग्वेद नहीं, अथर्व वेद था, जिसका २ भाग परा और अपरा विद्या थी। अपरा से ४ वेद तथा ६ अङ्ग हुये। इन्ही अङ्गों में ज्योतिष है, उसमें यह नहीं लिखा है कि यह वेद के मन्त्र या सूक्तों की संख्या है। ऋग्वेद के विषय में ये कल्पनायें मन्त्रों के ऋषि, देवता, विनियोग आदि के विरुद्ध हैं। (२) वेद मन्त्र केवल ज्योतिषीय माप की कूट संख्या नहीं है-इनके आधिदैविक, आधिभौतिक तथा आध्यात्मिक-३ प्रकार के अर्थ हैं। अन्य मत से ५ प्रकार के अर्थ होंगे। (३) वेद कई युगों तथा स्थानों के ऋषियों के मन्त्र हैं-ये सभी एक ही कूट द्वारा मन्त्र नहीं कहेंगे। ग्रहों की स्थिति तथा गति भी दीर्घकाल में बदलती है। आज की गणना के अनुसार सुभाष काक की कल्पनायें सही नहीं हैं। (४) दीर्घ काल तक ग्रह देखने से ही उनकी गति नहीं ज्ञात होगी, उसके लिये सूक्ष्म यन्त्र तथा प्रयोग विधि जाननी होगी। (५) ५ या १० हजार वर्षों तक के माप एक व्यक्ति द्वारा सुरक्षित नहीं हो सकते। इसके लिये १०००० वर्षों तक एक लिपि, एक भाषा तथा संग्रह के लिये पुस्तकालय और उसको चलाने के लिये स्थायी शासन व्यवस्था होनी चाहिये। पर ये अर्ध-वैज्ञानिक लेखक मानते हैं कि महाभारत ४ शताब्दी ईसा पूर्व का है, वैदिक काल में लिपि नहीं थी, भारतीय सभ्यता केवल १५०० ई.पू. से शुरु हुई। (६) सबसे मुख्य भूल है कि यज्ञ का अर्थ समझे बिना तरह तरह की कल्पनायें होने लगतीं हैं। जब तक नार्लीकर आदि वैज्ञानिक पाश्चात्य ज्योतिष की बात करते हैं, उसे गणित और प्रयोग पर आधारित बताते हैं। पर भारतीय ज्योतिष की चर्चा होते ही उनका सम्पूर्ण ज्ञान लुप्त हो जाता है। उनकी कल्पना है कि यज्ञ में पशु बलि देकर ग्रहों की दूरी आदि मापी गयी थी। यज्ञ का अर्थ पशु बलि नहीं है। यह चक्रीय क्रम में उपयोगी वस्तु का उत्पादन है। क्या ज्ञान यज्ञ, तपो यज्ञ आदि भी पशु हत्या द्वारा हो सकती है? उसके प्रारूप के लिये जो वेदी बनती है या मन्दिर बनते हैं, वे विश्व के प्रतिरूप हैं।
२. वर्तमान पुस्तकें-आज हमारे पास जो भी पुस्तक है, उनमें प्राचीन ज्ञान सुरक्षित रखने के लिये श्लोक बद्ध किया गया है। इनमें से कोई भी गणित या विज्ञान की पाठ्य-पुस्तक नहीं है। प्राचीन भगण गणनाओं, बीज परम्परा आदि की नकल कर उसके आधार पर गणित करने की विधियां खोजी गयी हैं। बीज संस्कार की विधि में भास्कराचार्य ने स्पष्ट लिखा है कि इसमें केवल आगम (प्राचीन परम्परा) ही प्रमाण है, उसकी कोइ व्याख्या करने में असमर्थ हैं। इन संख्याओं पर आधारित गणनाओं में जब कोई त्रुटि दीखती है, तो लेखक भगण संख्या में थोड़ा परिवर्तन कर वास्तविक ग्रह स्थिति लाने की चेष्टा करते हैं। यह अपूर्ण ज्ञान के कारण केवल अनुमान पर आधारित है। कई बार यह स्पष्ट नहीं है कि त्रुटि क्यों हो रही है-मूल गणना में त्रुटि या स्थूलता, गति में दीर्घकालिक परिवर्तन, सिद्धान्त में भूल या गणना पद्धति में त्रुटि। अतः भास्कराचार्य ने चन्द्र गति में त्रुटि देख कर उसे संशोधित किया पर उससे और अधिक भूल हो गयी।
३. मापों का सम्भावित काल-महाभारत युद्ध के बाद भारत का कोई भी सम्पर्क अमेरिका से नहीं था या आर्य्भट वराहमिहिर आदि कोई भी ध्रुव प्रदेशों में नहीं गये थे। किस आधार पर उन्हों ने उज्जैन से ९०० अंश पूर्व या पश्चिम के स्थानों, १८०० अंश पूर्व के स्थान का वर्णन किया है। सिद्धपुर आदि कोई भी नगर उस काल में नहीं थे न विषुव वृत्तीय लङ्का। उत्तरी ध्रुव जल भाग तथा दक्षिणी ध्रुव स्थल पर लिखा गया है। इन स्थानों पर जाना भी उनके लिये असम्भव था, माप बहुत दूर की बात है।
जहां कहीं ज्या सारणियों का जिक्र आने लगता है, पिंगरी आदि पाचात्य या नारलीकर जैसे अंग्रेज भक्त कहने लगते हैं कि यह ग्रीक सारणी की नकल है। आज तक किसी ग्रीक ने कोई भी गणितीय सारणी नहीं बनायी, क्योंकि यह रोमन संख्याओं द्वारा नहीं बनाया जा सकता है। इन वैज्ञानिकों ने न कोई ऐसी सारणी देखी है न रोमन अंकों द्वारा बनाने की चेष्टा की है। 
ज्योतिषीय माप का मुख्य आधार है पृथ्वी के दो दूरवर्त्ती स्थानों से एक साथ चन्द्रमा को देखना। चन्द्र की दिशा में जो कोणीय अन्तर होगा, उससे दूरी को भाग देने पर चन्द्र की दूरी मिलेगी। इसके लिये उन दोनों स्थानों की शुद्ध माप चाहिये। इनके लिये दोनों स्थानों तथा उनके बीच के मुख्य स्थानों का अक्षांश, देशान्तर तथा उनकी दिशा निकालनी होगी। फिर एक साथ माप करने के लिये एक ही स्थान के समय से घड़ी मिलानी होगी। इनकी माप (Map) के लिये पुनः नक्षत्रों, सूर्य की छाया आदि देखनी होगी। आज तक किसी ग्रीक या यूरोपीय ने कोलम्बस की यात्रा तक ऐसी कोई भी माप नहीं की थी। कोलम्बस की यात्रा का आधार था तुर्की नौसेना का एक पुराना नक्शा जिसमें दोनों अमेरिका, तथा अण्टार्कटिका भी दिखाया गया था। तारा ग्रहों की दूरी, ब्रह्माण्ड की माप तथा उनकी संख्या आदि के लिये और भी सूक्ष्म माप की जरूरत है जो अभी तक उपलब्ध नहीं है। 
पृथ्वी के नक्शे से ही सम्बन्धित भूगर्भ के खनिजों का सन्धान है। मणिजा युग में खनिज निकाले जाते थे। इस सभ्यता के ३०,००० ई.पू. के जल प्रलय में लोप होने पर राजा पृथु (१७,०५० ई.पू.) में पूरी पृथ्वी में खनिजों की खोज की। इसके लिये स्पष्टतः पूरी पृथ्वी को खोदा नहीं जा सकता है। सूक्ष्म नक्शा के अतिरिक्त रसायन विज्ञान, भूगर्भ शास्त्र तथा दूर-संवेदन की जरूरत है। भागवत पुराण में सौर-मण्डल की ग्रह कक्षाओं से बने क्षेत्र को ७ द्वीपों का नाम दिया गया है तथा उनके बीच के क्षेत्रों को समुद्र कहा है। इन सागरों को प्रियव्रत के रथ से बना हुआ लिखा है। अतः स्वायम्भुव मनु के पुत्र प्रियव्रत काल (प्रायः २९,००० ई.पू.) में इनकी माप हो चुकी थी। स्वायम्भुव मनु से कलि आरम्भ तक २६,००० वर्षों का मन्वन्तर (ऐतिहासिक) कहा गया है। यह पृथ्वी के अक्ष की कोणीय गति है, जिसकी गणना २९००० ई.पू. में हो चुकी थी।
भागवत पुराण (५/१)-भगवानपि मनुना यथावदुपकल्पितापचितिः प्रियव्रत... अभिसमीक्ष्य प्रवर्तयन्नगमत्॥२१॥ समजवेन रथेन ज्योतिर्मयेन रजनीमपि दिनं करिष्यामीति सप्तकृत्वस्तरणिमनुपर्यक्रमाद् द्वितीय इव पतङ्गः॥३०॥ ये वा उ ह तद्रथ चरणनेमिकृत परिखातास्ते सप्त सिन्धव आसन् यत एव कृताः सप्त भुवो द्वीपाः॥३१॥ जम्बू-प्लक्ष-शाल्मलि-कुश-क्रौञ्च-शाक-पुष्कर संज्ञास्तेषां परिमाणं पूर्वस्मात्पूर्वस्मादुत्तर उत्तरो यथासंख्यं द्विगुणमानेन बहिः समन्तत उपक्लृप्ताः॥३२॥ 
ब्रह्माण्ड पुराण (१/२/९)-स वै स्वायम्भुवः पूर्वम् पुरुषो मनुरुच्यते॥३‌६॥ तस्यैक सप्तति युगं मन्वन्तरमिहोच्यते॥३७॥
ब्रह्माण्ड पुराण (१/२/२९)-त्रीणि वर्ष शतान्येव षष्टिवर्षाणि यानि तु। दिव्यः संवत्सरो ह्येष मानुषेण प्रकीर्त्तितः॥१६॥
त्रीणि वर्ष सहस्राणि मानुषाणि प्रमाणतः। त्रिंशदन्यानि वर्षाणि मतः सप्तर्षिवत्सरः॥१७॥
षड्विंशति सहस्राणि वर्षाणि मानुषाणि तु। वर्षाणां युगं ज्ञेयं दिव्यो ह्येष विधिः स्मृतः॥१९॥
मत्स्य पुराण अध्याय २७३-अष्टाविंश समाख्याता गता वैवस्वतेऽन्तरे। एते देवगणैः सार्धं शिष्टा ये तान् निबोधत॥७६॥
चत्वारिंशत् त्रयश्चैव भविष्यास्ते महात्मनः। अवशिष्टा युगाख्यास्ते ततो वैवस्वतो ह्ययम्॥७७॥
उसी काल में महाद्वीपों का विभाजन हुआ जहां स्वायम्भुव मनु के पुत्रों को राज्य दिया गया। पूरे विश्व में एक ही व्यक्ति का शान्तिपूर्ण शासन था, यह सम्भव नहीं लगता। यह वर्तमान काल के संयुक्त राष्ट्र संघ जैसा संघ रहा होगा। किन्त् उस काल में इन्द्र, वरुण, यम, सोम की पुरियों की सूक्ष्म माप हो चुकी थी जो परस्पर ९०० की दूरी पर थे।
विष्णु पुराण (२/८)-मानसोत्तरशैलस्य पूर्वतो वासवी पुरी। 
दक्षिणे तु यमस्यान्या प्रतीच्यां वारुणस्य च। उत्तरेण च सोमस्य तासां नामानि मे शृणु॥८॥
वस्वौकसारा शक्रस्य याम्या संयमनी तथा। पुरी सुखा जलेशस्य सोमस्य च विभावरी।९।
शक्रादीनां पुरे तिष्ठन् स्पृशत्येष पुरत्रयम्। विकोणौ द्वौ विकोणस्थस्त्रीन् कोणान्द्वे पुरे तथा।॥१६॥
उदितो वर्द्धमानाभिरामध्याह्नात्तपन् रविः। ततः परं ह्रसन्तीभिर्गोभिरस्तं नियच्छति॥१७॥ 
७ लोकों का नाम या कल्पना तभी हो सकती है, जब ब्रह्माण्ड के आकार तथा रचना का ज्ञान हो। इसी के अनुरूप पृथ्वी पर भी ७ लोकों तथा ७ तलों की कल्पना की गयी।
ब्रह्माण्ड पुराण उपसंहार पाद, अध्याय २ (३/४/२)-
लोकाख्यानि तु यानि स्युर्येषां तिष्ठन्ति मानवाः॥८॥ भूरादयस्तु सत्यान्ताः सप्तलोकाः कृतास्त्विह॥९॥
पृथिवीचान्तरिक्षं च दिव्यं यच्च महत् स्मृतम्। स्थानान्येतानि चत्वारि स्मृतान्यावर्णकानि च॥११॥
जनस्तपश्च सत्यं च स्थान्यान्येतानि त्रीणि तु। एकान्तिकानि तानि स्युस्तिष्ठंतीहाप्रसंयमात्॥१३॥
भूर्लोकः प्रथमस्तेषां द्वितीयस्तु भुवः स्मृतः।१४॥ 
स्वस्तृतीयस्तु विज्ञेयश्चतुर्थो वै महः स्मृतः जनस्तु पञ्चमो लोकस्तपः षष्ठो विभाव्यते॥१५॥
सत्यस्तु सप्तमो लोको निरालोकस्ततः परम्।१६। महेति व्याहृतेनैव महर्लोकस्ततोऽभवत्॥२१॥
यामादयो गणाः सर्वे महर्लोक निवासिनः।५१॥
ब्रह्माण्ड पुराण (१/२/२०)-परस्परैः सोपचिता भूमिश्चैव निबोधत॥९॥ 
स्थितिरेषा तु विख्याता सप्तमेऽस्मिन् रसातले। दशयोजन साहस्रमेकं भौमं रसातलम्॥१०॥
प्रथमः तत्वलं नाम सुतलं तु ततः परम्॥११॥ 
ततस्तलातलं विद्यादतलं बहुविस्तृतम्। ततोऽर्वाक् च तलं नाम परतश्च रसातलम्॥१२॥
एतेषमप्यधो भागे पातालं सप्तमं स्मृतम्।
४. कल्प भगण-कल्प भगण जानने के लिये ग्रह गति की सूक्ष्म माप जरूरी है। इसके अतिरिक्त कल्प का ज्ञान होना भी आवश्यक है। पुराणों में सृष्टि के निर्माण तथा विनाश के चक्र को ही कल्प कहा गया है, निर्माण दिन है, विनाश रात्रि। आधुनिक ज्योतिष में इस का सटीक निर्धारण नहीं हो पाया है। इसके प्रायः २० प्रकार के अनुमान ८ से २० अरब वर्ष तक के हैं। अभी यह निश्चित नहीं है कि सृष्टि का फैलाव इसी प्रकार चलता रहेगा, या यह कभी बन्द हो कर संकोच होना शुरु होगा। प्राचीन काल में भी कई अनुमान रहे होंगे पर गणना में सुविधा के लिये इसे ८६४ कोटि वर्ष माना गया होगा। इसके दिन और रात्रि भाग ठीक १००० युगों के बराबर हैं।
युग निर्धारण भी एक चमत्कार है। शनि कक्षा (सूर्य से १००० सूर्य व्यास दूरी तक) के ग्रहों का पूर्ण चक्र इस काल में होता है। अतः भास्कराचार्य ने यह कल्पना की है कि ग्रहों का भगण काल निकाल कर देखा गया कि कितने समय में सभी के पूर्ण चक्र होंगे। उस अवधि को ही युग कहा गया है।
ऐतिहासिक युग ध्रुवीय हिम के विस्तार और संकोच का चक्र है। इसके २ भाग १२-१२ हजार वर्षों के हैं, जो ज्योतिषीय युग का ठीक ३६० भाग है। 
५. गुरुत्वाकर्षण के कारण गति-कल्प भगण देने का अर्थ है कि सौरमण्डल के ग्रह प्रायः २ अरब वर्षों से इसी प्रकार की कक्षा में चल रहे हैं। विश्व की सभी वस्तु एक दूसरे को आकर्षित करती हैं, जिसको गुरुत्व-आकर्षण कहते हैं। पृथ्वी यदि सूर्य से आकर्षित है तो यह सूर्य में क्यों नहीं मिलती? इस का कारण है कि वृत्त में घूमने के कारण पृथ्वी पर केन्द्रापसारी बल लग रहा है, जो सूर्य के गुरुत्वाकर्षण के बराबर है।
    (क) उत्क्रम वर्ग नियम-प्रकाश की तीव्रता या गुरुत्व बल-दोनों दूरी के साथ घटते जाते हैं। उनकी तीव्रता केन्द्र से दूरी के वर्ग के विपरीत अनुपात में होती है। जैसे नीचे के चित्र में सूर्य प्रकाश की तीव्रता दिखाई गयी है। सूर्य केन्द्र से r दूरी पर प्रकाश जब पहुंचेगा, तो सभी दिशाओं में एक गति होने के कारण उसकी स्थिति r त्रिज्या के गोल पृष्ठ पर होगी। इस पृष्ठ का क्षेत्रफल 4 है, अतः वहां प्रति इकाई क्षेत्र पर प्रकाश की तीव्रता  होगी । कुछ समय बाद जब थोड़ा अधिक दूर पहुंचेगा, तो वह r1 त्रिज्या के गोल पृष्ठ पर होगा। वहां उसकी  तीव्रता होगी। अतः प्रकाश की तीव्रता  के अनुपात में घटती जायेगी। 

