शक्तिपात भाग1 एवं भाग 2
*शक्तिपात सूत्र भाग-१*
*१. अथातः शक्तिपातं व्याख्यास्यामः ।*
अब यहाँ से हम शक्तिपात की व्याख्या करेंगे।
*'अथ'* शब्द का प्रयोग मङ्गलार्थ किया जाता है। जैसा कि कहा है-
*ॐकारश्चाथ शब्दश्च द्वावेतौ ब्रह्मरणः पुरा।*
*कण्ठं भित्त्वा विनिर्यातौ तस्मान्माङ्गलिकावुभौ ॥*
-ॐकार' और 'अथ' दोनों शब्द पहले ब्रह्माजी के कण्ठ को भेद कर बाहर निकले थे, इसलिए ये दोनों माङ्गलिक शब्द हैं।' यहाँ पर 'अथ' शब्द का प्रयोग आनन्तर्यार्थ में किया गया है। यद्यपि 'शक्तिपात' की दीक्षा ग्रहण करने के लिए किसी पूर्व साधन अथवा किसी शास्त्र के अध्ययन की अनिवार्य आवश्यकता नहीं है। जिस पर गुरु अनुग्रह करते हैं, उसी को इस की प्राप्ति हो सकती है, चाहे शिष्य शास्त्रों का विद्वान् हो, चाहे कुछ भी पढ़ा न हो, उस ने योगानुष्ठान किया हो अथवा न किया हो । बिना पूर्वानुष्ठित तैयारी की अपेक्षा के, गुरु के 'शवितपात' रूप अनुग्रह से, शिष्य की शक्ति का उद्बोधन हो जाता है ।
यहाँ 'शक्तिपात' के विज्ञान की व्याख्या करने का तात्पर्य यह है कि आधुनिक भौतिक विज्ञानों के अन्वेषणों के सदृश्य पूर्वाचार्यों की अपेक्षा न रखता हो,—यह ऐसा स्वतन्त्र विज्ञान नहीं है। शक्तिपात एक साधन है जिसके द्वारा अधिकारी-शिष्य में गरु के अनुग्रह से हठात् योग, भक्ति एवं ब्रह्मात्मैक्य-ज्ञान का आवेश जागृत किया जा सकता है। भगवान् महर्षि पतञ्जलि ने चित्त की वृत्तियों के निरोध के लिए आठ साधन कहे हैं और उन आठों के अन्तर्गत ही वृत्ति-निरोध के समस्त साधनों का समावेश है। तदनुसार यह साधन भी उक्त आठ साधनों के अन्तर्गत ही है, जैसाकि आगे बताया जायेगा। इस दृष्टि से पातञ्जल दर्शन की तरह
यहाँ भी *'अथ'* शब्द का प्रयोग अधिकरण अर्थ में समझा जाना उचित प्रतीत होता है। परन्तु ऐसा नहीं है, क्योंकि शक्तिपात दीक्षा का अधिकारी बनने के लिए पूर्वाजित सत्कर्मों अथवा अन्तःकरण-शुद्धि के विभिन्न साधनों के अनुष्ठान की आवश्यकत है।
पातञ्जल दर्शन में बताये हए चित्तवृत्ति-निरोध के आठ उपाय ये हैं:-
*1-अभ्यास वैराग्याभ्यां तन्निरोधः-*
उनका निरोध अभ्यास और वैराग्य द्वारा होता है । इन दोनों की सर्वोपरि गणना।है, क्योंकि अभ्यास के बिना कोई साधन नहीं हो सकता और अभ्यास का दृढ़ रखने के लिए सांसारिक विषयों एवं स्वर्गादि अथवा योग की सिद्धियों के प्रलोभनों से वैराग्य का धारा-प्रवाह होना सदा आवश्यक है । वैराग्य का अर्थ भोगों का त्याग नहीं है, क्योंकि सुख-दुःखों को भोगने के लिए तो जन्म होता ही है। वैराग्य से अनासक्ति का ही अर्थ ग्रहण करना चाहिए। जो मनुष्य वीतराग- द्वेष होकर संसार के सभी विषयों का धर्मयुक्त उपभोग करते हैं, वे विरक्त ही हैं।
*(२) ईश्वर: प्रणिधानाद्वा-*
अथवा ईश्वर-प्रणिधान से भी वृत्तियों का निरोध होता है। ईश्वर-प्रणिधान का अर्थ ईश्वरार्पण अथवा ईश्वर-शरणागति समझना चाहिए। पर-प्रेमरूपा भक्ति भी इसी का अङ्ग कही जा सकती है, क्योंकि समर्पण अथवा शरणागति में अनन्यता का भाव ओतप्रोत है।
