नन्दीश्वर वन्दना

नन्दीश्वर वन्दना !

ॐ आयं गौ: पृश्रीरक्रमीदसदन् मातरं पुर:।
पितरं च प्रयन्त्स्व:।।

ॐ प्रैतु वाजी कनिरक्रदन्नानदद्रासभ: पत्वा।
भरन्नग्निं पुरीष्यं मा पाद्यायुष: पुरा।।

शिव वन्दना !

ॐ नमस्ते रूद्र मन्यव उतो त इषवे नम:।
बाहुभ्यामुत ते नम:।।
ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीनर्मदेश्वरसाम्बसदाशिवाय नमः

सर्वत्र मां रक्षतुविश्वमूर्ति ज्र्योतिर्मयानन्दघनश्चिदात्मा।
अघोरणीयानुरुशक्तिरेक: सईश्वर: पातुभयादशेषात्॥

संपूर्ण विश्व जिनकी मूर्ति है,जो ज्योतिर्मय
आनन्द घनस्वरूप चिदात्मा हैं,वे भगवान
शिव मेरी रक्षा करें।
जो सूक्ष्म से भी अत्यन्त सूक्ष्म हैं,महान् शक्ति
से संपन्न हैं,वे अद्वितीय ईश्वर महादेव जी संपूर्ण
भयों से मेरी रक्षा करें।

ॐ नम: शिवाय

ॐ तत्पुरुषायविद्यहेमहादेवायधीमहि।
तन्नोरुद्र: प्रचोदयात्।

शिवलिंगके पूजन के प्रारंभ के संबंध
में एक पौराणिक कथा है।

दक्ष प्रजापति ने अपने यज्ञ में शिव जी का भाग
नहीं रखा,जिससे कुपित होकर जगज्जननीसती
दक्ष के यज्ञ मंडप में योगाग्निद्वारा जल कर भस्म
हो गई।

माता सती के शरीर त्याग की सूचना प्राप्त होते ही
भगवान शिव अत्यंत क्रुद्ध हो गए और वे नग्न हो
कर पृथ्वी में भ्रमण करने लगे।

एक दिन वह उसी अवस्था में ब्राह्मणों की बस्ती
में पहुंच गए।
शिव जी को उस अवस्था में देख कर वहां की
स्त्रियां मोहित हो गई।

यह देख कर ब्राह्मणों ने उन्हें श्राप दे दिया कि
उनका लिंग तत्काल शरीर से अलग हो कर
भूमि पर गिर जाए।

ब्राह्मणों के शाप के प्रभाव से शिव का लिंग उनके
शरीर से अलग होकर गिर गया,जिससे तीनों लोकों
में उत्पात होने लगा।

समस्त देव,ऋषि,मुनि व्याकुल हो कर ब्रह्मा की
शरण में गए।

ब्रह्मा ने योगबलसे शिवलिंगके अलग होने का
कारण जान लिया और वह समस्त देवताओं,
ऋषियों और मुनियों को अपने साथ लेकर
शिव जी के पास पहुंचे।

ब्रह्मा ने शिव जी की स्तुति वंदना की और उन्हें
प्रसन्न करते हुए उनसे लिंग धारण करने का
निवेदन किया।

तब भगवान शिव ने कहा कि आज से सभी लोग
मेरे लिंग की पूजा प्रारंभ कर दें तो मैं पुन:उसे
धारण कर लूंगा।

शिव जी की बात सुनकर ब्रह्मा जी ने सर्वप्रथम
स्वर्ण का शिवलिंगबना कर उसकी पूजा की।

तत्पश्चात् देवताओं,ऋषियों और मुनियों ने
अनेक द्रव्यों के शिवलिंगबनाकर पूजन किया।

तभी से शिव लिंग के पूजन की परमप्ररा प्रारंभ
हो गई।

शिव लिंग के महात्म्यका वर्णन करते हुए शास्त्रों
में  कहा गया है कि जो मनुष्य किसी तीर्थ की
मृत्तिका से शिवलिंगबना कर उनका हजार बार
अथवा लाख बार अथवा करोड बार विधि-विधान
के साथ पूजा करता है,वह शिवस्वरूपहो जाता है।

जो मनुष्य तीर्थ में मिट्टी,भस्म,गोबर अथवा बालू
का शिवलिंगबनाकर एक बार भी सविधि पूजन
करता है,वह दस हजार कल्पोंतक स्वर्ग में
निवास करता है।

शिवलिंगका सविधि पूजन करने से मनुष्य संतान,
धन,धन्य,विद्या,ज्ञान,सद्बुद्धि,दीर्घायुऔर मोक्ष
की प्राप्ति करता है।

जिस स्थान पर शिवलिंगकी पूजा होती है,
वह तीर्थ न होने पर भी तीर्थ बन जाता है।

जिस स्थान पर सर्वदा शिवलिंगका पूजन होता है,
उस स्थान पर मृत्यु होने पर मनुष्य शिवलोक
जाता है।