इसी प्रकार गुरुत्व का प्रभाव भी हर दिशा में एक गति से जाता है और  अनुपात में कम होता जायेगा। सापेक्षवाद सिद्धान्त के पूर्व माना जाता था कि गुरुत्व प्रभाव उसी क्षण पहुंचता है। सामान्य सापेक्षवाद में माना जाता है कि यह प्रभाव भी प्रकाश की गति से चलता है-प्रायः ३ लाख किलोमीटर प्रति सेकण्ड। 
(ख) वृत्ताकार कक्षा-नीचे के चित्र में सूर्य की परिक्रमा में पृथ्वी या पृथ्वी परिक्रमा करने वाले चन्द्र की स्थिरता दिखाई गयी है। पृथ्वी की वृत्तीय (प्रायः) कक्षा के सभी विन्दु सूर्य से समान दूरी पर हैं। वहां गुरुत्वाकर्षण बल सूर्य की दिशा में होगा। यदि पृथ्वी में गति नहीं होती तो सूर्य आकर्षण के कारण वह सूर्य दिशा में बढ़ते हुये वेग से मिल जाता। पृथ्वी की गति के कारण सूर्य से दूर की दिशा में बल लग रहा है, जो गुरुत्व आकर्षण के बराबर है। यदि पृथ्वी की गति दिखाये गये स्थान पर वैसी ही होती तो पृथ्वी उसी गति से अपनी दिशा में चलती जाती। सूर्य के आकर्षण के कारण हर विन्दु पर गति दिशा सूर्य की तरफ मुड़ती है और अन्ततः वृत्ताकार कक्षा हो जाती है।  