प्रणिधान' शब्द से एक विशेष अर्थ की भी ध्वनि निकलती है। प्र+नि+धान=प्र (प्रकर्ष), नि (निश्चयपूर्वक) । 'धा' धातु से ल्युट् प्रत्यय द्वारा 'प्रणिधान' शब्द की व्युत्पत्ति है । 'धा' धातु का अर्थ 'धारण करना है। ईश्वर प्रत्येक प्राणी के हृदय में निवास करते हैं । यद्यपि वे परोक्ष रहते हैं तथापि श्रद्धावान् भक्तों के हृदय में शक्तिपात द्वारा प्रकट हो जाते हैं और प्रत्यक्ष होकर साधक को अपनी साम्यता प्रदान करते हैं।
*यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम् ।*
*तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरञ्जन: परम साम्यतामुपैति ।*
—मुण्डक
पातञ्जल दर्शन में ईश्वर को जीवभाव से रहित, सर्वज्ञता का बीज और पूर्वजों का भी गुरुरूप पुरुषविशेष कहा है। इसका आभप्राय यह है कि मन-बुद्धि की पहुँच से भी परे इस पुरुषविशेष रूपी गुरु का साक्षात् अपनी देह में ज्ञानमयी शक्ति में सर्वज्ञता के बीज के क्रमशः विकास द्वारा किया जाता है । इसको ही क्रिया-योग' की संज्ञा दी है जिस का फल क्लेशों का तनूकरण और समाधि-भावनार्थ कहा गया है। तब अविद्यादि के क्षयाभिमुख होने पर अष्टाङ्ग योग अथवा अन्य किसी परिश्रम-साध्य साधन की अपेक्षा नहीं रहती।
*'समाधिसिद्धिरीश्वर प्रणिधानात् ।'*
*प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य*
-अथवा प्राण के
रेचन और विधारण द्वारा भी निरोध होता है।
(४) *विषयवती वा प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनसः स्थितिनिबन्धिनि-*
अथवा मन की स्थिति को बांधने वाली (दिव्य गन्ध, दिव्य रस, दिव्य रूप, दिव्य स्पर्श और दिव्य शब्द) विषयवती प्रवृत्ति के उत्पन्न होने से भी चित्त की वृत्तियों का निरोध होता है, क्योंकि सांसारिक विषयों से चित्त में स्वभावतः उपरति होकर इन्द्रियाँ अन्तर्मुखी होने लगती हैं।
*(५) विशोका वा ज्योतिष्मती-*
अथवा विशोका नाम की
ज्योतियों के दर्शन होने से भी वृत्तियों का निरोध होता है।
*(६) वीतराग विषयं वा चित्तम्*
अथवा ऐसे चित्त का आलम्बन लेने से, जो साधन-सम्पन्न होकर वीतराग हो चुका है।
यहाँ पर ऐसे गुरुजनों के चित्त का आलम्बन लेने का उपदेश किया गया है जो राग-द्वेष से मुक्त हो गये हैं। उन के चित्त का आलम्बन किस प्रकार लिया जा सकता है ? यह बात विचारणीय है। बहतों का मत है कि उनके फोटो आदि के ध्यान अथवा स्मरण-मात्र से उनके चित्त का आलम्बन मिल जाता है। यह बात सर्वथा निमूल तो नहीं है, क्योंकि अनुभव से देखा गया है कि ऐसे महात्माओं के ध्यान अथवा स्मरण से लाभ होता है। परन्तु इस प्रकार हर किसी को यथेष्ट लाभ की सम्भावना नहीं है। दूसरी रीति, जिससे उनके चित्त का आलम्बन मिलता है, वह 'शक्ति- पात' है, क्योंकि शक्तिपात वीतराग गुरुओं के अनुग्रह से ही हुआ करता है। इसमें पूर्ण लाभ की प्राप्ति होती है ।
*(७) स्वप्न निद्रा ज्ञानालम्बनं वा*
अथवा स्वप्न और निदा के (अथवा स्वप्न और निद्रा में आये हुए) ज्ञान का आलम्बन लेने से भी वृत्तियों का निरोध होता है।
