सौभाग्य शयन व्रत चैत्र तृतीया
By.Harishankar Sharma:
अथ तृतीयाके व्रत
मत्स्यपुराण में लिखा है किे, चैत्रशुक्ल तृतीयाको सौभाग्यशयन नामका व्रत होता है। मत्स्य भगवान्
कहते हैं कि, बसन्तऋतुके महीनामें तृतीयाके दिन हे जनप्रिय ! दासों और पुत्र सुख चाहनेवाली स्त्रियोंको
सौभाग्यके लिये व्रत करना चाहिये ॥। पहिले तो शुक्लपक्षके पूर्वाह्नमें तिलोंसे स्नान करना चाहिये । क्योंकि,
*इसी दिन वरवारिणि सती देवीका बैदिकबिधिसे परमेश्वबर शिवके साय विवाह हुआ था*, अनेक तरहके
फूलोंसे, धूपसे, दीपसे और नैवैद्यसे सती देवी के साथ शिवजीका पूजन करना चाहिये । शंकर भगवान् सहित
गौरी देबीकी प्रतिमाको पंचगव्यसे गंधोदकसे और पंचामृतसे स्नान कराना चाहिये । दोनोंके अंग प्रत्यज्नोंके
पुजनके मंत्र भिन्न भिन्न हैँ, उनसे ही अंग प्रत्यंगोंका पूजन होना चाहिये "ओम पाटलायै नम :" इस मंत्रसे
गौरीके तथा "ओम् शिवाय नमः " इस मंत्रसे शिवके चरणोंकी पूजा करनी चाहिये । "ओम् जयायै नमः"
इस मंत्रसे गौरीके तथा "ओम् त्रिगुणाय नमः " इस मंत्रसे शियके गुल्फोंका पूजन करना चाहिये । ।"ओम्
भवान्यै नमः " इस मंत्रसे गौरीके तथया "ओम् रुद्रेহवराय नमः " इस मंत्रसे शिवके जंघाओंका पुज़न करना
चाहिये "ओम् जयायै नमः" इससे गौरीके जानु तथा "ओम् हरिकेशाय नमः " इस मंत्रसे शिबके जानुओंका
पुजन करना जाहिये। 'ओम् वरदाय नमः " इस मंत्रसे गौरीके तथा "ओम् ईशाय नमः " इस मंत्रसे शिवके
कहओंका प्रजन करना चाहिये। "ओम् रत्यै नमः' इस मंत्रसे गौरोकी तथा 'ओम् शंकराय नमः" इस
मंत्रसे शिवकी कटिका पूजन करना चाहिये । "ओम् कोटयें नमः" इस मंत्रसे गौरीकी तथा "ओम् शुलपाणये- नमः" इस मंत्रसे शिवकी दोनों कोखोंका पूजन करे ॥ओम् मंगलायै नमः " इस मंत्रसे गौरीक्षे तथा "ओम्
सर्वात्मने नमः" इस मंत्रसे शिबके उदरको पुजे ।।ओमु् ईशान्य नम : इस मंत्रसे पार्बतीके कुचोंको तथा "ओं वे-
दात्मने नमः " इस मंत्रसे शिवके कूचोंको प्जना चाहिये। "ओमु रुद्राण्ये नमः इस मंत्रसे गौरीसे तथा "ओम
त्रिपुरष्नाय नमः " इस मंत्रसे शिवके कंठका पुजन करना चाहिये । "ओमू अनन्तायं नमः इस मंत्रसे
श्री गौरीके तथा "ओम् त्रिलोचनाय नमः " इस मंत्रसे शिबके करोंका पूजन होना चाहिये । ओम्
कालानलप्रिये नमः " इस मंत्रसे गौरीके तथा "ओम् सौभाग्यभुवनाय नमः " इस मंत्रसे शिव के दोनों
बाहओंकी पूजा करनी चाहिये। "ओम् स्वाहा स्वधा्य " इस मंत्रसे गौरीके तथा "ओम ईश्वराय नमः "
इस मंत्रसे शिव के मुखकी पुजा करनी चाहिये । "ओम् अशोक मधूवासिन्यैं नमः" इस मंत्रसे
गौरीके और "ओमू स्थाणवेनमः " इस मंत्रसे शिवके होठोंका पुजन होना चाहिये । "ओम चन्द्रमुखप्रियाय
नमः" इस मंत्रसे गौरीके तथा "ओम् अ्धनारीशायनमः इस मंत्रसे शियके मुखका दुबारा पूजन
करना चाहिये । "ओम असिताङ्गाय नमः" इस मंत्रसे गौरीको तथा "ओम उमाप्रियाय नमः "
इस मंत्रसे शिवजीकी नासिकाका पूजन होना चाहिषे। "ओम् ललितायैं नमः" इस मंत्रसे गौरीकी तथा
"ओम शर्वाय पुरहन्त्रं नमः" इस मंत्रसे शिव
पूजन करना चाहिये ।
करना चाहिये । "ओम वासुदेव्यै: नमः "
इस मंत्रसे गौरीके तथा "ओम श्रीकण्ठाय नमः
भीग्रसौम्यरूपिण्य नमः" इस मंत्रसे गौरीके और "ओम सर्बात्मने नमः " इस मंत्रसे शिबके शिरका पूजन
