शिव और शंकर के स्वरूप भेद

शिव और शंकर के स्वरूप भेद 

     निराकार ब्रह्म का स्वरूप है शिव , शाश्वत ओर अनंत है । एक से अनेक बनू की इच्छामात्र से उनकी महामाया ( महाकालि ) प्रकट हुई और पंचतत्व जल , वायु , अग्नि , भूमि और आकाशतत्व का सर्जन हुवा । जलतत्व से शक्ति ( देवी ) , वायुतत्व से नारायण ( विष्णु ), अग्नितत्वसे सूर्य ( आदित्य ), भूमितत्व से महागणपति ( ब्रह्मा ) और आकाशतत्व से रुद्र ( शंकर ) प्रकट हुवे । चौदह ब्रह्मांड जल , स्थल , वायु वनस्पति के साथ अनेक जीव सृष्टि की रचना हुई । देव , दानव , यक्ष , किन्नर , गांधर्व , चारण , सर्प , वानर , मानव और जलचर , खेचर , भूचर जीव सृष्टि की रचना हुई । सृजन ज्ञान ( ब्रह्मा ) सृष्टि का संचालन ( विष्णु ) सृष्टिलय (शंकर ) प्रकृति पोषण ( सूर्य ) और आसुरी दमन ( देवी ) का कार्यभार है ।

    सनातन धर्म की विविध पूजा उपासना ओर विविध संप्रदायों के अपने इष्ट की प्रसंशा ग्रंथोंसे मूल सत्य को अलिप्त कर दिया । आजके आधुनिक युगमे समय अभाव और साम्प्रदायिक प्रचारों से नई पीढ़ी भ्रमित है । राम और कृष्ण भी शिव की उपासना करते थे वो तो रामायण और कृष्णलीला के ग्रंथोके आधार प्रसंग है । 

जब ब्रह्मांड में शून्य के अलावा कुछ नहीं था तब भी शिव थे निराकार रूप में और महाशिवरात्रि के दिन ही एक ज्योतिर्लिंग के रूप में उन्होने अपना साकार रूप प्रकट किया और उसके बाद उसी प्रकाशित लिंग से त्रिदेव, त्रिदेवियाँ तथा अन्य परम शक्तियों की उत्पत्ति हुई. तो इस प्रकार जो शिव स्वयं अन्य परम शक्तियों के जनक हैं तो उनसे बड़कर और कौन है जो सर्वशक्तिमान कहला सके. उनका ना कोई रूप है, ना कोई आकार फिर भी वे जिस ज्योतिर्लिंग के रूप में हमें दर्शन देते हैं वही परमतम शक्ति है जो सत्य है जिसकी कोई तुलना नहीं, जिसके सब पराधीन हैं चाहे फिर वे ब्रह्मा, विष्णु ही क्यों ना हों. वैसे तो हम मानते हैं की भक्त अपनी भावना के अनुसार श्री नारायण अथवा ब्रह्मा जी को सर्वशक्तिमान मान सकता है लेकिन सत्य तो यही है की इन परम शक्तियों को भी जो उत्पन्न करने वाले शिव ही है ।

   कैलासवासी महादेव शिवजी का साकार स्वरूप है । समाधि अवस्थामे वो भी निराकार ब्रह्म शिव का ही ध्यान करते है । भगवान विष्णु , गणपति , सूर्य और शक्ति भी शिव की ही उपासना करते है । विष्णु नारायण से भी अनेक अवतार हुवे । देवी से अनेक दुर्गा , अम्बा , सती , योगिनियो के अबतार हुवे । सूर्य से सकल आत्मा सृष्टि । महागणपति से उनके आठ अवतार । ऐसे देखा जाय तो सकल सृष्टि के सभी देवी देवता , वीर , भैरव सब शिव के ही अंश है । 

    शिव निराकार है ज्योत स्वरूप है , इसलिए दीप स्वरूप को मूर्ति स्वरूप शिबलिंग की स्थापना करके पूजा जाता है । शिबलिंग का पूजन करनेसे सृष्टि के समस्त देवी देवताओं की पूजा स्वयं ही हो जाती है । शिबलिंग का पूर्वदिशा का मुख सूर्य है , पश्चिम दिशाक मुख महागणपति ( ब्रम्हा ) है , उत्तरदिशा का मुख नारायण है , दक्षिणदिशा का मुख भगवती है और ऊर्ध्व (ऊपर का )मुख रुद्र शंकर है ।  हिन्दू सनातन धर्म की वैदिक पूजा शिवपूजा है । भविष्य पुराणमें यही उल्लेख है कि कलिकाल की चरम सीमा तब होगी जब लोग वैदिक धर्म का त्याग करेंगे और पाखंड पूजा जाएगा । आज करीब करीब उन समय का निर्देश हो रहा है । 

            

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