वेद पुरुष मूर्त रूप

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वेद रूप पुरुष के मुख्य छह अंगो में ---
व्याकरण शास्त्र ....वेद का मुख ,
ज्योतिष शास्त्र ....दोनों नेत्र ,
निरुक्त ....दोनों कान ,
कल्प शास्त्र ....दोनों हाथ ,
शिक्षा शास्त्र ....वेद की नासिका और
छंद शास्त्र ....वेद पुरुष के दोनों पैर कहे गए है ।
वेदांग / Vedang
• वेद पुरुष के 6 अंग माने गये हैं- कल्प, शिक्षा, छन्द, व्याकरण,
निरुक्त तथा ज्योतिष। मुण्डकोपनिषद में आता है-
'तस्मै स हो वाच। द्वै विद्ये वेदितब्ये इति ह स्म यद्ब्रह्म
विद्यौ वदंति परा चैवोपरा च॥
तत्रापरा ॠग्वेदो यजुर्वेद: सामवेदोऽर्थ वेद: शिक्षा कल्पो व्याकरणं
निरुक्तं छन्दोज्योतिषमिति। अथ परा यथा तदक्षरमधिगम्यते॥'*
'अर्थात मनुष्य को जानने योग्य दो विद्याएं हैं-परा और अपरा। उनमें
चारों वेदों के शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद, ज्योतिष- ये सब
'अपरा' विद्या हैं तथा जिससे वह अविनाशी परब्रह्म
तत्व से जाना जाता है, वही 'परा' विद्या है।'
इन छ: को इस प्रकार बताया गया है- ज्योतिष वेद के दो नेत्र हैं,
निरुक्त 'कान' है, शिक्षा 'नाक', व्याकरण 'मुख' तथा कल्प
'दोनों हाथ' और छन्द 'दोनों पांव' हैं-
शिक्षा घ्राणं तु वेदस्य, हस्तौ कल्पोऽथ पठ्यते मुखं व्याकरणं
स्मृतम्।
निरुक्त श्रौतमुच्यते, छन्द: पादौतु वेदस्य ज्योतिषामयनं चक्षु:॥
वैदिकमन्त्रों के स्वर, अक्षर, मात्रा एवं उच्चारण
की विवेचना 'शिक्षा' से होती है।
शिक्षाग्रन्थ जो उपलब्ध हैं-पाणिनीय शिक्षा (ॠग्वेद),
व्यास शिक्षा (कृष्ण यजुर्वेद), याज्ञवल्क्य आदि 25 शिक्षाग्रन्थ
(शुक्ल यजुर्वेद), गौतमी, नारदीय,
लोमशी शिक्षा (सामवेद)
तथा माण्डूकी शिक्षा (अथर्ववेद)।
भाषा नियमों का स्थिरीकरण 'व्याकरण' का कार्य है।
शाकटायन व्याकरण सूत्र तथा पाणिनीय व्याकरण यजुर्वेद
से सम्बद्ध माने जाते हैं। इनके अतिरिक्त सारस्वत व्याकरण, प्राकृत
प्रकाश, प्राकृत व्याकरण, कामधेनु व्याकरण, हेमचन्द्र व्याकरण
आदि अनेक व्याकरण शास्त्र के ग्रन्थ भी हैं।
सभी पर अनेक भाष्य एवं टीकाएं
लिखी गयी हैं। अनेक व्याकरण-ग्रन्थ लुप्त
हो गए हैं।
वेदों की व्याख्या पद्धति बताना 'निरुक्त' का कार्य है।
इसके अनेक ग्रन्थ लुप्त हैं। निरुक्त को वेदों का विश्वकोश
कहा गया है। अब यास्क का निरुक्त ग्रन्थ उपलब्ध है, जिस पर
अनेक भाष्य रचनाएं हुई हैं।
'छन्द' के कुछ ग्रन्थ ही मिलते हैं, जिसमें वैदिक
छन्दों पर गार्ग्यप्रोक्त उपनिदान-सूत्र (सामवेदीय), पिंगल
नाग प्रोक्त छन्द: सूत्र (छन्दोविचित) वेंकट माधव क्ड़ड़त
छन्दोऽनुक्रमणी, जयदेव कृत छन्दसूत्र के अतिरिक्त
लौकिक छन्दों पर छन्दशास्त्र (हलायुध वृत्ति),
छन्दोमञ्जरी, वृत्त रत्नाकर, श्रुतबोध आदि हैं।
जब ब्राह्मण-ग्रन्थों में यज्ञ-
यागादि की कर्मकांडीय व्याख्या में
व्यवहारगत कठिनाइयाँ आईं, तब
कल्पसूत्रों की 'प्रतिशाखा' में रचना हुई। ॠग्वेद के
प्रातिशाख्य वर्गद्वय वृत्ति में कहा गया है-
'कल्पौ वेद विहितानां कर्मणामानुपूर्व्येण कल्पनाशास्त्रम्।'
'अर्थात् 'कल्प' वेद प्रतिपादित कर्मों का भली-प्रकार
विचार प्रस्तुत करने वाला शास्त्र है। कल्प में
यज्ञों की विधियों का वर्णन होता है।'
ज्योतिष का मुख्य प्रयोजन संस्कार एवं यज्ञों के लिए मुहूर्त
निर्धारण करना है एवं यज्ञस्थली, मंडप आदि का नाम
बतलाना है। इस समय लगधाचार्य के वेदांग ज्योतिष के अतिरिक्त
सामान्य ज्योतिष के अनेक ग्रन्थ है। नारद, पराशर, वसिष्ठ
आदि ॠषियों के ग्रन्थों के अतिरिक्त वाराहमिहिर, आर्यभट्ट,
ब्राह्मगुप्त, भास्कराचार्य के ज्योतिष ग्रन्थ प्रख्यात हैं। पुरातन
काल में ज्योतिष ग्रन्थ चारों वेदों के अलग-अलग थे-आर्ष ज्योतिष
(ॠग्वेद), याजुष ज्योतिष (यजुर्वेद) और आथर्वण ज्योतिष
(अथर्ववेद)।

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