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अथ शारदोक्तमहामृत्युञ्जयजपविधिः

*।। अथ शारदोक्तमहामृत्युञ्जयजपविधिः।।*   *विनियोगः*  ॐ अस्य श्रीमहामृत्युञ्जयमन्त्रस्य वसिष्टऋषिः अनुष्टुप्छन्दः श्रीत्र्यम्बकरुद्रो देवता श्रीं बीजं ह्रीं शक्तिः मम यजमानस्य वा शरीरे सर्वारिष्ट निवृत्तिपूर्वकसकलमनोरथसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ।   *अथ ऋष्यादिन्यासः*  ॐ वसिष्ठऋषये नमः शिरसि । अनुष्टुप्छन्दसे नमः मुखे । श्रीत्र्यम्बकरुद्र देवतायै नमः हृदये । श्रीं बीजाय नमः गुह्ये । ह्रीं शक्तये नमः पादयोः ।।  *अथ करन्यासः-*  ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः त्र्यम्बकं ॐ नमो भगवते रुद्राय शूलपाणये स्वाहा अङ्गुष्ठाभ्यां नमः ।  ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः यजामहे ॐ नमो भगवते रुद्राय अमृतमूर्तये मां जीवय जीवय तर्जनीभ्यां स्वाहा ।  ॐ हीं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः सुगन्धिम्पुष्टिवर्धनम् ॐ नमो भगवते रुद्राय चन्द्रशिरसे जटिने स्वाहा मध्यमाभ्यां वषट् ।  ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्व: उर्वारुकमिव बन्धनात् ॐ नमो भगवते रुद्राय त्रिपुरान्तकाय हां ह्रीं अनामिकाभ्यां हुम्।  ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः मृत्योर्मुक्षीय ॐ नमो.भगवते रुद्राय त्रिलोचनाय ऋग्यज...

इक्षा पूर्ति भैरव साधना

नमस्कार दोस्तों आपका एक बार फिर से धर्म रहस्य में स्वागत है आज मैं आप लोगों के लिए कामना पूरक साधना ले कर रहा आया हूं l कामनाओं की पूर्ति के लिए इस साधना को बहुत ही अच्छा माना जाता है l पुराने समय में यह बहुत बात प्रचलित रही है कि इस मंत्र की सिद्धि जिसे हो जाती है उसकी निश्चित रूप से हर मनोकामना पूरी होती है। अगर लंबे समय तक जाप किया जाए तो उसको सिद्धि भी प्राप्ति हो सकती है ।बहुत ताकतवर वह व्यक्ति होता चला जाता है । यह एक शाबर मंत्र है , शाबर मंत्र के लिए कहा जाता है कि साल में एक बार अवश्य मंत्रों को आवश्यक रूप से जगा देना चाहिए, यानी इन मंत्रों को जीवित करना पड़ता है । ये आवश्यक हैं इसलिए ग्रहण काल में साबर मंत्र नष्ट होने लगते हैं तो इसलिए उसी ग्रहण काल में पढकर दोबारा जगाना होता है यानी कि एक ही दिन की साधना से कोई भी साबर मंत्र फिर से जाग जाता है। तो जब भी कभी ग्रहण काल पड़ता है तो आपने कोई भी साबर मंत्र की साधना की है तो यानि पहले 1 साल के अंदर की हो तो आप ग्रहण काल में फिर से जो भी उसका विधि विधान हो उसके अनुरूप सिद्ध कर सकते हैं । ग्रहण काल में अगर आप उसको जपते हैं और हवन कर ...

कालभैरव सवारी (शाबर मंत्र विद्या).

आज मै आपको "कालभैरव" भगवान का सवारी शरीर मे बुलाने का गोपनीय विधी बता रहा हू,जो तंत्र के साथ शाबर मंत्र से नाथमुखी प्राप्त विधान है l सवारी आपको तो पता ही होगा क्युके आप लोग अक्सर ये देखते होगे कुछ लोगो मे भैरव का सवारी हनुमान का सवारी महाकाली जी का सवारी आता है और सवारी आने पर "भगत" (जिस इंसान मे सवारी आता है उसको भगत कहा जाता है ) को जो कुछ पुछा जाये वह उसका सटिक जवाब देता है साथ मे सभी कष्ट, पिडा, बाधा, रोग, समस्याओ से मुक्ती दिलवाता है l आप भी सवारी को अपने शरीर मे बुलाकर जनकल्याण कर सकते है और येसा मत सोचिये के जनकल्याण करेगे तो घर का आर्थिक स्थिति कैसे मजबुत होगा ? आप थोडा ध्यान दे क्युके सुशील नरोले आपको गलत सलाह नही देगा,जब आप जनकल्याण करेगे तो लोगो का भला होगा और जब लोगो का भला होगा तो वही लोग आपको कई रुपया दान मे देगे l किसिसे रुपया माँगना गलत है परंतु दान प्राप्त करना गलत नही है मित्रो,येसा होता तो आप उन लोगो को देखिये जिनमे सवारी आता है l भैरव को भगवान शंकर का ही अवतार माना गया है, शिव महापुराण में बताया गया है- "भैरवः पूर्णरूपो हि शंकरः परात्मनः। म...