करना च्राहिये ।
इस प्रकार दोनोंका पूजन कर लेनके बाद, इनके सामने सौभाग्यकी आठ वस्तुओंका निबवेदन
करना चाहिये । मटर, कसूम, दुध, जीरा, तालपत्र, ईखका गन्ने, लबण और कुस्तुम्बुरू इनको सौभाग्याष्टक
करते है । ब्योंकि, ये बस्तु सौभाग्यके करनेवाली हैं । अरिन्दम ! इस प्रकार दोनों के सामने सौभाग्यष्टकका
निवेदन करके, पोछे गोभृंगके परिमाणमात्र पानी पीकर भूमिपर शयन करना चाहिये। दूसरे दिन प्रतःकाल
नित्य करमंसे निब्त्त होकर माला वस्त्र और आभूषणोंसे ब्राह्मणं दम्पतियोंका पूजन ।
जन करे, पीछे सौभाग्याष्टकके
साय गौरी पार्वतीकी बनोहुई सोनेकी व्रतमुर्तिको उस ब्राह्मणको दे दे और कहे कि, इस बानसे ललिता देबी
मुझ्षपर प्रसन्न हो जाय इसीतरह चैत्रशुक्ला तृतीयासे लेकर प्रतिमासको शुक्ला तृतीयाको यह ब्रत करना
चाहिये। इसके पश्चात और दान-मंत्रोमें जो कुछ विझेषताए हूँ उन्हें भी कहते हैं । गोभृंगमात्रतो पानी पहिलीमें
तथा बैशाखको थोडासा गोबर खाकरही रहजाना चाहिये, ज्येष्ठमें मन्दारके फूल तथा आषाडमें बेलपत्र
भावणमें थोडासा दही, भादोंमें कुशका पानी, क्वार में दूध, कातिकमें गायका गव्य, मार्गशीर्ष में गोमूत्र,
पौयमें घी, माघमें कालेतिल और फाल्गुन में पंचगब्य लेना चाहिये। दानके समय यह कहना चाहिये कि,
लसिता, बिजया, भद्रा, भबानी, कुमुदा, शिबा, बासुदेवी, गौरी, मंगला, कमला, सती ये सब देबियाँ इस
दानसे परम प्रसन्न होजायें, पीछे दान देना बाहिये । इन नामोंमेंसे हरएक नामको लेकर उसके पीछे "श्रीयताम्' '"
लगाना चाहिये तथा पहिलेमें पहिलो और दूसरेमें दूसरो देबोकी प्रसन्ताके लिये बान देना चाहिये, तथा
उसीके लिये "प्रीयताम' कहना चाहिये । चैत्र में मल्लिकाके, वैशाख में अशोकके ज्येष्ठमें कमलके, आषाढमें
कदम्बके, श्रावण में उत्पलके, भाद्रपदमें मालतीके, क्बारमें कुब्जकके, कातिकमें करवीरके, अगहनमें बाणके,
पौषमें अम्लानके, माघमें कुंकुमके, और फागुनमें सिधुरवारके फूलोंके फुलोंको चढ़ाना चाहिये । बाण नाम
नीले कुंरटकका है - महासहाको 3
कहते हैं। जपा, कुसम, को
मालती और शतपत्रिका मिलजापं तो चढ़ावे, नहीं तो रहने दे, पर करबीरकी कभी नागा न होनी चाहिये,
उसे तो अबश्यही वढ़ाना चाहिपें। स्त्री हो अथबा कुमारा ह६स মष
करती हुई शक्तिके
अनसार विवपूजन करती रहें, व्रतको समाप्तिपर सब्र उपकरक नय रব
, उसपर
सनेके शिब, गौरी पार्बती হ্বक्ति हो उसर्के अनुसार बूसरो २ भ बुस्त्ू जोडिस
इ सके शिवा और भी धान्य अलंकार आदि अनंक घन सबयोसि ब्राह्ण ब्राह्ाणीको पूजना चाहिय ।वि्तक
दानमें शठता न होनी चाहिये, निःसन्देह होकर करना चाहियें । जो इस प्रकार लिर्गेण्रीको सिन्धूअम्लान कह तनकय शयन का वरत करती है बो सब कामोंको प्राप्त हो, अन्तमें मोक्षकी पदवीको प्राप्त होजाती है। किसी एक फलका त्याग कर व्रत करना चाहिये । है राजन् ! जो इस वतको प्रतिमास करती है वो सौभाग्य, आरोग्य, रूप, आयु, वस्त्र, अ्लंकार और भुषणोंसे एक अर्ब वर्षतक करभी भी वियुक्त नहीं होती । जो कोई बारह वर्षतक सौभाग्य करता है सभी मनोरथों को प्राप्त कर लेता है ।।
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