स्वप्न और निद्रा के ज्ञान में एक विशेषता यह है कि तब जाग्रतावस्था का देहाभिमान नहीं रहता। स्वप्न में तो उसके स्थान पर काल्पनिक देहाभिमान खड़ा हो जाता है। इसलिए जागृति में स्वप्न की सी अवस्था लाने से देहाध्यास पर नियन्त्रण पाया जा सकता है। दोनों अवस्थाओं में जागृत की इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, स्मृति सब अपने-अपने कारणों में विलीन होते हैं। सुषप्ति में केवल प्राण कार्य करता है । स्वप्न में संस्काराशय के संस्कार उदयास्त होते रहते हैं। सुषप्ति को प्रकृति की अव्यक्त दशा एवं कारण शरीर समझना चाहिए जिसमें तीनों गुणों की साम्या- वस्था रहती है और अविद्या के वशीभूत जीव अपने स्वरूप में स्थित नहीं होता । सुषुप्ति को भी चित्त की एक वृत्ति कहा गया है। चित्त से तादात्म्य मानने के कारण, अन्य वृत्तियों के सदृश्य, उसकी इस वृत्ति से भी आत्मा बन्धन में रहता है। इसलिए सुषुप्ति का भी निरोध होने पर समाधि में दृष्टा की स्वरूप-स्थिति कही गयी है।
*(८) यथाभिमद्ध्यानाद्वा*
अथवा जैसा भी ध्यान किसी को
अच्छा लगे, उसी ध्यान से वृत्तियों का निरोध होता है। हर एक प्रकार के साधन में चित्त की प्रसन्नता अति आवश्यक है। इसलिए चित्त को सदा प्रसन्न रखने का उपाय और उपदेश भी साथ-साथ दिया गया है कि सखी को देखकर मित्रता, दुखी को देख कर दया, पुण्यात्मा को देख कर प्रसन्नता और पापी को देखकर उपेक्षा का भाव लाने से चित में आध्यात्मिक प्रसाद आता है।
यद्यपि शक्तिपात द्वारा उपरोक्त सभी साधन स्वयं होते हैं, परन्तु इस विज्ञान का सम्बन्ध विशेष रूप से 'वीतराग विषयं वा चित्तम्' से ही है।
शक्तिपात द्वारा योग एवं भक्ति के ही दिव्यावेश जागृत नहीं होते, वरन् ब्रह्म का ज्ञान भी शक्तिपात दीक्षा द्वारा ही होता है, अन्यथा नहीं। जसा कि कहा है-
*तत्त्व ज्ञानेन मायाया बाधो नान्येन कर्मणा ।*
*ज्ञानं वेदान्तवाक्योत्थं ब्रह्मात्मैकत्व गोचरम् ।।*
*तच्च देव प्रसादेन गुरोः साक्षान्निरीक्षणात् ।*
*जायते शक्तिपातेन वाक्यादेवाधिकारिणाम् ।।*
-ब्रह्मणिका
-माया का बाध तत्त्व-ज्ञान से होता है, अन्य कर्म से नहीं जो वेदान्त-वावयों द्वारा ब्रह्म और जीव के एकत्त्व की अनुभूति कराता है, वह ज्ञान ईश्वर के प्रसाद और गरु के साक्षात निरीक्षण से अधिकारियों में महा वाक्य के उपदेश द्वारा शक्तिपात करने से उदय होता है।
*शक्तिपात सूत्र*
*भाग-२*
जिस शक्ति का उल्लेख प्रथम सूत्र में किया गया है वह कैसी है ? प्रकृति से उत्पन्न होने वाली विद्युदादि के सदृश है अथवा भिन्न प्रकार की; इस शंका का उत्तर नीचे दिया जाता है।
*२. शक्तिर्यात्मनः श्रुतेः।*
यह शक्ति प्रात्मा से ही है, श्रुति का प्रमाण है। वेदों में इस शक्ति का स्थान स्थान पर वर्णन मिलता है। यहां पर हम *अथर्व संहिता* के एकादश काण्ड में आठवें सूक्त के १६-१७ मन्त्रों द्वारा स्पष्ट रूप से दिये हुये वर्णन का उल्लेख करते हैं।
*यत्तछरीरे मशयत् संधया संहितं महत् ।*
*येनेदमद्य रोचेत को अस्मिन् वर्णमाभरत् ॥*
*सर्वे देवा उपाशिक्षन् तद जानाद् वधूः सती।*
*ईशा वशस्य या जाया सास्मिन् वर्णमाभरत् ॥*
