आर्यसमाजियों के पाखण्ड का कालजयी खण्डन --

आर्यसमाजियों के पाखण्ड का कालजयी खण्डन --

सभी सनातन वैदिक धर्मावलम्बी  विप्रजन आर्यसमाजियों के  मत के खण्डन में यह कालजयी ग्रन्थ पढें  और अपने परिजनों को भी पढ़ायें  -----

------ वेदार्थ पारिजात भाष्य वार्तिक -----

https://archive.org/details/VedarthaParijataBhashyaVartikam

 रचयिता - परमपूज्य  जगद्गुरु पुरी शंकराचार्य स्वामी श्री निरञ्जन देवतीर्थ जी महाराज ।  🙏

कथित सामाजिकों  के लिये दो शब्द  ------- 

यदि   सनातनधर्म की पौराणिक परम्पराओं का  विरोध करने वाले कथित आर्यसमाजी   समाजसुधारकों द्वारा  तिब्बत की गुफाओं  में खोजबीन की जाये तो अवश्य ही  ब्राह्मणवादी सनातनी  इतिहास के विरुद्ध  आर्य नारी उत्थान की दिशा में उनका ये दिवास्वप्न भी पूरा होगा , जहॉ, - 

नारी वेद, स्त्री वेद,   महिला वेद,  कैकेयी गृह्यसूत्र ,   मन्थरा संहिता ,  मैत्रेयी  शुल्वसूत्र , अपाला धर्मसूत्र,  गार्गी स्मृति , सीता श्रौतसूत्र  , मन्दोदरी विमानशास्त्र  , कैकेयी संहिता , कौशल्या श्रौतसूत्र  , घोषा योगसूत्र , शूर्पनखा शुल्वसूत्र , ताड़िका धनुर्वेद, त्रिजटा संहिता  ....

 ..आदि अनगिनत आर्यशास्त्रों की पाण्डुलिपियॉ मिलेंगी जो पौराणिक सनातन धर्म के ब्राह्मणप्रधान शास्त्रों को ललकार कर कहेंगे कि हमारे अस्तित्व को तुमने इतिहास के पन्नों में स्थान  क्यों नहीं दिया ? 

इतना ही नहीं, वरन् तिब्बत   की धरती में  खुदाई करने पर  खंडहरों के रूप  में  आर्य स्त्रियों की  वे हजारों प्राचीन महिला  पाठशालाऐं   अथवा कन्या गुरुकुल भी मिलेंगे  जो आर्यसमाजी इतिहास की स्वर्णिम गौरव गाथा का गान कर रहे  होंगे ।

क्योंकि स्वामी दयानन्द जी ने सत्यार्थ प्रकाश में स्पष्ट ही सन्देश दिया  है कि सृष्टि के आदि में  हजारों नग्न  युवक युवतियॉ तिब्बत की धरती  फोड़कर  पैदा हुए ।  तो सृष्टि के  पुराने इतिहास के  सूत्र तो वहीं मिलेंगे न । अथवा सीधे सूर्य में  आर्य  नारियों के संन्यास  आश्रम मिल सकते हैं , क्योंकि स्वामी दयानन्द जी के अनुसार सूर्य में भी आर्य समाजी प्रजा बसती है । 

भारत की  धरती  में तो  पौराणिक  राममन्दिर, विष्णु मन्दिर , मूर्ति पूजा के अवशेष  या शिव मन्दिर आदि  ही मिलते हैं खुदाईयों  में  अथवा वशिष्ठ, भारद्वाज , अगस्त्य ,  याज्ञवल्क्य , अत्रि, विश्वामित्र जैसे ब्राह्मण  या मनु आदि क्षत्रिय  पुरुषों के ही  प्रवाचित शास्त्र   एवं तैतीस करोड़ देवी -देवताओं की उपासना परम्पराऐं ही  बहुतायत में मिलती हैं । 

।। जय श्री राम ।।

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