सीमन्तोन्नयन संस्कार

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    ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗
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सीमन्तोन्नयन संस्कार

गर्भ में शिशु की शिक्षा एवं चेतना का प्रारंभ

येनादिते सीमानं नयति प्रजापतिर्महते सौभगाय!
तेनाहमस्यै सीमानं नयामि प्रजामस्यै जरदष्टि कृणोमी!!
(-ऋग्वेद)

अर्थात जिस प्रकार ब्रह्मा ने देवमाता अदिति का सीमन्तोन्नयन किया था, उसी प्रकार इस गर्भिणी का सीमन्तोन्नयन कर इसकी संतान को मैं दीर्घजीवी करता हूँ.

सीमन्तोन्नयन संस्कार क्यों?

पुंसवन संस्कार लेने तक गर्भस्थ शिशु एक मॉस पिण्ड की तरह ही होता हैं. चार मास का होने के बाद गर्भस्थ पिण्ड का शारीरिक विकास तीव्रता से होता
हैं, अब उसके हृदय आदि अंग निर्मित होने लगते हैं, और हृदय के प्रकट होने से उसके अन्दर चैतन्य शक्ति का प्रादुर्भाव होने लगता हैं.

इसी के साथ माता के शरीर में भी विलक्षण शारीरिक तथा मानसिक परिवर्तन होने लगता हैं - वह यह कि माता अब "दौहद" अर्थात दो हृदय वाली हो जाती
हैं - एक शिशु का और दूसरा अपना. हृदय चैतन्य स्थान हैं, इसलिए चेतना के प्रादुर्भाव के साथ गर्भस्थ जीव इन्द्रियों के अर्थ में रूचि करने लगता हैं, फलतः माता के हृदय पर इच्छाएं प्रतिबिंबित होती हैं, जिन्हें पूरा करना गर्भस्थ बालक के शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक विकास के लिए आवश्यक हैं. माता को कभी किसी विशेष वास्तु आदि खाने की इच्छा अनायास होने लगती हैं, आदि यह सब गर्भस्थ शिशु के हृदय व चेतना के कारण ही होता हैं.

शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ती तो माता के शरीर के माध्यम से पूर्ण हो जाती हैं, परन्तु गर्भस्थ बालक के मानसिक और आध्यात्मिक उत्थान के लिए,
उसकी गर्भ में शिक्षा दीक्षा के लिए सिद्ध गुरु का होना अनिवार्य हैं, जो सीमन्तोन्नयन संस्कार प्रदान कर सकें.

इस संस्कार में शिशु की ग्रहण शक्ति का पर्याप्त विकास हो जाता हैं, तब उसे विभिन्न देवी-देवताओं, ब्रह्मा, विष्णु, शिव के मंत्रों से चैतन्य किया जाता हैं. इसके साथ ही गर्भस्थ बालक को नवग्रह मंत्रों से भी संस्कारित किया जाता हैं, जिससे कि बालक के आगामी जीवन में ग्रहों की प्रतिकूलता दुर्भाग्य के रूप में बालक को अभिशप्त न करें. इस संस्कार से उसे ग्रहों की अनुकूलता प्राप्त होती हैं और यदि प्रारब्धवश यदि कोई दुर्योग होता हैं, तो वह टल जाता हैं. इस संस्कार को प्राप्त करने से गर्भ में रहते हुए भी शिशु गुरु प्रदत्त शक्ति एवं आत्म चेतना के कारण कई प्रकार के ज्ञान से आपूरित हो जाता हैं, अपने पूर्व जन्म की विद्याओं को एकत्र कर पुनः इस शरीर में धारण कर लेता हैं. कई बार ऐसे बालक देखे गए हैं, जो आरम्भ से ही गणित, विज्ञानं, संस्कृत आदि में प्रकाण्ड पंडित पाए गए हैं. इसके पीछे गर्भकाल में निर्मित चेतना ही होती हैं, जो शिशु को अपने पूर्व जन्म की विद्याओं को स्मरण करा देती हैं. यह संस्कार अत्यंत
सौभाग्य का विषय हैं.

यह संस्कार कब लें?
जब गर्भ चार से छः मास का हो जाये, तो उस समय गर्भिणी माता को अपने भावी शिशु के लिए सीमन्तोन्नयन संस्कार प्राप्त करना चाहिए

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