पतिब्रत क्या है

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    ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗
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👉🏻 प्रिय पाठकों-------
चर्चा🤔🤔🤔
पतिर्बन्धु गतिर्भर्ता दैवतं गुरूरेव च।
सर्वस्याच्च परः स्वामी न गुरू स्वामीनः परः।।
(ब्रह्मवैवतं पु. कृष्ण जन्म खं 57-11)

अर्थ == *स्त्रियों का सच्चा बन्धु पति है, पति ही उसकी गति है। पति ही उसका एक मात्र देवता है। पति ही उसका स्वामी है और स्वामी से ऊपर उसका कोई गुरू नहीं।।

भर्ता देवो गुरूर्भता धर्मतीर्थव्रतानी च।
तस्मात सर्वं परित्यज्य पतिमेकं समर्चयेत्।।
(स्कन्द पु. काशी खण्ड पूर्व 30-48)

अर्थ == *स्त्रियों के लिए पति ही इष्ट देवता है। पति ही गुरू है। पति ही धर्म है, तीर्थ और व्रत आदि है। स्त्री को पृथक कुछ करना अपेक्षित नहीं है।

दुःशीलो दुर्भगो वृध्दो जड़ो रोग्यधनोSपि वा।
पतिः स्त्रीभिर्न हातव्यो लोकेप्सुभिरपातकी।।
(श्रीमद् भा. 10-29-25)

अर्थ == *पतिव्रता स्त्री को पति के अलावा और किसी को पूजना नहीं चाहिए, चाहे पति बुरे स्वभाव वाला हो, भाग्यहीन, वृध्द, मुर्ख, रोगी या निर्धन हो। पर वह पातकी न होना चाहिए।

विशेष ,, उपरोक्त लेख में जहाँ पत्नियों के लिए " पतिव्रत धर्म " के पालन का परामर्श दिया गया है वही पतियों के लिए भी गृहस्थ आश्रम की मर्यादाओं का पालन करने का विधान है ! यहाँ हम पत्नियों के लिए ही बता रहे है ! अगर एक पत्नी स्त्री धर्म का पालन नहीं करती है तो उसका " कर्मफल " यानि पाप का परिणाम होगा --- " उसके प्रारब्ध ( भाग्य ) में जो पाप संचित होगा वह है --- 

*पति प्रतिकूल जनम जहँ जाई। बिधवा होइ पाइ तरुनाई॥ *

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