(ग) ग्रह कक्षायें-ग्रह कक्षायें प्रायः वृत्ताकार हैं। वृत्त की परिभाषा है कि उसकी परिधि के सभी विन्दु केन्द्र से समान दूरी पर हैं। अर्थात् किसी केन्द्र विन्दु से सदा समान दूरी पर कोई कण चलेगा, तो  उसका गति-पथ वृत्त (परिधि) होगा। ग्रह कक्षायें पूरी तरह वृत्ताकार नहीं हैं। वृत्त को किसी दिशा में लम्बा खींचने से वह दीर्घ वृत्त बनता है। दो विन्दुओं न१,  न२ से किसी कण की दूरियों का योग समान रहे तो उसका गति-पथ दीर्घ वृत्त होगा। न१ , न२ को नाभि कहते हैं। उनको मिलाने वाली रेखा को परिधि तक बढ़ाया जाय को वह दीर्घ (वृहत्) अक्ष ख१ख२ होगा। यह दीर्घवृत्त की सबसे अधिक मोटाई है।  दोनों नाभि न१, न२ का मध्यविन्दु केन्द्र क है। क से  लम्ब रेखा परिधि तक बढ़ाने पर ग१ग२ लघुअक्ष होगा, जो दीर्घवृत्त की सबसे कम मोटाई है। गुरुत्व क्षेत्र में परिक्रमा करने वाला कोई भी पिण्ड दीर्घवृत्त में ही चलेगा, जिसका एक विशेष रूप वृत्त है, जिसमें दोनों अक्ष बराबर हैं।  यदि यह दीर्घ वृत्त पृथ्वी का मार्ग मानें, तो सूर्य इसके केन्द्र में नहीं, बल्कि किसी नाभि जैसे न१ पर होगा। न१ से दीर्घ-अक्ष पर निकट विन्दु ख१ सूर्य से सबसे अधिक निकट होगा। दीर्घ अक्ष की दूसरी दिशा में ख२ सूर्य से सबसे अधिक दूरी का विन्दु है, जिसे मन्दोच्च कहते हैं। यह विन्दु सबसे दूर होने से यहां गुरुत्व बल सबसे कम है अतः उसको सन्तुलित करने वाली गति भी सबसे कम होगी। यह सबसे उच्च (दूर) तथा मन्द गति होने के कारण मन्दोच्च कहलाता है।


सामान्य गति विज्ञान के अनुसार गुरुत्वाकर्षण के कारण जो दीर्घ वृत्तीय कक्षा होगी उसका दीर्घ या लघु अक्ष सदा एक ही दिशा में होंगे। पर सापेक्षवाद के अनुसार सूर्य का आकर्षण प्रकाश की गति से पहुंचता है। सूर्य से पृथ्वी पर प्रकाश आने में प्रायः ८ मिनट लगता है। यदि पृथ्वी ग१ख२ दिशा में चल रही है, तो ख१ पर स्थित पृथ्वी पर जो आकर्षण बल लगेगा वह ख२ से ८ मिनट पूर्व स्थान के अनुसार होगा। यह ख२ से पूर्व तथा थोड़ा अधिक होगा अतः अगले चक्र में मन्दोच्च का स्थान थोड़ा आगे ग२ दिशा में चला जायेगा। 


(६) शङ्कु-छेद(conic sections)-गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में ३ प्रकार की गति हो सकती है-(१) यदि गति के कारण केन्द्रापसारी बल गुरुत्वाकर्षण से कम है, तो वस्तु सूर्य के निकट की कक्षा में आयेगी। बहुत कम होने पर वह सूर्य में मिल जायेगा। (२) यदि दोनों बल बराबर हैं, तो वृत्ताकार (circle) कक्षा होगी। गति गुरुत्व बल से अधिक होने पर वह सूर्य से दूर हट जायेगा और कक्षा दीर्घ वृत्त (Ellipse) आकार का होगा। (३) गति बहुत अधिक होने पर दीर्घ वृत्त का दीर्घ अक्ष प्रायः अनन्त दूरी तक जायेगा, जिसे परवलय (Parabola) कहते हैं। धूमकेतुओं की कक्षा प्रायः ऐसी ही है। सूर्य के आकर्षण क्षेत्र से बाहर जाने पर उसकी गति अति-परवलय (Hyperbola) आकार में होगी। 
ये सभी कक्षा शङ्कु को समतल द्वारा काटने से बनते हैं। किसी स्थिर रेखा (शङ्कु का अक्ष) से एक स्थिर कोण पर परिक्रमा करने वाली रेखा से जो क्षेत्र बनता है उसे, शंकु कहते हैं। दोनों रेखाओं का मिलन विन्दु शंकु का शीर्ष हुआ, स्थिर रेखा उसका अक्ष तथा अक्ष पर लम्ब रूप तल से कटा क्षेत्र उसका वृत्तीय आधार है। आधार तथा शीर्ष के बीच के भाग को ही शंकु कहा जाता है, पर गणित के अनुसार शंकु शीर्ष के दोनों दिशाओं में अनन्त दूरी तक फैला हुआ है। अक्ष पर लम्ब तल से कटा क्षेत्र वृत्त है, थोड़ा झुके तल से कटा क्षेत्र दीर्घ वृत्त है। परिक्रमा करने वाली रेखा के समान्तर तल द्वारा कटा क्षेत्र परवलय है। अक्ष के समान्तर तल शंकु को शीर्ष के दोनों तरफ काटता है, वह अतिपरवलय है। 
(क) शंकु छेद (Conic Section) की परिभाषा-शंकु छेद या शांकव उस विन्दु का गति-पथ है जिसकी विदु न से दूरी तथा उससे अलग रेखा ल की दूरी का अनुपात धन संख्या च (च्युति = ) है। रेखा ल को नियामक (Directrix) तथा विन्दु न को नाभि कहते हैं। रैखिक च्युति केन्द्र से नाभि तक की दूरी है। गणित में, किसी लम्ब वृत्तीय शंकु की एक समतल द्वारा परिच्छेद करने से प्राप्त वक्रों (curves) को शांकव (conic section) कहते हैं।
शांकव की एक अन्य परिभाषा के अनुसार शांकव (समतल मे) किसी ऐसे चर बिन्दु का बिन्दुपथ है जिसकी एक निर्धारित बिन्दु एवं एक निर्धारित रेखा से दूरियोँ का अनुपात हमेशा स्थिर (अच‍र) रहता है। इस परिभाषा का प्रयोग कर किसी भी निर्देशांक पद्धति‎ मे शांकव को एक गणितीय समीकरण के रूप मे प्राप्त कर सकते हैं।
(ख) शांकव के अवयव-यदि कोई बिंदु इस प्रकार से गमन करता है कि उसकी एक स्थिर बिंदु से दूरी तथा उसकी एक स्थिर सरल रेखा से दूरी का अनुपात सदैव एक अचर संख्या (Constant) हो, तो उस बिंदु के बिन्दुपथ को एक शंकु परिच्छेद कहते हैं ।
नाभि- शांकव की परिभाषा मे प्रयुक्त एक निश्चित बिन्दु शांकव की नाभि (फोकस) कहलाता है ।
नियता- शांकव की परिभाषा मे प्रयुक्त एक निश्चित रेखा शांकव की नियता कहलाती है।
उत्केन्द्रता-शांकव की परिभाषा मे प्रयोग किया गया निश्चित अनुपात ही को उत्केन्द्रता कह्ते हैं। इसे e से दर्शाते हैं।
e = (चर बिन्दु की नाभि से दूरी) / (चर बिन्दु की नियता से दूरी)
अक्ष-शांकव की नियता के लंबवत व नाभि (फोकस) से जाने वाली रेखा अक्ष होती है'
शीर्ष-शांकव की अक्ष जिस बिन्दु पर वक्र को काटती है वह बिन्दु,
शीर्ष पर स्पर्शी- शांकव अक्ष के लंबवत शीर्ष से जाने वाली स्पर्श रेखा, शांकवों के विभिन्न रूपसमतल और लम्ब वृत्तीय शंकु का परिच्छेद से प्राप्त वक्र का स्वरूप इस बात पर निर्भर करता है कि समतल, शंकु को किस प्रकार काटता है। शांकव के अंतर्गत निम्नलिखित वक्र आते हैं:
वृत्त (circle) : e = 0
दीर्घवृत्त (ellipse) : 0 < e < 1
 परवलय (parabola) : e =1
अति परवलय (hyperbola) : e >1
रेखा-युग्म (pair of straight lines) 
शांकव
समीकरण
उत्केन्द्रता (e)
रैखिक उत्केन्द्रता (c)
Semi latus rectum (l)
Focal parameter

वृत्त
x2+y2 = a2
0
0
a


दीर्घवृत्त
 +  = 1





परवलय
y2 = 4ax
1
a
2a
2a

अतिपरवलय
 -  = 1






     
(७) सौर कक्षाओं की माप-

बुध
शुक्र 
पृथ्वी
मंगल
बृहस्पति
शनि
यूरेनस
नेपचून

सूर्य से दूरी कि.मी. (दीर्घ अक्ष का आधा)
५,७९,०९,२२७
१०,८२,०९,४७५
१४,९५,९८,२६२
२२,७९,४३,८२४
७७,८३,४०,८२१
१,४२,६६,६६,४२२
२,८७,०६,५८,१८६
४,४९,८३,९६,४४१

मध्यम विषुव त्रिज्या कि.मी./पृथ्वी तुलना में
२,४२३९.७
०.३८२९
६,०५१.८
०.९४९९
६,३७१.०
३,३८९.५
०५३२०
६९,९११
१०.९७३३
५८,२३२
९.१४०२
२५,३६२
३.९८०९
२४,६२२
३.८६४७

आयतन (१०१० घन कि.मी) पृथ्वी तुलना में
६.०८२७२
०.०५६
९२.८४१५
०.८५७
१०८.३२१
१६.३११६
०.१५१
१,४३,१२८
१,३२१.३३७
८२,७१३
७६३.५९४
६,८३३.४४
६३.०८५
६,२५२.५
५७.७२३