त्रिकाल दर्शन साधना

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------  यह विधि अधिकारी गुरु से प्राप्त करने के पश्चात ही आरम्भ करे अथवा लाभ के स्थान पर हानि भी उठाना पड़ सकता है  । कुछ विशेष नियम कीलित है । साधना त्रिकाल-दर्शक गौरी-शिव मन्त्र विनियोगः- अनयोः शक्ति-शिव-मन्त्रयोः श्री दक्षिणामूर्ति ऋषिः, गायत्र्यनुष्टुभौ छन्दसी, गौरी परमेश्वरी सर्वज्ञः शिवश्च देवते, मम त्रिकाल-दर्शक-ज्योतिश्शास्त्र-ज्ञान-प्राप्तये जपे विनियोगः। ऋष्यादि-न्यासः- श्री दक्षिणामूर्ति ऋषये नमः शिरसि, गायत्र्यनुष्टुभौ छन्दोभ्यां नमः मुखे, गौरी परमेश्वरी सर्वज्ञः शिवश्च देवताभ्यां नमः हृदि, मम त्रिकाल-दर्शक-ज्योतिश्शास्त्र-ज्ञान-प्राप्तये जपे विनियोगाय नमः अञ्जलौ। कर-न्यास (अंग-न्यास)ः- ऐं अंगुष्ठभ्यां नमः (हृदयाय नमः), ऐं तर्जनीभ्यां नमः (शिरसे स्वाहा), ऐं मध्यमाभ्यां नमः (शिखायै वषट्), ऐं अनामिकाभ्यां हुं (कवचाय हुं), ऐं कनिष्ठिकाभ्यां वौषट् (नेत्र त्रयाय वौषट्), ऐं करतल-करपृष्ठाभ्यां फट् (अस्त्राय फट्)। ध्यानः- उद्यानस्यैक-वृक्षाधः, परे हैमवते द्विज- क्रीड...

गुरु प्राप्ति साधना

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------  गुरु प्राप्ति साधना 🥀 कुछ लोग देवी देवताओं को , सिद्धात्माओ को गुरु मान कर साधनाये करते है । अछि बात है गुरु मंडल की शक्तियां भी सहायता और मार्गदर्शमकरती है पर एक सीमा तक । और वो भी मनुष्य में इतनी योग्यता हो कि दिव्य संकेतो और संदेशो को समझ सके तब की बात है ।  वैदिक काल से ही देहधारी गुरु का महत्व बताया गया है । भू लोक पर जन्म लेने वाले हर मनुष्य के लिए कहा जाता है - गुरु बिन गति नही रे प्यारे । कोई भी जिसने इस भू लोक पर जन्म लिया है उसका उद्धार गुरु ही कर सकता है । बड़े बड़े सिद्ध हुए चाहे भगवान राम , भगवाम कृष्ण , गुरु गोरखनाथ इन्होंने में भी गुरु धारण किया जबकि यह तो स्वयं भगवान के अवतार थे इन्हें क्या आवश्यकता थी गुरु धारण करने की ?  बाकी सबकी अपनी अपनी सोच है जिसे खुदके अलावा कोई नही बदल सकता है ।  जिनके गुरु नही है उन्हें गुरु प्राप्ति के लिए साधना नीचे दे रहा हूँ करके लाभ उठाएं ।  मंत्र - ॐ गुं गुरुदेव हुं फट सामग्री - सभी चीजें जहां तक संभ...

हनुमान जी के मंत्र

*हनुमान जी के कुछ चमत्कारी सिद्ध मंत्र* *जो साधक पूर्ण श्रद्धा, आस्था एवं लग्न के साथ श्री हनुमान जी का जप, पूजा-पठन आदि कुछ भी करते हैं उनको समस्त सुखों की प्राप्ति होती ही होती है, इसमें लेश मात्र भी संशय नहीं है। हनुमत साधना से लाभ पाये असंख्य लोग इसके साक्षात् उदाहरण हैं। वाचिक, उपांशु अथवा मानसिक कोई भी जप इच्छापूर्ति के लिए कर रहे हैं तो उसके लिए ब्रह्मचर्य, सद्विचार अत्यन्त आवश्यक हैं। मंत्र जप के साथ यदि नैवेद्य, पुष्प तथा सिंदूर के चोले से देव को प्रसन्न करने का यत्न करते हैं तो फल की प्राप्ति बहुत ही शीघ्रता से मिलती है। हनुमान जी से सम्बन्धित बीज, मंत्र, चालीसा, बाहुक, बाण, साठिका आदि कुछ भी कर रहे हैं तो उसके बाद एक माला सीता राम की अवश्य जप लिया करें। मंत्र जप के बाद उस मंत्र का दशांश संख्या में हवन कर लेने से मंत्र सिद्ध हो जाता है। यदि मंत्र जप, दशांश हवन, हवन सामग्री आदि की पूर्ण विधि में जाना है तो उसके विस्तृत ज्ञान के लिए अन्य शास्वत ग्रंथों का अध्ययन मनन करना भी आवश्यक हो जाता है। उचित परामर्श यही है कि जप से पूर्व किसी बौद्धिक व्यक्ति से विषयक चर्चा एवं ज्ञान अवश्य...