अर्थ यह बड़ा शरीर 'संधा' (जोड़ने वाली) नाम की शक्ति से जुड़ा हुआ भी निश्चेष्ट पड़ा हुआ था। जिसके कारण यह अब अच्छा लगता है वह कौन है ? जिसने इसमें प्रकाश का आभरण किया है। ऐसा सब देवताओं ने जानने की प्रार्थना की, तब उस धारण करने वाली वधू सती ने बताया कि।ईश्वरी परमेश्वर की ( शक्ति ) जो उसकी जाया (पत्नी) है उसने इस शरीर में वर्ण अर्थात चेतना रूप प्रकाश का आभरण किया है।
शक्तियां दो प्रकार से उत्पन्न होती हुई देखी जाती हैं -
(१) यन्त्रों द्वारा, जैसे भाप के दबाव से बनाई हुई रेलवे एंजिन आदि की शक्ति अथवा बैटरी या डायनुमो जैसे यन्त्रों से उत्पन्न की हुई विद्युदादि की शक्ति
(२) मनुष्यों अथवा पशुओं के शरीर के बल से उत्पन्न हुई शक्ति । जो कार्य यंत्रों द्वारा किया जाता है वह कार्य छोटे पैमाने पर बैल, भैंस, घोड़े आदि पशुओं के शारीरिक बल अथवा मनुष्य के शारीरिक बल से भी वैसे ही किया जा सकता है, और दोनों का कार्य एक सदृश ही प्रतीत होता है। क्या शक्तिपात में उल्लिखित शक्ति भी इसी प्रकार की शक्ति है ? यद्यपि मनुष्य और पशुओं के शारीरिक बल से उत्पन्न शक्ति वास्तव में आत्मा से ही उदित है अथवा आत्मा हीउसका कारण है परन्तु इसका कार्य अचेतन यंत्रों से उत्पन्न शक्तियों के समान ही जड़वत् होता है। इसलिए दोनों में कोई भेद नहीं दीख पड़ता। दोनों अचेतनवत् कार्य करती हैं। इस शंका का समाधान आगे किया जाता है।
*३. चितिर्वा*
अथवा वह चिति शक्ति ही है।
चिति का तात्पर्य यह है कि शक्ति चेतना से भिन्न नहीं । इसलिये वह चेतन शक्ति है न कि अचेतन ।
*४ ज्ञानवती च ।*
और ज्ञानवती भी है।
*५ प्राणोवा श्रुतेः।*
अथवा उसको प्राण भी कहते हैं, श्रुति का प्रमाण है। वेदों ने संहिताओं; ब्राह्मण, और उपनिषदों में सर्वत्र प्राणों की उपासना करने का विधान किया है और प्राण के स्वरूप, स्थान और उद्गम का भी बार बार वर्णन किया है। वेदोक्त प्राण श्वास और प्रश्वास की गति से अतिरिक्त कोई अन्य पदार्थ है और वह आत्मा से उत्पन्न होने पर भी अथवा आत्मा या ब्रह्म का स्वरूप होने पर भी व्यक्त शक्ति का रूप धारण किये हुये है जैसा कि नीचे दी हुई श्रुतियों से स्पष्ट है।
*आत्मन एष प्राणो जायते, मनोकृतेनाऽऽयात्यस्मिन् शरीरे।* (प्रश्न ३, ३)
अर्थ-आत्मा से यह प्राण उत्पन्न होता है, मन के सहारे.से यह शरीर में आता है।
*एतस्मात् जायते प्राणः। (मुण्डक २-१-३)*
अर्थ-प्राण ब्रह्म से उत्पन्न होता है।
*सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि प्राणमेवाभिसं- विशंति प्राणम् भ्युज्जिहते । (छां १।११।५ )*
निश्चयपूर्वक ये सब सृष्टि प्राण में ही लय होती है और प्राण से ही उत्पन्न होती है।
*या प्राणेन संभवत्यदिति देवतामयी, गुहां प्रविष्यतिष्टंती या भूतेभिर्व्यजायत, एतह तत् । (कठ ४७)*
अर्थ-देवतामयी जो 'अदिति' शक्ति प्राण के द्वारा उत्पन्न होती है, हृदयाकाश रूपी गुफा में प्रवेश करके वहां ठहरी हुई भूतों के द्वारा व्यक्त होती है, निश्चय से यह ब्रह्म ही हैं।
*प्राणवन्धनं हि सौम्य मनः (छा० ६।८।२)*
हे सौम्य, निश्चय से मन प्राण के बंधन में है।
