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समस्त पाप निवारण स्तोत्र

* समस्तपाप निवारण स्तोत्र * पुष्करोवाच विष्णवे विष्णवे नित्यं विष्णवे विष्णवे नमः । नमामि विष्णुं चित स्थमहंकारगतिं हरिम् ॥ चित्तस्थमीशमव्यक्तमनन्तमपराजितम् । विष्णुमीडयमशेषेण अनादिनिधनं विभुम् ।। विष्णुश्चित्तगतो यन्मे विष्णुर्बुद्धिगतश्च यत् । यच्चाहंकारगो विष्णुर्यव्दिष्णुमॅयि संस्थितः ॥ करोति कर्मभूतोऽसौ स्थावरस्य चरस्य च । तत् पापं नाशमायातु तस्मिन्नेव हि चिन्तिते ॥ ध्यातो हरति यत् पापं स्वप्ने दृष्टस्तु भावनात् । तमुपेन्द्रमहं विष्णुं प्राणतातिॅहरं हरिम् ॥ जगत्यस्मिन्निराधारे मज्जमाने तमस्यधः । हस्तावलम्बनं विष्णुं प्रणमामि परात्परम् ॥ सर्वेश्वरेश्वर विभो परमात्मन्नधोक्षज । हृषीकेश हृषीकेश हृषीकेश नमोऽस्तु ते ॥ नृसिंहानन्त गोविंद भूतभावन केशव । दुरुक्तं दुष्कृतं ध्यातं शमयाधं नमोऽस्तु ते ॥ यन्मया चिन्तितं दु...

जन्मान्तरीय पापोंसे रोगोंकी उत्पत्ति

* समस्त प्राणियोंमें मानव श्रेष्ठ है; क्योंकि इसने शारीरिक उन्नतिके साथ-साथ आध्यात्मिक उन्नतिके शास्त्र रचे तथा ईश्वरीय प्रेरणा एवं साधनासे गहन अध्ययन किया और शास्त्रोंके सारको ग्रहणकर सुखी रहनेके उपाय ढूँढ़े, आरोग्यकी महत्ता समझी और जहाँ ये उपाय रुक गये तथा रोग-मुक्तिके उपाय न दीखे तो रोग क्यों होता है, इसकी खोज की और जितना हो सका आयुर्वेदसे लाभ लिया, शेष धर्मशास्त्रोंसे भी लाभ लिया है। यहाँ आयुर्वेदकी अपेक्षा विभिन्न धर्मशास्त्रों (स्मृतियों) में रोग उत्पन्न होनेके जो लक्षण दिये गये हैं और जन्मान्तरीय किस निन्दित कर्मसे वर्तमानमें कौन-सा रोग हुआ है, इसका संक्षेपमें विचार किया गया है पूर्वजन्ममें किये पापोंसे रोग होते हैं और फिर रोगजनित चिह्न भी प्रकट होते हैं, पर जप आदि दैवव्यपाश्रयसे उनकी शान्ति भी हो जाती है अर्थात् रोग ठीक हो जाते हैं- पूर्वजन्मकृतं पापं नरकस्य परिक्षये। बाधते व्याधिरूपेण तस्य जप्यादिभिः शमः॥ (शाता० स्मृति १५) धर्मशास्त्रोंमें निर्दिष्ट कर्मविपाकका संक्षेपमें यहाँ वर्णन किया जा रहा है- *(१)क्षयरोग*- इसके सम्बन्धमें कहा गया है कि यह रोग तेल, घी तथा चिकनी वस्तु चुरा...