मंत्र एवम मंत्र के अंग
मन्त्र- मननात् त्रायते इति मन्त्रः। जिसके मनन से त्राण या मुक्ति मिलती है वह मन्त्र है। मनन के कई स्तर हैं-स्पष्ट उच्चारण, उपांशु (मानसिक उच्चारण), मनन, चिन्तन। मन्त्र के ११ अंग हैं। (१) विनियोग-मन्त्र का उद्देश्य या लक्ष्य विनियोग है। मन्त्र के वाक् या शब्द रूप में वेद में ३ अंग हैं। (२) ऋषि-२ तत्त्वों के बीच का सम्पर्क ऋषि (रस्सी) है। २ पिण्डों के बीच प्रकाश, आकर्षण आदि द्वारा सम्बन्ध ऋषि है। हमारा तारों से सम्पर्क उनसे आते प्रकाश द्वारा है, अतः वे भी ऋषि हैं, जैसे सप्तर्षि। भौतिक रूप में ब्रह्म तथा सामान्य मनुष्य के बीच सम्बन्ध जोड़ने वाला ऋषि है, जैसे मन्त्र-द्रष्टा ऋषि। वह ३ विश्वों -आकाश, पृथ्वी तथा मनुष्य-के बीच सम्बन्ध का दर्शन कर अन्य लोगों को बताता है। इसे यास्क निरुक्त (१/२०) में परोवरीय सम्बन्ध कहा है-ऊपर से नीचे ज्ञान का प्रवाह। मनुष्य शरीर के भीतर नाड़ी तन्त्र ऋषि है, विशेषकर मनुष्य मस्तिष्क के २ भागों को जोड़ने वाले तन्तु। (३) देवता-आकाश में फैली ऊर्जा प्राण है। उसका क्रियात्मक रूप देव है, निष्क्रिय रूप असुर- ऋषिभ्यः पितरो जाताः, पितृभ्यो देव-दानवाः। देवेभ्यश्च जगत् सर्वं च...