*स एष प्राण एव प्रज्ञात्मानन्दोऽजरोऽमृतः। (कौषतिकी ब्राह्मणोपनिषत् ३८)*
वह आनन्द स्वरूप, अजर, अमर, प्रज्ञात्मा यह प्राण ही है।।ब्रह्म सूत्रों में-
*अतएव प्राणः (१११।२३)*
सूत्र द्वारा कहा है कि यह प्राण श्वास प्रश्वास गति स्वरूप वायुनहीं है, किन्तु ब्रह्म ही है। आत्मा का अर्थ शुद्ध स्वरूप आत्मा अथवा ब्रह्म ही समझना चाहिये। पिण्ड में शुद्ध आत्मा और ब्रह्मांड में ब्रह्म अथवा दोनों जगह ब्रह्म ही कह सकते हैं। जो लोग जीव ब्रह्म की एकता नहीं मानते उनको आत्मा का अर्थ बंधन में पड़े हुवे अहंकारादि उपाधियों से युक्त जीव नहीं मानना चाहिये वरन् अन्तर्यामी परमात्मा ही समझना चाहिये। क्योंकि परमात्म- शक्ति ही मोक्ष साधन करा सकती।
शक्ति, शक्तिमान् से भिन्न नहीं, न उससे पृथक् अन्य वस्तु है। हम शक्ति के भौतिक और चेतन दो रूप देखते हैं। प्रकृति के सब कार्यों को चलाने के लिए अनन्तशक्ति भण्डार प्रकृति में दीख पड़ता है। पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश के अण अण में इतनी शक्तिभरी हई है कि आधनिक वैज्ञानिकों की बुद्धि उसका परिमाण जांचने में अभी तक असमर्थ ही रही है। प्रकृति के साधारण से कार्यो में अनन्त शक्ति का उत्पन्न होना और लय होना देखा जाता है। साधारण सी बादल की गरजना में इतनी विद्युच्छक्ति उत्पन्न होकर लय हो जाती है जितनी बड़े से बड़े विद्युद् यंत्रालय नहीं उत्पन्न कर सकते। ऐसा ही हाल चेतन शक्ति का भी है। हाथी, सिंह आदि पशुओं में कितनी शक्ति खर्च होती रहती है। दोनों प्रकार की चेतन अचेतन शक्तियों का शक्तिमान कौन है ? हम ईश्वर को।यदि सर्व शक्तिमान् मानते हैं तो यह मानना भी अनुचित नहीं कि जड़ चेतनमय जगत् में जो कुछ व्यापार घटित होते हैं वे सब उस शक्तिमान की शक्ति के ही कार्य हैं। यदि ऐसा माना जाय तो क्या प्रकृति की संचालक इन शक्तियों को ही शक्तिमान्।समझ लिया जाय, अथवा शक्तिमान् शक्ति से भिन्न ही है।
इसका उत्तर समझाने के लिये हम एक दृष्टांत देकर विचार करते हैं। थोड़ी देर के लिये यह मान लें कि मनुष्य की शक्ति सर्व शक्तिमान् से भिन्न शरीरस्थ आत्मा की ही है । हम देखते हैं कि मनुष्य की शक्ति बाल, युवा, वृद्ध, स्वस्थ तथा रुग्ण अवस्था भेद से न्यूनाधिक होती रहती है। क्या इस शक्ति को उत्पन्न करने वाला आत्मा कभी कम और कभी अधिक शक्ति वाला हो जाता है। फिर वही आत्मा जन्मान्तर में कीट आदि के शरीरों को त्याग कर पशु और मनुष्य शरीरों को धारण करता है । तो क्या आत्मा की शक्ति में परिवर्तन हो जाता है ?यदि ऐसा माना जाय तो आत्मा विकारी और परिवर्तनशील मानना पड़ेगा परन्तु यह सिद्धांत के विरुद्ध बात है।
इसलिये यह सिद्ध होता है कि आत्मा, जो स्वयं असंग है शरीर, मन, बुद्धि और अहंकार की उपाधि के कारण न्यूनाधिक शक्ति वाला प्रतीत होता है । बालक के शरीर में कम बल होता है, युवा अवस्था में अधिक, इसका कारण अात्मा का विकार नहीं है वरन शरीर रूपी उपाधि का विकार है। मनुष्य अपने बल का अनुमान नहीं कर सकता और साहस, धैर्य और हिम्मत से अपने बल की वृद्धि कर लेता है।