मात्रा (१०२४ किलोग्राम)
०.३३०१०
४.६८७३
५.९७२२
०.६४१६९
१,८९८.१
५६८.३२
८६.८१०
१०२.४१

घनत्व (ग्राम प्रति घन से.मी.)
५.४२७
५.२४३
५.५१३
३.९३४
१.३२६
०.६८७
१.२७०
१.६३८

विषुव सतह पर गुरुत्व आकर्षण (मीटर/वर्ग सेकण्ड)
३.७
८.८७
९.८०६६५
३.७१
२४.७९
१०.४
८.८७
११.१५

पलायन वेग (कि.मी./घण्टा)
१५,३००
३७,२९६
४०,२८४
१८,१०८
२,१६.७२०
१,२९,९२४
७६,९६८
८४,८१६

अक्षघूर्णन (पृथ्वी दिन)
५८.६४६
-२४३.०१८
०.९९,७२,६९,६८
१.०२६
०.४१३५४
०.४४४
-०.७१८
०.६७१

कक्षा भ्रमण
(पृथ्वी वर्ष)
०.२४०८४
०.६१५१९७२६
१.००००१७४
१.८८०८४७६
११.८६२६१५
२९.४४७४९८
८४.०१६८४६
१६४.७९१३२

मध्य कक्षा गति(कि.मी/घण्टा)
१,७०,५०३
१,२६,०७४
१,०७,२१८
८६,६७७
४७,०२
३४,७०१
२४,४७७
१९,५६६

कक्षा उत्केन्द्रता
०.२०५६३५९३
०.००६७७६७२
०.०१६७११२३
०.०९३३९४१
०.०४८३८६२४
०.०५३८६१७९
०.०४७२५७४४
०.००८५९०४८

क्रान्ति वृत्त से कक्षा का कोण
७.००
३.३९०
०.००००५
१.८५०
१.३०४०
२.४९०
०.७७०
१.७७०

विषुव और कक्षा का कोण
००
१७७.२३ (विपरीत गति)
२३.४३९३
२५.२०
३.१०
२६.७०
९७.८० (विपरीत गति)
२८.३०

सतह पर न्य़ुनतम/अधिकतम तापक्रम
१७३/४२७
४६२
-८८/५८
-८७ से -५





वायुमण्डल की गैस

कार्बन डायोक्साइड
नाइट्रोजन, आक्सीजन
कार्बन डायोक्साइड,नाइट्रोजन, आर्गन 
हाइड्रोजन, हीलियम
हाइड्रोजन, हीलियम
हाइड्रोजन, हीलियम, मीथेन
हाइड्रोजन, हीलियम, मीथेन

उपग्रह
-
-
१ चन्द्र
६६
६२
२७
१३

वलय
-
-
-
-
हाँ
हाँ
हाँ
हाँ

(८) सौर मण्डल के ग्रह और कक्षाओं का आकार-यह नीचे के चित्र में दिया गया है-

(९) कक्षाओं के अनुनाद या गूंज-गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में केवल दो पिण्डों के परस्पर आकर्षण का अध्ययन होता है। छोटा पिण्ड बड़े पिण्ड के चारो तरफ  वृत्त या दीर्घवृतीय कक्षा में चक्कर लगाता है। यदि उसका वेग बड़े पिण्ड के आकर्षण क्षेत्र से बाहर जाने के लिये पर्याप्त है तो वह परवलय या और अधिक वेगे होने पर अति-परवलय कक्षा में निकल जायेगा। सौर मण्डन के सभी ग्रह प्रायः वृत्तीय कक्षा में हैं, अर्थात् दीर्घवृत्त की उत्केन्द्रता बहुत कम है। अधिक शुद्ध गणना में दोनों पिण्ड अपने भार-केन्द्र के चारों तरफ परिक्रमा करते हैं। भार केन्द्र वह विन्दु है जहां दोनों पिण्डों को सन्तुलित किया जा सके, यदि वे दोनों बन्धे हों। लेकिन किसी भी ग्रह पर बाकी सभी ग्रहों के आकर्षण का भी प्रभाव पड़ता है, विशेषकर यदि वे परस्पर निकट हों या कक्षा के निकटवर्त्ती स्थान पर हों।
     इसके अतिरिक्त केवल दो पिण्डों का भी विचार किया जाय तो उनका अक्ष-भ्रमण परस्पर को प्रभावित करता है। इसका कारण है कि वे पूरी तरह दृढ़ पिण्ड नहीं हैं। जैसे चन्द्र के आकर्षण के कारण पृथ्वी के समुद्र का जल आकर्षित होता है जो प्रायः ३/४ सतह को घेरे हुये है। पृथ्वी अपने अक्ष पर १ दिन में परिक्रमा करती है (यही दिन की परिभाषा है)। पर चन्द्र पृथ्वी के चतुर्दिक् २७.३ दिन में परिक्रमा करता है। अतः चन्द्र से आकर्षित भाग पिछड़ता है और पृथ्वी के घूर्णन पर ब्रेक का काम करता है। इसके कारण पृथ्वी का घूर्णन धीरे धीरे धीमा होता जाता है। 
चन्द्र को फलित ज्योतिष में जल-ग्रह माना जाता है। सौर मण्डल के प्रायः खाली स्थानों के विरल पदार्थ को जल कहा गया है। ठोस ग्रह (बुध से मंगल तक) दधि, तथा बृहस्पति तथा बाहर के गैसीय ग्रह मधु हैं। पृथ्वी के निकट के जल-क्षेत्र (विरल आकाश) को प्रभावित करने के कारण चन्द्र को जल ग्रह कहते हैं। चन्द्र प्रायः ठोस पिण्ड होने पर भी पृथ्वी के आकर्षण के कारण यह पूर्ण गोलाकार होने के बदले थोड़ा लम्बा हो गया है। इसका लम्बा आकार उस समय का है जब चन्द्र आज की तुलना में २/३ दूरी पर था। प्रायः ठोस होने के कारण यह पुराने आकार में ही बना हुआ है। अतः चन्द्र का भार केन्द्र उसके ज्यामितिक केन्द्र से प्रायः २.५ कि.मी. दूरी पर है। यह भार केन्द्र सदा पृथ्वी की दिशा में लटका रहता है। अतः चन्द्र का अपने अक्ष पर भ्रमण २७.३ दिनों में होता है, जितने समय में यह पृथ्वी की परिक्रमा करता है। अतः हम सदा चन्द्र की एक ही सतह देखते हैं। इस भाग की पर्वत माला दूर से खरगोश की तरह दीखती हैं अतः प्राचीन काल से ही चन्द्र को शशि या शशाङ्क (शश = खरगोश) कहा जाता है। 
   सौर मण्डल के ६० उपग्रहों (चन्द्र) में अधिकांश अपने ग्रह की गति से जुड़े हुये हैं। बृहस्पति के ४ बड़े उपग्रह (इनको गैलिलिओ ने अपने दूरवीक्षण से देखा था, अतः गैलिलीय चन्द्र कहते हैं) सदा अपना एक ही सतह ग्रह की दिशा में रखते हैं। उसके अतिरिक्त इनकी परस्पर गति भी सम्बन्धित हैं। इयो का परिक्रमा काल यूरोपा का आधा है। जब वे दोनों बृहस्पति से एक ही दिशा में होते हैं, तो इयो कक्षा के निकट विन्दु (मन्द-नीच) पर तथा यूरोपा सबसे दूर विन्दु (मन्दोच्च) पर होता है। 
प्लूटो आज कल ग्रह नहीं माना जाता है। यह अपने उपग्रह चारोन से केवल दो गुणा बड़ा है। निकटता तथा प्रायः समान आकार के कारण यह नर्तकों की तरह सदा एक दूसरे के सामने रहते हैं।
   बुध के अतिरिक्त अन्य ग्रह सूर्य से अधिक दूर होने के कारण सूर्य की दिशा में नहीं रहते। बुध कक्षा की उत्केन्द्रता अधिक होने के कारण इसका अक्ष-भ्रमण काल (५८.६५ दिन) परिक्रमा काल (८७.९६९ दिन) के बराबर नहीं है, वरन् ठीक २/३ भाग है। बुध कक्षा की उत्केन्द्रता ०.२०५६ होने के कारण दूर विन्दु निकट विन्दु का प्रायः ३/२ गुणा दूर है। जब यह सूर्य की २ परिक्रमा करता है तो स्थिर तारों की तुलना में अपने अक्ष पर ३ चक्र लगाता है और केवल एक बार बुध सतह पर सूर्योदय होता है (सूर्योदय = अक्ष भ्रमण - परिक्रमा काल)। जैसे पृथ्वी की परिक्रमा ३६५.२६ दिनों में होती है जब उसका अक्ष भ्रमण (तारों की तुलना में) ३६६.२६ बार होता है। बुध कक्षा के सबसे निकट विन्दु (मन्द-नीच) पर  बुध की एक ही सतह या बिलकुल विपरीत सतह सूर्य के सम्मुख होती है।
   शुक्र ग्रह की गति का पृथ्वी से विचित्र सम्बन्ध है। पृथ्वी से सबसे निकट शुक्र ग्रह ही आता है। शुक्र अपनी कक्षा २२४.७ दिन में पूरी करता है। तारों की तुलना में यह विपरीत दिशा में २४३.०१८७ दिन में अक्ष भ्रमण करता है। इसके अतिरिक्त केवल प्लूटो ही विपरीत दिशा में अक्ष भ्रमण करता है। अन्य सभी ग्रह जैसे पृथ्वी का कक्षा भ्रमण और अक्ष भ्रमण एक ही दिशा में होता है। अतः शुक्र सतह पर सूर्योदय का चक्र ११६.८ दिन का होगा (१/२२४.७ + १/२४३.०१८७ = १/११६.८)। विपरीत अक्ष भ्रमण के कारण शुक्र सतह पर पश्चिम दिशा में सूर्य उदय होगा तथा ५८.४ दिन बाद पूर्व दिशा में अस्त होगा। शुक्र और पृथ्वी ५८३.९ दिनों के चक्र में एक दूसरे के सबसे निकट होते हैं-
१/स = १/शु + १/प = १/२२४.७ - १/३६५.२६ = १/५८३.९, 
यहां स = सापेक्ष परिक्रमा काल, शु = शुक्र परिक्रमा, प = पृथ्वी परिक्रमा।
    प्रति ५८४ दिन में पृथ्वी की १ परिक्रमा तथा २१५० अंश गति होगी। शुक्र की २ परिक्रमा तथा २१५० अंश (२.६ परिक्रमा) गति होगी। इसके बीच शुक्र पृथ्वी को कभी पार नहीं करेगा। इस अवधि में शुक्र अपने अक्ष पर विपरीत दिशा में २.४ चक्र लगायेगा (२ परिक्रमा तथा १४५० अंश)। अतः शुक्र की वही सतह पृथ्वी के सामने होगी जो पिछले मिलन के समय थी।
(१०) मन्दोच्च-गुरुत्व क्षेत्र में किसी ग्रह की कक्षा दीर्घ-वृत्ताकार होती है। उसकी नाभि आकर्षण का केन्द्र है। नाभि से सबसे दूर (या उच्च) के विन्दु पर गति सबसे मन्द होती है अतः उसे मन्दोच्च कहा जाता है। यदि वृत्ताकार कक्षा में ग्रह समान गति से चलता, उस स्थिति की तुलना में ग्रह मन्दोच्च की दिशा में खिसका रहता है। अतः मन्दोच्च को आकर्षक कहा गया है। मध्यम ग्रह एक काल्पनिक ग्रह है जो वृत्त (कक्षा वृत्त) पर समान गति से चलता है। इसके ऊपरी विन्दु पर एक छोटे वृत्त (मन्द परिधि) में वास्तविक या स्पष्ट ग्रह की गति की कल्पना की गयी है, जो कक्षा के विपरीत दिशा में उसी गति से चलता है तथा मन्दोच्च विन्दु पर उसकी दिशा केन्द्र से दूर होती है जहां वह सबसे दूर विन्दु पर होगा। नीच विन्दु पर केन्द्र दिशा में मन्द परिधि पर ग्रह रहता है, जो सबसे निकट का विन्दु होगा। किसी भी अन्य विन्दु पर मध्यम ग्रह की तुलना में मन्दोच्च दिशा में ग्रह होगा। 
चन्द्र पृथ्वी की परिक्रमा करता है। पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा में है पर पृथ्वी से देखने पर उसी गति से सूर्य उसकी परिक्रमा करता दीखता है। अतः सूर्य और चन्द्र की स्थिति केवल मन्द परिधि द्वारा निकाली जाती है।