नीलकंठ साधना

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------  कौई भी साधना गुरु सानिध्य मैं करै. नीलकंठ अघोर मंत्र स्तोत्र संकल्प:(विनियोग ): ओम अस्य श्री नीलकंठ स्तोत्र-मन्त्रस्य ब्रह्म ऋषि अनुष्टुप छंद :नीलकंठो सदाशिवो देवता ब्रह्म्बीजम पार्वती शक्ति:शिव इति कीलकं मम काय जीव स्वरक्षनार्थे सर्वारिस्ट विनाशार्थेचतुर्विद्या पुरुषार्थ सिद्धिअर्थे भक्ति-मुक्ति सिद्धिअर्थे श्री परमेश्वर प्रीत्यर्थे च जपे पाठे विनियोग: मंत्र प्रयोग ओम नमो नीलकंठाय श्वेत शरीराय नमःसर्पलिंकृत भुषनाय नमः भुजंग परिकराय नाग यग्नोपविताय नमः,अनेक काल मृत्यु विनाशनाय नमः,युगयुगान्त काल प्रलय प्रचंडाय नमः ज्वलंमुखाय नमः दंष्ट्रा कराल घोर रुपाय नमः हुं हुं फट स्वाहा,ज्वालामुख मंत्र करालाय नमः,प्रचंडार्क सह्स्त्रान्शु प्रचंडाय नमः कर्पुरामोद परिमलांग सुगंधीताय नमः इन्द्रनील महानील वज्र वैदूर्यमणि माणिक्य मुकुट भूषणाय नमः श्री अघोरास्त्र मूल मन्त्रस्य नमः ओम ह्रां स्फुर स्फुर ओम ह्रीं स्फुर स्फुर ओम ह्रूं स्फुर स्फुर अघोर घोरतरस्य नमः रथ रथ तत्र तत्र चट चट कह क...

श्रीगुरु स्त्रोतम

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------     श्री गुरु स्तोत्रम् ~ श्री महादेव्युवाच || गुरुर्मन्त्रस्य देवस्य धर्मस्य तस्य एव वा | विशेषस्तु महादेव ! तद् वदस्व दयानिधे || श्री गुरु स्तोत्रम् श्री महादेवी (पार्वती) ने कहा : हे दयानिधि शंभु ! गुरुमंत्र के देवता अर्थात् श्री गुरुदेव एवं उनका आचारादि धर्म क्या है – इस बारे में वर्णन करें | श्री महादेव उवाच || जीवात्मनं परमात्मनं दानं ध्यानं योगो ज्ञानम् | उत्कल काशीगंगामरणं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ||१|| श्री महादेव बोले : जीवात्मा-परमात्मा का ज्ञान, दान, ध्यान, योग पुरी, काशी या गंगा तट पर मृत्यु – इन सबमें से कुछ भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ||१|| प्राणं देहं गेहं राज्यं स्वर्गं भोगं योगं मुक्तिम् | भार्यामिष्टं पुत्रं मित्रं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ||२|| प्राण, शरीर, गृह, राज्य, स्वर्ग, भोग, योग, मुक्ति, पत्नी, इष्ट, पुत्र, मित्र – इन सबमें से कुछ भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ||२|| वा...