इससे यही सिद्ध होता है कि आत्मा निर्विकार होते हुये भी अहंकार द्वारा शरीरादि उपाधियों से शक्ति की व्यक्तता प्रकट करता रहता है। वास्तव में आत्मा अनन्त शक्तिमान होते हुये भी निष्क्रिय रहता है और उसकी शक्ति उसमें सदा एक समान अव्यक्त रहती है। परन्तु उसके प्रकाश के कारण शरीरादिक उपाधियों में शक्ति की व्यक्तता होती रहती है। आत्मा एक चुम्बक पत्थर के सदृश है जिसके वातावरण (चुम्बकीय क्षेत्र) में लोहे के टुकड़े शक्ति व्यक्त करते रहते हैं। परन्तु चुम्बकीय क्षेत्र और लोहे के टुकड़ों में नृत्य करने वाली शक्ति दो वस्तु नहीं। इसी प्रकार सर्व शक्तिमान् ब्रह्म और प्रकृति की समस्त जड़ चेतनमय शक्तियों को समझना चाहिये।
सांख्य के मतानुसार प्रकृति के पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, ५ तन्मात्राएं, ५ कर्मेन्द्रियां, ५ ज्ञानेन्द्रियां, मन, अहंकार, महत्तत्व और अव्यक्त २४ तत्व हैं। ये सब परमात्मशक्ति के कारण जड़ चेतन मय शक्ति व्यक्त करते रहते हैं। प्रथम पांच तत्वों में शक्ति की।व्यक्तता अचेतनवत् है और शेष १८ तत्वों में चेतनवत् । अव्यक्त।में बीज की तरह प्रसुप्त रहती है अन्य तत्व उसके क्रियात्मक रूप हैं। अव्यक्त प्रकृति है , महत अहंकार, पंचतन्मात्रायें।ये सप्त प्रकृति विकृति स्वरूप हैं , मन, पांच ज्ञानात्मक और पांच क्रियात्मक इन्द्रियां, ५ महाभूत ये १६ विकृति स्वरूप हैं , पुरुष न प्रकृतिहै न विकृति है ।
इसलिये शक्ति ब्रह्म ही है और उपरोक्त श्रुतियों का तात्पर्य यह ही है कि वह ब्रह्म ही प्राण है। यद्यपि शरीर में प्राण के पांच क्रियात्मक रूप, प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान प्रतीत होते हैं और बाहर सूर्यशक्ति प्राण, पृथ्वी की आकर्षण शक्ति अपान, आकाश समान वायु व्यान और अग्नि उदान हैं। ब्रह्म रूपी चुम्बक के चुम्बक क्षेत्र को प्राण कहते हैं वह उपाधियों के आधार पर नाना रूप से चेतन अचेतन शक्ति की व्यक्तता का कारण है। परन्तु चुम्बक और चुम्बक क्षेत्र स्थूल और सूक्ष्म होने के कारण अलग अलग मालूम होते हैं।
ब्रह्म तो सर्व व्यापी होने के कारण सत् चित् आनन्द स्वरूप चुम्बक क्षेत्र ही है जिसमें कभी कोई विकार।नहीं होता, सदा अव्यय और प्रशान्त रहता है। वह न कभी प्रसुप्त रूप धारण करता है न क्रियात्मक,।प्रकृति उसकी माया है। जो शक्ति पांच महाभूतों के आधार से व्यक्तता में आती है उसको हम जड़शक्ति कहते हैं। इन्द्रिय, मन, बुद्धि और अहंकार के आधार से जिसकी व्यक्तता है वह चेतन कहलाती है, परन्तु महत् तत्व और उससे उत्पन्न हुये अहंकार के आधार से जो व्यक्त होती है वह ही आध्यात्मिक शक्ति है, जिसका प्रयोग शक्तिपात में होता है। कहा है:-
*'यदिदं किञ्च जगत्सर्वं प्राण एजति निसृतं' (कठ)*
अर्थात् जो कुछ यह जगत् है वह सब ब्रह्म से निमृत प्राण का ही स्पन्दन मात्र है।
*६ सैव कुण्डलिनी।*
वह ही कुण्डलिनी है। मनुष्यों में उक्त आध्यात्मिक शक्ति को कुण्डलिनी कहते हैं।
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