(११) शीघ्रोच्च-सभी ग्रह सूर्य की कक्षा में हैं। सूर्य केन्द्रित स्थिति के लिये, मध्यम ग्रह में केवल मन्द परिधि द्वारा संशोधन पर्याप्त है। पर पृथ्वी से उस ग्रह की स्थिति निकालने के लिये दो कक्षाओं की गणना करनी पड़ेगी। एक उस ग्रह की कक्षा तथा दूसरी पृथ्वी की कक्षा। सूर्य से पृथ्वी तथा उस ग्रह की दूरी और दिशा ज्ञात होने पर पृथ्वी से उस ग्रह की दिशा ज्ञात हो सकती है। यह आधुनिक विधि है। पर हम वास्तव में सूर्य केन्द्रित स्थिति नहीं देखते हैं, यह गणना द्वारा अनुमानित है। पृथ्वी से हम दोनों कक्षाओं की गणना करते हैं। इनमें जो छोटी कक्षा है उसमें गति तेज होती है अतः उसे शीघ्र कक्षा कहते हैं। पृथ्वी से भीतरी ग्रह-बुध या शुक्र देखने पर वह सूर्य केन्द्रित छोटी (शीघ्र) कक्षा में दीखता है। उसका मध्यम स्थान उस कक्षा के केन्द्र पर स्थित सूर्य ही होगा। अतः सूर्य शीघ्रोच्च है तथा उसी मध्यम स्थान से वह थोड़ा आगे-पीछॆ होगा जिसकी गणना शीघ्र परिधि द्वारा करते हैं।
इसी प्रकार यदि किसी बाहरी ग्रह-मंगल, बृहस्पति, शनि-से देखने पर पृथ्वी सूर्य केन्द्रित छोटी (शीघ्र) कक्षा में दीखेगी जिसका मध्य स्थान सूर्य है जो उसके लिये शीघ्रोच्च है। मंगल से पृथ्वी का मध्य स्थान सूर्य है, अतः पृथ्वी से मंगल का मध्य स्थान वही होगा, जो सूर्य से है। इसमें अधिक अन्तर शीघ्र कक्षा के कारण होता है अतः पहले उसके कारण अन्तर की गणना करते हैं और पहले उसका आधा ही जोड़ते हैं क्योंकि यह अनुमानित मान है। थोड़ा शुद्धतर मान मिलने पर उस स्थान के लिये मन्दोच्च आकर्षण (मन्दफल) का आधा जोड़ते हैं। फिर पूरा मन्दफल जोड़ने पर  ग्रह की स्थिति बड़ी कक्षा में मिल जाती है, तब उस के लिये पूरा शीघ्रफल जोड़ते हैं।

मन्द परिधि पर गति मध्य परिधि के विपरीत होती है।मध्य परिधि का आकार ३६०० अंश मान कर उसके अंश के रूप में मन्द परिधि लिखते हैं। यह दीर्घवृत्त आकार की माप है। मन्द परिधियदि स्थिर रखा जाय तो ग्रह गति एक अन्य वृत्त में दीखेगी जिसका केन्द्र मन्दोच्च की तरफ खिसका रहेगा। पूरी तरह दीर्घवृत्त बनाने के लिये इसका मान बदलना पड़ता है, जिसकी गणितीय व्याख्या स्पष्ट ग्रह की विधि में समझायी जायेगी। शीघ्र परिधि पर गति मध्य परिधि की ही दिशा में होती है। बड़ी परिधि को ३६०० अंश मान कर इसका मान लिखा जाता है-
 =  
 (१२) भू केन्द्रित माप-सौर मण्डल के ग्रहों की गणना हम सूर्य केन्द्रित कक्षाओं में करते हैं। सूर्य की आकाशगंगा में गति आकाशगंगा केन्द्र से की जाती है। पर सभी तारा या ग्रहों का स्थान पृथ्वी से ही देखा जाता है। उनकी स्थिति जानने के लिये हम पृथ्वी केन्द्र से अनन्त त्रिज्या के वृत्त की कल्पना करते हैं जिसकी सतह पर पिण्डों की स्थिति देखी जाती है। सूर्य के चारो तरफ पृथ्वी की कक्षा के तल में एक वृत्त की कल्पना की जाती है। इस वृत्त की परिक्रमा को ३६० अंशों में बांटा गया है। एक स्थिर विन्दु को ०० मान कर उससे पिण्ड की कोणीय स्थिति मापी आती है। इस वृत्त के तल में जो माप होती है उसे राशि (३००) अंश तथा अंश के खण्डों में व्यक्त किया जाता है। अतः इसे राशि कहते हैं। ग्रहों का परिक्रमा मार्ग ठीक इस तल में नहीं है, वरन् प्रायः २० तक झुका हुआ है। बुध कक्षा ७० झुकी है। क्रान्ति वृत्त के तल से जितना ऊपर (उत्तर) या नीचॆग्रह की कोणीय दूरी है उसे क्रान्ति या विक्षेप कहते हैं। ग्रहों का विक्षेप प्रायः २० तक रहता है, पर तारों का विक्षेप ९०० तक हो सकता है। इस माप पद्धति को द्रुवीय नियामक कहते हैं, जिसमें विन्दु की दूरी भी मापी जाती है। किन्तु आंख या दूरदर्शक से देखने पर दूरी नहीं, केवल कोणीय दिशा ही दीखती है। ग्रह की दिशा को बढ़ा कर हम अनन्त वृत्त की परिधि पर मानते हैं। नियामक पद्धति का वर्णन त्रि-आयामीय नियामक ज्यामिति तथा खगोलीय माप का वर्णन गोलीय त्रिकोणमिति की पुस्तक में मिलेगा। यहां यह ध्यान योग्य है कि स्पष्ट ग्रह ग्रह की वास्तविक दिशा नहीं है, वरन् क्रान्ति वृत्त पर उसका स्थान है, जो गोल के उत्तरी विन्दु से ग्रह को मिलाने वाली रेखा का क्रान्ति वृत्त से मिलन विन्दु है।
   क्रान्ति वृत्त से माप लेने पर उत्तरी विन्दु को कदम्ब तथा दक्षिणी या नीचे के विन्दु को कलम्ब कहते हैं। विषुव वृत्त से माप लेने पर उत्तरी और दक्षिणी विन्दु ध्रुव कहे जाते हैं। यहां उत्तर दक्षिण, पूर्व या पश्चिम दिशायें पृथ्वी सतह के हर विन्दु पर अलग अलग हैं। पृथ्वी के भ्रमण अक्ष की दिशा उत्तर और दक्षिण हैं। उस दिशा में कोई ठेपी आदि घुमाने पर जिस दिशा में जाता है वह उत्तर तथा उसके विपरीत दक्षिण दिशा है। उत्तर दक्षिण दिशा के लम्बरूप दिशा में जिस तरफ सूर्य का उदय हो वह पूर्व, तथा उसके विपरीत पश्चिम है। सूर्य ठीक पूर्व क्षितिज विन्दु पर नहीं उदय होता है, उससे कुछ उत्तर या दक्षिण उदय होता है। उत्तर दिशा में उसके खिसकने का माग उत्तरायण तथा दक्षिन दिशा में दक्षिणायन मार्ग है। दोनों मार्गों में एक एक बार वह ठीक पूर्व विन्दु पर उदय होगा।