पशुपशास्त्र साधना

●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●         ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗ ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬● 👉🏻 प्रिय पाठकों-------  पाशुपतास्त्र मंत्र साधना एवं सिद्धि . शिव का एक भीषण शूलास्त्र जिसे अर्जुन ने तपस्या करके प्राप्त किया था। महाभारतका युद्ध हुआ, उसमें भगवान्‌ शंकरका दिया हुआ पाशुपतास्त्र अर्जुनके पास था, भगवान्‌ शंकरने कह दिया कि तुम्हें चलाना नहीं पड़ेगा । यह तुम्हारे पास पड़ा-पड़ा विजय कर देगा, चलानेकी जरूरत नहीं, चला दोगे तो संसारमें प्रलय हो जायगा । इसलिये चलाना नहीं । इस पाशुपत स्तोत्र का मात्र एक बार जप करने पर ही मनुष्य समस्त विघ्नों का नाश कर सकता है । सौ बार जप करने पर समस्त उत्पातो को नष्ट कर सकता है तथा युद्ध आदि में विजय प्राप्त कर सकता है । इस मंत्र का घी और गुग्गल से हवं करने से मनुष्य असाध्य कार्यो को पूर्ण कर सकता है । इस पाशुपातास्त्र मंत्र के पाठ मात्र से समस्त क्लेशो की शांति हो जाती है । यह अत्यन्त प्रभावशाली व शीघ्र फलदायी प्रयोग है। यदि मनुष्य इस स्तोत्र का पाठ गुरू के निर्देशानुसार संपादित करे तो अवश्य फायदा मिलेगा। शनिदेव शिव भक्त भी हैं और शिव के शिष्य भी हैं। ...

यक्ष और यक्षिणी

कौन होते है यक्ष व यक्षिणी, क्यों करते हैं इनकी साधना..... तंत्र की मान्यता है इस ब्रह्मांड में कई लोक हैं। सभी लोकों के अलग-अलग देवी देवता हैं जो इन लोकों में रहते हैं । पृथ्वी से इन सभी लोकों की दूरी अलग-अलग है। मान्यता है नजदीकि लोक में रहने वाले देवी-देवता जल्दी प्रसन्न होते हैं, क्योंकि लगातार ठीक दिशा और समय पर किसी मंत्र विशेष की साधना करने पर उन तक तरंगे जल्दी पहुंचती हैं। यही कारण कि यक्ष, अप्सरा, किन्नरी आदि की साधना जल्दी पूरी होती है, क्योंकि इनके लोक पृथ्वी से पास हैं। कौन होते हैं यक्ष व यक्षिणी.... यक्षिणी को शिव जी की दासिया भी कहा जाता है, यक्ष का शाब्दिक अर्थ होता है जादू की शक्ति। आदिकाल में प्रमुख रूप से ये रहस्यमय जातियां थीं। देव,दैत्य,दानव, राक्षस,यक्ष,गंधर्व,अप्सराएं, पिशाच,किन्नर, वानर, रीझ,भल्ल, किरात, नाग आदि। ये सभी मानवों से कुछ अलग थे। इन सभी के पास रहस्यमय ताकत होती थी और ये सभी मानवों की किसी न किसी रूप में मदद करते थे। देवताओं के बाद देवीय शक्तियों के मामले में यक्ष का ही नंबर आता है। कहते हैं कि यक्षिणियां सकारात्मक शक्तियां हैं तो पिशाचिनियां नकारात्म...

साधना पथ एवं उसके प्रधान अवयव

# साधना पथ एवं उसके प्रधान अवयव १. संकल्प (विनियोग) संकल्प ही साधना का मुख्य आधार होता है संकल्प ही वो पदार्थ या वस्तु है जिसकी प्राप्ति के लिए साधना की जाती है इसके अंग इसप्रकार हैं (क) स्थानः-- संकल्प लेतेसमय वो स्थान जो ब्रह्माण्ड मे जिस अक्षांश और देशांतर पर आप विद्यमान हैं। (ख)मुहूर्त :-- काल का वह अंश या भाग जो संकल्प के समय विद्यमान हो ये मुहूर्त ही है जो संकल्प को को सिद्ध होने मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है अतः संयम पूर्वक इसका विचार करना चाहिए।  (ग)ऋषि:-- वह वैज्ञानिक महापुरुष या गुरु जिसके सिद्धांत से आप का संकल्प पूर्णता मे योगदान हो रहा हो  (घ)छंद:--ऋषि द्वारा निर्मित आप के संकल्प की सिद्धि हेतु की जाने वाली प्रार्थना की लय जो आप के संकल्प को आबद्ध करे । (डं)मंत्र:-- प्रार्थना के छंद  (लय)की सार ध्वनि  (च)शक्ति:--- शक्ति का तात्पर्य उस महाविद्या (क्रियाशक्ति) से है जिससे आप का संकल्प उत्पन्न हुआ है (छ) कीलकः--  ऐसी तिजोरी जिसमे संकल्प को रखना होता है जिससे आप का संकल्प विनष्ट न हो। (ज)प्रकार :--आप के संकल्प का हेतु अर्थात सकाम (अर्थ,काम,और,मोक्ष)या ...

बीजाक्षरों का संक्षिप्त कोष

*बीजाक्षरों का संक्षिप्त कोष* *ऊँ*—प्रणव, ध्रव, तैजस बीज है। *ऐं*—वाग् और तत्त्व बीज है। *क्लीं*—काम बीज है। *हों*—शासन बीज है। *क्षीं*—पृथ्वी बीज है। *प*—अप् बीज है। *स्वा*—वायु ब...