शिव शब्द के उच्चारण मात्र से मनुष्य समस्त
पापों से मुक्त हो जाता है और उसका बाह्य
और उसका अंत:करण शुद्ध हो जाता है।

दो अक्षरों का मंत्र शिव परब्रह्मस्वरूपएवं
तारक है।

इससे अलग दूसरा कोई तारक ब्रह्म नहीं है-

तारकंब्रह्म परमंशिव इत्यक्षरद्वयम्।
नैतस्मादपरंकिंचित् तारकंब्रह्म सर्वथा॥
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लिंगाष्टक स्त्रोतम -----

ब्रह्ममुरारिसुरार्चित लिगं
निर्मलभाषितशोभित लिंग |
जन्मजदुःखविनाशक लिंग
तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं॥१

देवमुनिप्रवरार्चित लिंगं,
कामदहं करुणाकर लिंगं|
रावणदर्पविनाशन लिंगं
तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं॥२

सर्वसुगंन्धिसुलेपित लिंगं,
बुद्धिविवर्धनकारण लिंगं|
सिद्धसुरासुरवन्दित लिंगं,
तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं॥३

कनकमहामणिभूषित लिंगं,
फणिपतिवेष्टितशोभित लिंगं|
दक्षसुयज्ञविनाशन लिंगं,
तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं॥४

कुंकुमचंदनलेपित लिंगं,
पंङ्कजहारसुशोभित लिंगं|
संञ्चितपापविनाशिन लिंगं,
तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं॥५

देवगणार्चितसेवित लिंग,
भवैर्भक्तिभिरेवच लिंगं|
दिनकरकोटिप्रभाकर लिंगं,
तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं॥६

अष्टदलोपरिवेष्टित लिंगं,
सर्वसमुद्भवकारण लिंगं|
अष्टदरिद्रविनाशित लिंगं,
तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं॥७

सुरगुरूसुरवरपूजित लिंगं,
सुरवनपुष्पसदार्चित लिंगं|
परात्परं परमात्मक लिंगं,
ततप्रणमामि सदाशिव लिंगं||८

मैं उन सदाशिव लिंग को प्रणाम करता हूँ जिनकी
ब्रह्मा,विष्णु एवं देवताओं द्वारा अर्चना की जाती है,
जो सदैव निर्मल भाषाओं द्वारा पुजित हैं तथा जो
लिंग जन्म-मृत्यू के चक्र का विनाश करता है।
(मोक्ष प्रदान करता है)

देवताओं और मुनियों द्वारा पुजित लिंग,जो काम
का दमन करता है तथा करूणामयं शिव का स्वरूप
है,जिसने रावण के अभिमान का भी नाश किया,
उन सदाशिव लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ।

सभी प्रकार के सुगंधित पदार्थों द्वारा सुलेपित लिंग,
जो कि बुद्धि का विकास करने वाल है तथा,सिद्ध- सुर
(देवताओं) एवं असुरों सबों के लिए वन्दित है,
उन सदाशिव लिंग को प्रणाम।

स्वर्ण एवं महामणियों से विभूषित,एवं सर्पों के
स्वामी से शोभित सदाशिव लिंग जो कि दक्ष के
यज्ञ का विनाश करने वाल है ; आपको प्रणाम।

कुंकुम एवं चन्दन से शोभायमान, कमल हार से
शोभायमान सदाशिव लिंग जो कि सारे संञ्चित
पापों से मुक्ति प्रदान करने वाला है,
उन सदाशिव लिंग को प्रणाम ।

आप सदाशिव लिंग को प्रणाम जो कि सभी देवों
एवं गणों द्वारा शुद्ध विचार एवं भावों द्वारा पुजित
है तथा जो करोडों सूर्य सामान प्रकाशित हैं।

आठों दलों में मान्य, एवं आठों प्रकार के दरिद्रता
का नाश करने वाले सदाशिव लिंग सभी प्रकार
के सृजन के परम कारण हैं – आप सदाशिव
लिंग को प्रणाम।

दवताओं एवं देव गुरू द्वारा स्वर्ग के वाटिका के
पुष्पों से पुजित परमात्मा स्वरूप जो कि सभी
व्याख्याओं से परे है – उन सदाशिव लिंग को
प्रणाम।
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जयति पुण्य सनातन संस्कृति,,,
जयति पुण्य भूमि भारत,,,

न जानामि योगं जपं नैव पूजा
नतोऽहं सदा सर्वदा शंभू तुभ्यं।
जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं
प्रभो पाहि आपन्नमामि शंभो।।

कष्ट हरो,काल हरो💐
दुःख हरो,दारिद्र्य हरो💐
हर हर महादेव💐

बाबा विश्वनाथ समस्त चराचर प्राणियोँ
एवं सकल विश्व का कल्याण करेँ💐

सदा सर्वदा सुमंगल💐
जयमहाकाल💐
जय भवानी💐
जय श्री राम💐

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