(१३) पात-अनन्त गोल पर क्रान्ति वृत्त तथा ग्रह का कक्षा वृत्त दो विन्दुओं पर एक दूसरे को काटते हैं, जिनको पात कहा जाता है। जिस विन्दु पर ग्रह क्रान्ति वृत्त से उत्तर (पृथ्वी भ्रमण दिशा में ठेपी जिस दिशा में उठती है) जाता है वह उत्तर पात तथा विपरीत दिशा का पात दक्षिण पात है। चन्द्र कक्षा के उत्तर और दक्षिण पातों को राहु तथा केतु कहते हैं। सभी पात विपरीत दिशा में घूमते हैं, जो जाइरोस्कोप गति के नियमों के अनुसार है।

 (१४) भगण की उपपत्ति-भास्कराचार्य ने सिद्धान्त शिरोमणि, मध्यमाधिकार के भगणाध्याय के प्रथम ६ श्लोकों में ग्रहों के भगण लिखे हैं तथा अपने वासना भाष्य में उनकी उपपत्ति लिखी है। उसके वासना-वार्तिक में नृसिंह ने इसी ग्रन्थ के गोलाध्याय तथा ब्रह्मगुप्त और गणेश दैवज्ञ के श्लोक उद्धृत किये हैं-
ज्ञातं कृत्वा मध्यं भूयोऽन्यदिने तदन्तरं भुक्तिः। त्रैराशिकेन भुक्त्या कल्प-ग्रह-मण्डलानयनम्॥ 
(ब्राह्म-स्फुट-सिद्धान्त १९/१२)
पश्येज्जलादौ प्रतिबिम्बितं वा खेटं दृगौच्यं गण्येच्च लम्बम्। 
तल्लम्ब-पात-प्रतिबिम्ब-मध्यं दृगौच्यहृत् सूर्यहतं प्रभास्यात्॥ (ग्रहलाघव ग्र.छा. २)
समं भ-सूर्यावुदितौ किलार्क्ष्या षष्ट्या घटीनामुदितं पुनर्भम्। 
   मान लें कि कोई नक्षत्र आज सूर्य के साथ उदय हो रहा है। कल वही नक्षत्र सूर्य से कुछ पहले उदय होगा, क्योंकि सूर्य अपनी दैनिक गति से कुछ पूर्व दिशा में चला जायेगा। अतः सूर्य क्रान्ति वृत्त का जितना भाग १ दिन में तय करता है, उस भाग के क्षितिज पर उदय काल (पृथ्वी की दैनिक गति के कारण) के बराबर सूर्य उदय में देरी होगी। समय का यह अन्तर दो बातों पर निर्भर है-(१) सूर्य की गति में परिवर्तन, तथा (२) पृथ्वी के अक्ष या विषुव वृत्त का झुकाव के कारण क्रान्ति वृत्त के अंशों का उदय काल बदलता रहता है। सूर्य जिस राशि में है उसका उदय मान (क्षितिज पर) क है, यदि सूर्य १ दिन में प० अंश तय करता है, तो उतने अंश का उदय काल कxप०/३० होगा, क्योंकि राशि में ३०० अंश हैं। ६० नाक्षत्र घटी में यह समय जोड़ने पर यह सावन दिन (२ सूर्य उदयों का अन्तर) का मान होगा। १ वर्ष में क्रान्ति वृत्त के उसी विन्दु पर वापस आने में सूर्य का एक चक्र कम होगा। पृथ्वी के अक्ष भ्रमण के बराबर नाक्षत्र दिन होंगे, पर इस अवदि में सूर्य का भी १ चक्र उसी दिशा में होगा। अतः दोनों के अन्तर के बराबर सावन दिन होंगे। अतः यदि वर्ष में स सावन दिन हैं, तो नाक्षत्र दिन न = स +१। अतः १ कल्प में नाक्षत्र दिन = कल्प सावन दिन + ४,३२,००,००,०००, जो १ कल्प में नक्षत्रों की तुलना में सूर्य की परिक्रमा है।
रवि-स्ततः स्वोदय-भुक्ति-घातात् खा-भ्रा-ष्ट-भू (१८००) लब्ध-समासुभिश्च॥५॥
समागतासु-संयुता रवेस्तु षष्टि-नाड़िकाः। स्फुटं द्युरात्र-मुद्गमाद्-द्यु-भुक्तितश्च तच्चलम्॥६॥
षष्ट्या घटीनां भदिनं सदार्क्ष्या तद्-भुक्ति-तुल्यासु-युतं खराशोः। 
स्यान्-मध्यमं सावन-मेव-मब्दे तत्-संख्यका भ-भ्रमतो निरेका॥७॥
(सिद्धान्त शिरोमणि, गोलाध्याय, मध्यगतिवासना) भगणोपपत्ति अध्याय के प्रथम ६ श्लोकों की व्याख्या में भास्कराचार्य ने इस की विधि समझायी है। समतल पर एक वृत्त खींच कर उसके केन्द्र पर एक शङ्कु रखें। उत्तरायण में जब सूर्य का उदय स्थान पूर्व विन्दु के निकट थोड़ा दक्षिण में हो तब सूर्योदय काल में शङ्कु छाया का वृत्त से मिलन विन्दु पर चिह्न देंगे। उस दिन से दिन गिनते जायेंगे तथा ३६५ दिनों के बाद सूर्य का उदय प्रायः उसी विन्दु पर होगा। उसके अगले दिन सूर्य पूर्व विन्दु से थोड़ा उत्तर उदय होगा। अर्थात् सूर्य को नक्षत्रों की तुलना में एक परिक्रमा करने में ३६५ दिन से थोड़ा अधिक लगा। शंकु की छाया वृत्त के पश्चिम बाग में होगी। दो छायाओं का अन्तर एक दिन में सूर्य द्वारा तय दूरी है। पश्चिम विन्दु से उत्तर विन्दु की दूरी उसका उतना ही भाग होगा जितना १ दिन का बचा भाग वर्ष में होगा। इसे ३६५ में जोड़ने पर वर्ष में सावन दिनों की संख्या होगी। यह ऋतु वर्ष का मान होगा क्योंकि हम सूर्य के विषुव विन्दु पर आने के समय से गणना कर रहे हैं।
(१५) तारा ग्रहों के भगण-सूर्य तारा है, चन्द्र पृथ्वी का उपग्रह है। पर इनका प्रभाव सबसे अधिक पड़ता है, अतः इनको ग्रह मानते हैं। दोनों पृथ्वी से दीर्घवृत्ताकार कक्षा में दीखते हैं। अन्य ग्रह तारा समान दीखते हैं, अतः इनको तारा-ग्रह कहते हैं। ये भी सूर्य के चारो तरफ दीर्घवृत्त में परिक्रमा कर रहे हैं। पर पृथ्वी से देखने पर इनकी गति दो कक्षाओं का परिणाम है। अतः ये कभी कभी विपरीत दिशा में चलते हुये दीखते हैं। 
तारा ग्रहों में बुध और शुक्र की गति बहुत काल देखने पर लगता है कि वे भी १ वर्ष में पृथ्वी की परिक्रमा कर रहे हैं, यद्यपि वे इस बीच वक्री भी होते हैं। पर मंगल, बृहस्पति, शनि बहुत काल तक सीधी गति में रहते हैं, कुछ काल के लिये वे भी वक्र रहते हैं। इससे यह अनुमान तो हो सकता है कि उनका परिक्रमा काल बड़ा है। पर स्थिर तारों की तुलना में उनकी गति देखने पर कई पीढ़ियों तक देखने पर उनके भगण काल का अनुमान होगा। जीवन काल में इसका अनुमान लगाने की विधि है कि सूर्य निकटता के कारण उनके उदय या अस्त का काल देखा जाय। दो क्रमागत उदयों (या अस्त) के बीच का समय १ वर्ष से थोड़ा ही अधिक होगा। यदि ग्रह तथा सूर्य की दैनिक गति ग तथा स (अंश) है, तो प्रति दिन सूर्य उस ग्रह से (स-ग) अंश आगे निकल जायेगा। ३६०० अंश आगे निकलने में ३६०/(स-ग) = ख समय लगेगा, जो क्रमागत उदयों के बीच का समय है। इससे ग की गणना की जा सकती है। तब ग्रह का परिक्रमा-काल (सूर्य कक्षा में) प = ३६०/ग।
(१६) पृथ्वी की गति तथा उनके प्रभाव--(क) पृथ्वी की दो मुख्य गतियां हैं-दैनिक गति अर्थात् अपने अक्ष पर घूर्णन तथा वार्षिक गति या सूर्य के चतुर्दिक् परिक्रमा। अक्ष घूर्णन के कारण दिन-रात होते हैं अतः इसे दैनिक गति कहते हैं। प्रायः ३६५ दिनों के बाद सूर्य पुनः उसी दिशा में दीखता है, इस चक्र का समय वर्ष कहा जाता है। दोनों में कई सूक्ष्म भेद हैं। 
    (ख) नाक्षत्र और सौर दिन-अक्ष घूर्णन के कारण १ चक्र पूरा होने पर किसी स्थान पर वही तारा ठीक ऊपर आता है जो चक्र के आरम्भ में था। यह नाक्षत्र दिन है। किन्तु इस अवधि में पृथ्वी अपनी कक्षा में कुछ आगे बढ़ जाती है अतः थोड़ा और घूमने पर सूर्य ऊपर विन्दु पर आता है। नीचे के चित्र में स्थान १ पर सूर्य तथा नक्षत्र ऊर्ध्व विन्दु पर (किसी स्थान विशेष के लिये) हैं। स्थान २ पर १ चक्र पूर्ण होता है, पर सूर्य ऊर्ध्व विन्दु से थोड़ा आगे हो जाता है क्योंकि पृथ्वी अपनी कक्षा पर थोड़ा बढ़ जाती है। अतः थोड़ी देर बाद स्थान ३ पर सूर्य ठीक ऊपर आता है। उस विन्दु तक का समय सौर दिन है।
 
