साधना पथ एवं उसके प्रधान अवयव

# साधना पथ एवं उसके प्रधान अवयव

१. संकल्प (विनियोग)
संकल्प ही साधना का मुख्य आधार होता है संकल्प ही वो पदार्थ या वस्तु है जिसकी प्राप्ति के लिए साधना की जाती है इसके अंग इसप्रकार हैं

(क) स्थानः-- संकल्प लेतेसमय वो स्थान जो ब्रह्माण्ड मे जिस अक्षांश और देशांतर पर आप विद्यमान हैं।

(ख)मुहूर्त :-- काल का वह अंश या भाग जो संकल्प के समय विद्यमान हो ये मुहूर्त ही है जो संकल्प को को सिद्ध होने मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है अतः संयम पूर्वक इसका विचार करना चाहिए। 

(ग)ऋषि:-- वह वैज्ञानिक महापुरुष या गुरु जिसके सिद्धांत से आप का संकल्प पूर्णता मे योगदान हो रहा हो 

(घ)छंद:--ऋषि द्वारा निर्मित आप के संकल्प की सिद्धि हेतु की जाने वाली प्रार्थना की लय जो आप के संकल्प को आबद्ध करे ।

(डं)मंत्र:-- प्रार्थना के छंद
 (लय)की सार ध्वनि 

(च)शक्ति:--- शक्ति का तात्पर्य उस महाविद्या (क्रियाशक्ति) से है जिससे आप का संकल्प उत्पन्न हुआ है

(छ) कीलकः--  ऐसी तिजोरी जिसमे संकल्प को रखना होता है जिससे आप का संकल्प विनष्ट न हो।

(ज)प्रकार :--आप के संकल्प का हेतु अर्थात सकाम (अर्थ,काम,और,मोक्ष)या निष्काम(धर्म)

(झ)जपः--- ये आप के संकल्प के हेतु का संस्मरण है इसे सम्पूर्ण साधना काल मे बनाए रखना होता है

(ड़ं.)विनियोग:-- साधना के समस्त अवयवों का संघटन या संयोजन जिससे साधना के समस्त अंग मिलकर सिद्धि  संस्फुटित हो जाय।

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