जब पृथ्वी की १ परिक्रमा होती है तो उसी दिशा में अपने अक्ष पर प्रायः ३६६ चक्र होते हैं। सूर्य की तुलना में ३६५ घूर्णन होते हैं। अतः ३६६ नाक्षत्र दिन = ३६५ सौर या सावन दिन। या १ सौर दिन = ३६६/३६५ नाक्षत्र दिन = १ + १/३६५ दिन अन्तर = १/३६५ दिन = प्रायः १/३६० दिन = २४/३६० घण्टा = १/१५ घण्टा या ४ मिनट। अतः यदि सौर दिन २४ घण्टे का मानें तो नाक्षत्र दिन २३ घण्टा ५६ मिनट का होगा। यदि नाक्षत्र दिन २४ घण्टा मानें तो सौर दिन प्रायः २४ घण्टा ४ मिनट का होगा।
(ग) अक्ष का झुकाव- परिक्रमा की कक्षा को क्रान्ति वृत्त कहते हैं, इस तल पर लम्ब दिशा से पृथ्वी का घूर्णन अक्ष प्रायः २४० झुका है (२३.५०) । अक्ष पर झुकाव के कारण पृथ्वी की सतह पर ऋतु परिवर्तन होता है। कक्षा में दूरी के कारण बहुत कम प्रभाव होता है। ३ जनवरी को पृथ्वी सूर्य के निकटतम प्रायः १४.२ कोटि कि.मी. दूर होती है। उसके अर्द्ध चक्र या वर्ष के अन्तर पर ३ जुलाई को पृथ्वी सबसे दूर मन्दोच्च विन्दु पर १५.२ कोटि कि.मी. दूर होती है। अक्ष के झुकाव के कारण २१ जून को पृथ्वी का उत्तरी ध्रुव सूर्य की दिशा में होता है। उस समय उत्तरी गोलार्ध में सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं तथा सबसे अधिक गर्मी होती है। पृथ्वी की सतह पर देखने से सूर्य सबसे उत्तर कर्क रेखा (२३.५ अंश उत्तर अक्षांश) पर लम्ब रहता है। यह उत्तर गति का अन्तिम विन्दु होने के कारण उत्तर अयनान्त विन्दु है। उसके अर्द्ध चक्र के बाद २३ दिसम्बर को सूर्य दक्षिणी अयनान्त विन्दु (मकर रेखा, २३.५ अंश दक्षिण अक्षांश) पर होगा जब दक्षिणी गोलार्द्ध में सबसे अधिक गर्मी या उत्तर में शीत होगा। इनके बीच के २ स्थानों पर सूर्य विषुव रेखा पर लम्ब होता है। २१ मार्च को उत्तर गति (उत्तरायण) में जब सूर्य विषुव को पार करता है तब उत्तर में वसन्त तथा दक्षिण में हेमन्त होता है। उसके विपरीत ६ मास बाद २३ सितम्बर को सूर्य दक्षिणायन में विषुव को पार करता है। तब उत्तर में हेमन्त तथ् दक्षिण में वसन्त होता है।

(घ) पृथ्वी के आकार पर प्रभाव-अपने अक्ष पर घूर्णन के कारण केन्द्रापसारी बल लगता है जिसके कारण विषुव के पास पृथ्वी का आकार फैल गया है। गोल आकार की तुलना में विषुव त्रिज्या प्रायः ५ कि.मी. अधिक है तथा ध्रुवीय त्रिज्या ५ कि.मी. कम है। इसके अतिरिक्त चन्द्र के आकर्षण के कारण पृथ्वी का समुद्री जल विषुव वृत्त के पास थोड़ा उठ जाता है, जो ज्वार कहलाता है। पृथ्वी का अक्ष घूर्णन चन्द्र परिक्रमा की तुलना में तेज है, अतः यह ज्वार चन्द्र की दिशा से प्रायः ३० अंश आगे रहता है। 

चन्द्र की तुलना में सूर्य ३९१ गुणा दूर है पर उसका आकर्षण चन्द्र की तुलना में १७५ गुणा है। फिर भी इसके कारण ज्वार कम होता है क्योंकि यह पृथ्वी के निकट और दूर भागों पर आकर्षण का अन्तर है। पृथ्वी का व्यास सूर्य दूरी का बहुत छोटा भाग है और आकर्षण का अन्तर केवल १.०००१७ गुणा है। चन्द्र आकर्षण की तुलना में यह ०.०००१७ x १७४.४ = ०.०३ गुणा है। चन्द्र का ज्वार उसके आकर्षण का ०.०६८ भाग है अतः सूर्य के कारण ज्वार ३०/६८ = प्रायः ४४% है।

पृथ्वी की तुलना में चन्द्र की मात्रा १/८० भाग है। दोनों मिला कर सूर्य का केवल १३ लाख भाग हैं। लेकिन पृथ्वी पर जीवन का विकास चन्द्र के कारण ही सम्भव हुआ। वार्ड और ब्राउन ली ने इसकी व्याख्या की है-पृथ्वी का अक्ष प्रायः २३,५ अंश कक्षा-तल (क्रान्ति-वृत्त) पर झुका हुआ है। विषुव वृत्त पर उभार के कारण उस पर निकट के ग्रहों का आकर्षण पड़ता है जो उसके झुकाव को बदलते हैं। यदि निकट में चन्द्र नहीं रहता तो पृथ्वी अक्ष का झुकाव काफी बदलता। जैसे मंगल के उपग्रह बहुत छोटे होने के कारण उसका झुकाव ४५ अंश तक बदलता है। दीर्घकाल तक पृथ्वी का झुकाव प्रायः २४ अंश रहने के कारण लाखों वर्षों तक एक जैसी ही जलवायु रही और पृथ्वी पर जीवन का विकास हुआ।
      
   इसके अतिरिक्त चन्द्र परिक्रमा के कारण दैनिक और मासिक चक्र में जीवों पर प्रभाव पड़ता है जो वनस्पतियों और जीवों के विकास के लिये जरूरी है। 
(ङ) पृथ्वी की घूर्णन गति में कमी- चन्द्र के आकर्षण अन्तर के कारण उच्च ज्वार पृथ्वी के घूर्णन पर ब्रेक का काम करता है और धीरे धीरे इसका घूर्णन मन्द होता जा रहा है, अर्थात् दिन का मान बढ़ रहा है। किन्तु पृथ्वी तथा चन्द्र को मिला कर कोणीय आवेग (कोणीय गति मात्रा) समान रहेगी। अतः चन्द्र धीरे धीरे दूर हट रहा है। १९७० के बाद चन्द्र पर एक दर्पण रखा गया है जिससे लेसर किरणों को परावर्तित कर उसकी दूरी को कुछ सेण्टीमीटर की शुद्धता तक मापा जा सकता है। १९७० से २००७ तक की माप के अनुसार चन्द्र की गति में २५.८५८  ०.००३ कोण-मिनट प्रति शताब्दी में कमी हो रही है। चन्द्र की दूरी प्रति वर्ष ३८.२४७  ०.००४ मिलीमीटर बढ़ रही है। इसके कारण पृथ्वी का दिन मान प्रति शताब्दी २.३ मिली सेकण्ड (१/१००० सेकण्ड) बढ़ रहा है। किन्तु विगत २७०० वर्षों के सूर्य ग्रहणों के अध्ययन से पता चलता है कि केवल १.७०  ०.०५ मिली-सेकण्ड प्रति शताब्दी वृद्धि हो रही है। आज के दिन मान के अनुसार प्राचीन काल के समय का अन्तर ΔT = ३१/श२ (श = शताब्दी) बढ़ रहा है।
(१७) अयन चलन-जाइरोस्कोप-कोई भी चक्का तेजी से घूमता है तो उसकी दिशा में एक स्थिरता आती है। इस घूर्णन क्रिया द्वारा दिशा नियन्त्रित की जाती है। इस उपकरण को जाइरोस्कोप कहते हैं। साइकिल भी जब चलती है तो उसके चक्कों की घूर्णन गति के कारण उसमें स्थिरता और सन्तुलन बना रहता है। इसी प्रकार लट्टू भी अपने अक्ष पर तेजी से घूमता है तो वह आरम्भ में ठीक ऊर्द्ध्व दिशा में स्थिर रहता है। गति थोड़ी कम होने पर लट्टू का अक्ष ऊर्द्ध्व दिशा की परिक्रमा करता है। 
   पृथ्वी के झुकाव को भी बदलने के लिये उसके विषुव उभार पर ग्रहों विशेषकर चन्द्र का आकर्षण काम करता है। अतः पृथ्वी का अक्ष क्रान्ति वृत्त के लम्ब दिशा की प्रायः २६,००० वर्षों में परिक्रमा करता है। इसके कारण विषुव वृत्त का क्रान्ति वृत्त से कटान विन्दु पीछे की तरफ खिसकता है। अतः सूर्य की अयन गति का आरम्भ विन्दु बदलता है। अयन विन्दु की गति पृथ्वी की कक्षा या घूर्णन के विपरीत दिशा में होती है जिसे अयन चलन कहते हैं।   
   लट्टू की गति थोड़ा और कम होने पर उसका ऊपरी विन्दु अपने वृत्तीय मार्ग से थोड़ा अधिक झुकता रहता है। गति बहुत कम होने पर लट्टू बिल्कुल गिर जाता है। लट्टू के झुकाव में परिवर्तन को च्युति कहते हैं जिसका सबसे छोटा चक्र १८.५ वर्षों का है, जो चन्द्र के मन्दोच्च परिक्रमा का काल है। पृथ्वी अक्ष का झुकाव प्रायः ४१००० वर्षों में २२.१ से २४.५ अंश तक घटता बढ़ता है। सबसे अधिक २४.५ अंश झुकाव ८७०० ई.पू. (ईक्ष्वाकु काल) में था। अभी यह घट रहा है तथा प्रायः २३.५ अंश है।    
  

भास्कराचार्य-२ ने सिद्धान्त शिरोमणि में कहा है कि सूर्य सिद्धान्त के अनुसार १ कल्प (४३२ कोटि वर्ष) में सम्पात विपरीत दिशा में ३०,००० बार घूमता है। मुञ्जाल तथा अन्य के अनुसार यह सीधी गति से १ कल्प में १,९९,६६९ चक्र लगाता है। दोनों को मिलाकर १ कल्प में सम्पात गति १,६९,६६९ चक्र है। अर्थात् १ सम्पात चक्र २५४६१ वर्ष में है। आधुनिक मान २५,७७१ वर्ष है। ब्रह्माण्ड पुराण में इसे २६००० वर्ष का ऐतिहासिक मन्वन्तर कहा है। इसमें ३६० वर्षों के ७१ युग लेने पर मन्वन्तर प्रायः २५,५६० वर्ष का है। अयनाब्द युग २४,००० वर्षों का है जिसमें १२-१२,००० वर्षों के अवसर्पिणी तथा उत्सर्पिणी युग है। इनमें सत्य, त्रेता, द्वापर, कलि क्रमशः ४, ३, २, १ भाग के हैं, जो उत्सर्पिणी में विपरीत क्रम से आते हैं। युग चक्र में दिखाया गया है कि अवसर्पिणी त्रेता में जल-प्रलय आता है तथा उत्सर्पिणी त्रेता में हिम युग (उत्तरी गोलार्द्ध) में) आता है। 
षड् विंशति सहस्राणि वर्षाणि मानुषाणि तु । वर्षाणां युगं ज्ञेयं दिव्यो ह्येष विधिः स्मृतः॥ (ब्रह्माण्ड पुराण,१/२/२९/१९)
स वै स्वायम्भुवः पूर्वं पुरुषो मनुरुच्यते। तस्यैकसप्तति युगं मन्वन्तरमिहोच्यते॥ (ब्रह्माण्ड पुराण,१/ २/९/३६,३७) उत्सर्पिणी युगार्धं पश्चादपसरिणी युगार्धं च। मध्ये युगस्य सुषमाऽऽदावन्ते दुष्षमेन्दूच्चात्॥ (आर्यभटीय, कालक्रियापाद २/९) 
सिद्धान्त शिरोमणि, गोलाध्याय, गोलबन्धाधिकार-
विषुवत्-क्रान्ति-वलययोः सम्पातः क्रान्ति-पातः स्यात्। तद्-भगणाः सौरोक्ता व्यस्ता अयुत-त्रयं कल्पे।१७॥
अयन-चलनं यदुक्तं मुञ्जालाद्यैः स एवायम्। तत्-पक्षे तद्-भगणाः कल्पे गोऽङ्ग-र्त्तु-नन्द-गो-चन्द्राः (१९९६६९)॥१८॥
तत्-सञ्जातं पातं क्षिप्त्वा खेटेऽपमः साध्यः। क्रान्ति-वशाच्चर-मुदया-श्चर-दल-लग्नागमे ततः क्षेप्यः॥१९॥
अत्र मुञ्जालः-उत्तरतो याम्यदिशं याम्यान्तात् तदनु सौम्य-दिग्-भागम्। परिसरतां गगन-सदां चलनं किञ्चि-भवे-दपमे॥
विषुव-दपक्रम-मण्डल-सम्पाते प्राचि मेषादिः। पश्चात् तुलादि-रनयो-रपक्रमा-सम्भवः प्रोक्तः॥
राशि-त्रया-न्तरेऽस्मात् कर्कादि-रनुक्रमान्-मृगादिश्च। तत्र च परमा क्रान्ति-र्जिन-भाग-मिताथ तत्रैव॥
निर्दिष्टोऽयन-सन्धि-श्चलनं तत्रैव सम्भवति। तद्-भगणाः कल्पे स्यु-र्गो-रस-गोऽङ्क-चन्द्र-मिताः॥
सूर्य-सिद्धान्त , त्रिप्रश्नाधिकार में १ युग में त्रिंशत्-कृत्य (३० x २०) अयन-चक्र माना है। इस पद्धति से २७ अंश (९० अंश में ३ से गुणा कर १० से भाग देने पर) आगे या पीछे चलन होता है, जिसका १ चक्र ७२०० वर्षों में होगा। इसे भास्कर ने युग में ३० चक्र मानकर कल्प के ३०,००० चक्र माना है। 
त्रिंशत्-कृत्या युगे भानां चक्रं प्राक् परिलम्बते। तद्-गुणात् भू-दिनै-र्भक्ताद् द्युगणाद्यदवाप्यते॥९॥
तद्-दो-स्त्रिघ्नो दशाप्तांशा विज्ञेया अयनाभिधा॥
सूर्यज्ञा स्फुजितां पुरोगतिमतां कोटिघ्न दन्ता-ब्धयः (४,३२,००,००,०००), 
कल्पेस्युर्भगणाः शनी-ज्य-कुभवां ते चैव शीघ्रोच्चजाः। 
सन्दर्भ-(१) वृत्त, दीर्घवृत्त आदि के लिये नियामक ज्यामिति की कोई पाठ्य-पुस्तक पढ़ें, जैसे लोनी की को-और्डिनेट जिओमेट्री। इनकी पारम्परिक पुस्तक है-जिओमेट्री ऑफ् कोनिक्स-आशुतोष मुखोपाध्याय।
(२) ३ आयामीय ज्यामिति तथा गोलीय त्रिकोणमिति का ज्ञान आवश्यक है। इसके लिए टोडहण्टर या गोरख प्रसाद (पोथीशाला, लखनऊ से प्रकाशित) की स्फेरिकल जिओमेट्री पढ़ सकते हैं। हिन्दी में सर्वश्रेष्ठ पुस्तक श्री पी.डी. कठल की गोलीय त्रिकोणमिति है, जो मध्य प्रदेश के हिन्दी विभाग द्वारा प्रकाशित हुआ था तथा मेरे वेबसाइट www.scribd.com/Arunupadhyay पर उपलब्ध है।
(३) भारतीय ज्योतिष की प्रायः सभी पुस्तकें मेरे वेबसाइट पर उपलब्ध हैं। ये हैं-आर्यभटीय-४ टीकाओं सहित, ब्राह्म-स्फुट-सिद्धान्त (४ खण्डों में), सिद्धान्त-शिरोमणि (संस्कृत टीका, गणिताध्याय की अंग्रेजी टीका), लघु और महा भास्करीय-अंग्रेजी टीका, खण्ड-खाद्यक, सिद्धान्त शेखर, वटेश्वर सिद्धान्त, वाक्य-करण, वेदाङ्ग ज्योतिष (प्रभाकर होले तथा बाल गङ्गाधर तिलक की टीकायें), सिद्धान्त सेतु, नीलकण्ठ का सिद्धान्त दर्पण, सिद्धान्त दर्पण (हिन्दी तथा अंग्रेजी टीका), सम्राट् सिद्धान्त, सिद्धान्त-तत्त्व विवेक, ग्रह-लाघव, महासिद्धान्त, सूर्य सिद्धान्त (संस्कृत तथा हिन्दी टीकायें), नीलकण्ठ का तन्त्र-संग्रह, ज्योतिर्मीमांसा, लल्ल का शिष्य-धी-वृद्धिद-तन्त्र (अंग्रेजी टीका सहित), लघुमानस (अंग्रेजी टीका सहित), भास्वती (हिन्दी टीका सहित), ज्योतिर्गणितम् तथा केतकी ग्रह-गणितम् -दोनों वेङ्कटेश बापूजी केतकर द्वारा टीका सहित, पञ्च-सिद्धान्तिका-अंग्रेजी व्याख्या सहित।
(४) इनके अतिरिक्त निम्न पुस्तकें भी मेरे वेब-साइट पर हैं, जो ज्योतिष की सामान्य पुस्तकें हैं-भारतीय ज्योतिष शास्त्र -२ खण्ड, शंकर बालकृष्ण दीक्षित (अंग्रेजी अनुवाद), बीजोपनय (भास्कराचार्य -२), चन्द्र वाक्य, चन्द्र-छाया-गणितम् (दोनों माधव द्वारा), पाटीगणित (श्रीधर), राशि-गोल-स्फुटानीति, स्फुटनिर्णय-तन्त्र, स्फुट-चन्द्राप्ति, बखशाली पाण्डुलिपि (टीका सहित) Indian Time Reckoning (भारतीय ज्योतिष और आधुनिक भूगर्भ विज्ञान के कालमानों का समन्वय), History of Calendar-by Panchanga Committee, Indian Astronomy-a sourcebook (सभी भारतीय ज्योतिष पुस्तकों के विषयवार उद्धरणों का संग्रह) , Indian Chronology (1 BC to 2000 AD), Indian Ephemeris (1800-1999 AD)-दोनों लारेन्स डोमिनिक स्वामी कन्नुपिल्लै द्वारा, Kerala School of Astronomy, Popular Hindu Astronomy (वेद और ज्योतिष शास्त्र वर्णित तारागण-आधुनिक नामों सहित)।

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